आज, भारत समेत पूरा एशिया उनके नाम को जानता है.

एशिया में पहली महिला ट्रेन ड्राईवर बनकर, सुरेखा यादव ने इतिहास में अपना नाम दर्ज कर लिया है. क्योंकि इससे पहले सिर्फ पुरुषों द्वारा किए जाने वाले इस काम को सुरेखा ने बिना किसी झिझक के बहुत खूब निभाया.

सुरेखा यादव ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह किसी ट्रेन की पहली महिला चालक बन जाएंगी. वो अपनी पढ़ाई के बाद एक शिक्षक के तौर पर काम करना चाहती थीं. पर उनकी किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था!

उन्होंने जिंदगी में ट्रेन ड्राइवर बनने का सपना दूर-दूर तक नहीं देखा था.

किन्तु कहते हैं न, आपकी किस्मत बड़ी चीज़ है. न जाने कब क्या हो जाए और ये आप को कहां से कहां ले आए.

खैर, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग से पढ़ाई करने वाली सुरेखा का एक शिक्षक बनने से एशिया की प्रथम लोको-पायलट बनने तक का सफ़र काफ़ी दिलचस्प है.

कैसे आईए जानते हैं-

यूँ ही भर दिया था ट्रेन ड्राइवर का फॉर्म

1965 में जन्मीं सुरेखा, पांच भाई-बहनों में सबसे बड़ी बहन हैं.

उनके पिता का नाम रामचंद्र भोंसले और माता का नाम सोनाबाई. सुरेखा का बचपन महाराष्ट्र के सतारा में बीता. एक कान्वेंट स्कूल से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने वोकेशनल ट्रेनिंग भी ली थी.

अक्सर, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग को सिर्फ लड़कों के लिए समझा जाता है. आंकड़े देखे तो यह मिलेगा कि लड़कियों की संख्या लड़कों की तुलना में काफी कम होती है. ऐेसे दौर में सुरेखा ने इस विषय को चुनकर एक मिसाल कायम की. 

उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि मेरी कहानी बहुत आम है. मैंने कई लोगों की तरह इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया और फिर एक नौकरी की तलाश करने लगी.

दिलचस्प बात तो यह है कि सुरेखा, एक शिक्षक बनना चाहती थीं. किन्तु, अचानक कहीं से उनके कानों मे रेलवे में असिसटेंट ड्राईवर में खाली पदों पर भर्ती की खबर पड़ी. चूँकि, उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की थी, इसलिए वह इसके लिए योग्य थीं.

अंतत: उन्होंने आवेदन कर ही दिया.

Surekha Yadav Became First Female Train Driver of Asia (Pic: beaninspirer)

एकलौती लड़की, जिसने दी ये परीक्षा

जब सुरेखा लिखित परीक्षा देने एग्जाम हॉल पहुंची, तो हैरान हो गयी. वह इसलिए क्योंकि इस पद के लिए सिर्फ पुरुषों ने ही आवेदन किया था. वो एक मात्र महिला थीं, जिन्होंने इस पद के लिए आवेदन किया था.

सुरेखा को इस बात का अंदाजा नहीं था कि इससे पहले किसी महिला ने रेलवे में इस पद पर काम नहीं किया था.

पर चूंकि, उन्हें इस क्षेत्र में आकर इतिहास रचना था.

लिहाज़ा, वह एक के बाद एक सारे पड़ाव पार करती चली गईं. उन्होंने लिखित और इंटरव्यू समेत सारे पड़ाव बड़ी आसानी से पार कर लिए. इस सफलता के बाद, उन्हें ट्रेनी असिसटेंट ड्राईवर के तौर पर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया.

उनकी यह ट्रेनिंग छः महीने तक कल्याण ट्रेनिंग स्कूल में चली. ट्रेन के दौरान बारीकियों को सीखने के बाद, उन्हें 1989 में असिस्टेंट ड्राइवर के पद पर नियुक्त कर दिया गया. इसी के साथ वह भारत समेत एशिया की ऐसी पहली महिला बन गयी, जिसने पुरुषों के प्रभुत्व को तोड़ा था.

उन्होंने ट्रेन को चलाकर ये साबित कर दिया था कि महिलाएं किसी क्षेत्र में कम नहीं. बस जरुरत है एक कदम बढ़ाने की.

गौरतलब हो कि ट्रेन तो एक मशीन है, उसे नहीं पता होता कि उसके पीछे कौन बैठा है. ये समाज द्वारा विभाजित किए गए काम महिलाओं को हमेशा कम आंकते रहे हैं. ऐसे में सुरेखा की पहल ऐसी सोच पर एक करारा तमाचा थी.

Surekha Yadav Casually Filled for the Post of Train Driver (Pic: plus)

आम रेलगाड़ी से लेकर मालगाड़ी तक चलाई

उन्होंने अपने 29 साल रेलवे को दिए. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने एल50 नाम की लोकल माल गाड़ी चला कर की. इसके बाद, उन्हें ट्रेन के इंजन और सिग्नल से संबंधित काम सौंपे गए, जिसे उन्होंने बड़ी खूबी से निभाया.

यही वजह थी कि साल 1998 में वह पूर्ण रूप से माल गाड़ी की ड्राइवर बन गईं.

उनके करियर का सबसे चुनौती पूर्ण समय तब आया, जब उन्हें वेस्टर्न घाट पर ड्राइविंग के लिए नियुक्त किया गया. दो-इंजन वाली इस ट्रेन को चलाते समय अच्छे-अच्छे लोग डर जाते हैं, लेकिन सुरेखा ने इस चुनौती को भी पूरा किया. महाराष्ट्र के पहाड़ों के उबड़-खाबड़ रास्ते पर सुरेखा के कदम कभी नहीं डगमगाए.

इससे पहले ‘घाट-लोको' ड्राईवर की कमान किसी महिला ने नहीं संभाली थी. सुरेखा ऐसी पहली महिला बनीं, जिन्हें इसकी ज़िम्मेदारी सौंपी गयी. वेस्टर्न घाट जैसे कठिन रास्तों पर भी उनके हाथ नहीं कापें. इस तरह उन्होंने हर चुनौती को अच्छे से पूरा किया. यही वजह थी कि उनका प्रमोशन करके साल 2011 में उन्हें एक्सप्रेस मेल ड्राईवर के पद पर नियुक्त कर दिया गया.

Surekha Yadav While Driving a Train (Pic: twitter)

2011 में मिला ‘एशिया की पहली महिला ट्रेन ड्राइवर’ का खिताब

जब साल 2000 में, तत्कालीन रेलमंत्री ममता बनर्जी ने महिलाओं के लिए एक स्पेशल लोकल ट्रेन चलवाई थी. तब उसकी ड्राइवर कोई और नहीं बल्कि सुरेखा ही थीं.

उनके जीवन में सबसे सुनहरा पल तब आया, जब साल 2011 में महिला दिवस के दिन उन्हें एशिया की पहली महिला ड्राईवर होने का ख़िताब दिया गया. यह ख़िताब इसलिए भी बड़ा था, क्योंकि पुणे के डेक्कन क्वीन से सीएसटी रूट पर उन्होंने ड्राइविंग की थी, जिसे सबसे खतरनाक रूट माना जाता है.

इसी क्रम में साल 2011 से वह कल्याण ड्राइविंग स्कूल में प्रशिक्षण दे रही हैं.  साथ ही सीनियर इंस्ट्रक्टर के पद पर भी  विराजमान हैं. उन्होंने 1990 में एक पुलिस इंस्पेक्टर से शादी की थी. उनके दो बच्चे भी हैं.

Surekha Yadav While Receiving an Award (Pic: twitter)

सुरेखा ने बताया था कि विश्वास की कमी होने के बावजूद उनके परिवार और दोस्तों ने हमेशा उनका साथ दिया.

उन्होंने खुद को कभी इस तौर पर नहीं देखा कि वो एक महिला है और ये काम कर रही हैं. उन्होंने हमेशा अपने आप को एक कर्मचारी के तौर पर देखा, जिसे अपनी जिम्मेदारियां निभानी थी. यही कारण रहा कि वह प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं!

Web Title: Surekha Yadav: First Female Train Driver of Asia, Hindi Article

Feature Image Credit: mumbaimirror