मानव सभ्यता का इतिहास प्रयोगों से भरा हुआ है. इसमें दो मत नहीं कि इन प्रयोगों ने ही हमारे जीवन को आसान बनाया है पर इनमें से कुछ प्रयोग वैज्ञानिकों की अजीब सनक का नतीजा भी रहे.

जो सफल हो गए वे सिद्धांत बनकर लागू हो चुके हैं और कुछ से केवल यातनाओं की बुरी यादें ही जुड़ी हुई हैं. कमाल की बात यह है कि इनमें से कई को तो ऐतिहासिक प्रयोगों की सूची में स्थान भी दिया गया.

आज हम आपको इतिहास में किए गए अजीब प्रयोगों और उनसे जुड़े परीक्षणों की कहानी बता रहे हैं. इन्हें पढ़ें और जानें कि प्रयोग का जुनून वैज्ञानिकों के लिए कई बार किसी की जान से ज्यादा कीमती कैसे हो गया!

मानव के गर्भ से चिंपाजी पैदा करना!

19वीं शताब्दी में रूसी वैज्ञानिक एलिया इवानोविच इवानोव ने काफी नाम कमाया था.

उन्होंने 1901 में एक जूलॉजिकल स्टेशन की स्थापना की थी. वहां वह जीव-जंतुओं की प्रजातियों पर रिसर्च करते थे. इस दौरान उन्होंने कई हाइब्रिड जानवरों को तैयार किया. कृत्रिम गर्भाधान के जरिए जब उन्होंने एक हाइब्रिड तैयार किया तो पूरी दुनिया में उनका नाम हो गया.

इसके बाद तो उन पर अलग-अलग आविष्कार करने का जैसे कोई भूत ही चढ़ गया.

एक बार उन्हें फितूर सवार हुआ कि चिंपांजी के शरीर से मानव के बच्चों को जन्म दिया जा सकता है. उन्होंने 1910 में अपना यह प्रस्ताव इवानॉविक जूलॉजिस्ट की एक बैठक में रखा.

उन्होंने 1910—20 के बीच कई तरह के परीक्षण किए. एक बार तो फीमेल चिंपांजी के गर्भ में मानव के शुक्राणुओं को स्थापित तक कर दिया पर यह परीक्षण असफल रहा. इसके बाद उन्होंने मानव शरीर से चिंपाजी को पैदा करने का प्रयोग शुरू किया.

इसके लिए उन्होंने कई महिलाओं से स्वयंसेवा देने की गुजारिश की. उन्हें प्रयोग के लिए पांच महिलाओं की आवश्यकता था. वह इस काम के लिए भुगतान करने को भी तैयार थे. हालाँकि, लोगों ने इस अजीब सनक में उनका साथ नहीं दिया और प्रयोग वहीं रूक गया.

Breeding Experiment On Chimpanzee & Human (Representative Pic: agriorbit)

पावलोव का ‘शास्त्रीय अनुबंधन’

मनोविज्ञान की दुनिया में पावलोव और उनके ‘शास्त्रीय अनुबंधन’ सिद्धांत को हर कोई जानता है. यह सिद्धांत मनुष्य के साथ—साथ अन्य प्राणियों की स्वभाविक प्रकृति का वर्णन करता है. इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्राणियों के स्वत: सीखने की प्रवृत्ति तब ज्यादा तेज होती है जब उन्हें किसी विशेष स्थिति में समान प्रतिक्रिया मिलती है. उन्होंने अपने सिद्धांत को समझाने के लिए अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया.

उन्होंने अनुबंधित क्रिया (Conditioned Response) को समझाने के लिए कुत्ते के ऊपर प्रयोग किया. प्रारम्भ में भूखे कुत्ते के मुंह में भोजन देखकर लार आ जाना स्वाभाविक क्रिया है. पावलव में प्रयोग के प्रारम्भ में कई दिनों तक खाने के साथ घण्टी बजा कर कुत्ते को खाना दिया. (खाना + घण्टी) यह प्रयोग कई दिनों तक दोहराने पर पाया गया कि खाना एवं घण्टी में सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है एवं स्वाभाविक क्रिया-लार टपकना होती है.

इसके बाद केवल घण्टी बजाई परन्तु खाना साथ में नहीं दिया गया. इससे यह पाया गया कि कुत्ता स्वाभाविक क्रिया (लार टपकती है) करता है. इस सिद्धांत का प्रयोग पशुओं एवं मनुष्यों के व्यवहार को सुधारने व परिमार्जन में महत्वपूर्ण सिद्ध होता है.

इसके बाद उन्होंने साबित किया कि अस्वाभाविक (कृत्रिम) उत्तेजना के प्रति स्वाभाविक क्रिया का उत्पन्न होना अनुकूलित अनुक्रिया कहलाती है. उदाहरण – मिठाई की दुकान को देखकर बच्चों के मुंह से लार टपकने लगती है.

यह प्रयोग काफी अच्छा माना जाता है मगर इसके साथ ही इसे बुरा भी माना जाता है. कुत्तों को मानसिक तौर पर इस प्रयोग के लिए काफी परेशान किया गया था जिसकी काफी आलोचना भी हुई.

Dog Saliva Experiment (Pic: nashvillepaw)

सिर कलम करने वाला ‘गिलोटिन’

18 वीं सदी के अंत में, क्रूर तरीकों से मृत्युदंड दिया जाता था. दंड के लिए तलवार या कुल्हाड़ी से सिर काट दिया जाता था. यह काफी पीड़ादायक प्रक्रिया थी. इसे देखना और भोगना दोनों कठिन था. कई बार जरा सी चूक के कारण निष्पादन अधूरा रह जाता था. नेशनल असेंबली के डॉक्टर जे. गिलोटोइन ने एक प्रकार के उपकरण का उदाहरण दिया जिसे अन्य देशों में इस्तेमाल किया जाता था. इसके ढ़ांचे में जरूरी बदलाव भी उन्होंने ही किए.

विशेष रूप से वर्जिन के डिजाइन में कुछ बदलाव किए. निष्पादन के लिए सीधे चाकू की जगह एक झुके ब्लेड का इस्तेमाल किया गया. गिलोटिन ने त्वरित और दर्द रहित मृत्यु की गारंटी दी. इसके बाद अपराधियों पर इसका इस्तेमाल भी किया गया. प्रयोग सफल रहा और इस यंत्र को डॉक्टर गिलोटिन के नाम पर ‘गिलोटिन’ ही कहा जाने लगा.

बाद में गिलोटिन का उपयोग अन्य देशों में मौत की सजा देने के लिए किया जाने लगा.

Guillotine Experiment (Pic: darksideofhistory)

यूनिट 731 के दर्दनाक आॅपरेशन!

अक्सर जब भी द्वितीय विश्व युद्ध की बात सामने आती है जर्मनी को ही उसमें सबसे बड़ा पापी माना जाता है. हालाँकि जर्मनी के अलावा भी कई ऐसे देश थे जो उसकी तरह ही क्रूर थे. क्रूर देशों की सूची में जापान का भी नाम शामिल है. इस सूची में जापान का नाम दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाई गई उनकी यूनिट 731 के कारण आया.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान युद्धबंदियों और अपराधियों की एक यूनिट तैयार की गई. इस यूनिट के लोगों पर जापानियों द्वारा अमानवीय वैज्ञानिक प्रयोग किए गए. 1936 में क्वांटुंग आर्मी के सर्जन जनरल शिरो इशी ने महामारी की रोकथाम की दवाइयां और इंजेक्शन बनाने के लिए इन्हीं कैदियों पर परीक्षण किए. यूँ तो अक्सर ऐसे प्रयोग जानवरों पर ही किए जाते हैं मगर जापानियों ने इन्हें सीधा इंसानों पर किया.

शिरो इशी ने दूरदराज के क्षेत्रों में प्रयोगशालाएं स्थापित की और कैदियों के ऊपर अमानवीय परीक्षण किए. वे परीक्षण के दौरान कैदियों को बेहोश तक नहीं करते थे. उन्होंने कई बार मानव शरीर के अंदरूनी अंगों को एक दूसरे कैदियों में प्रत्यारोपित करने तक का असफल और पीड़ादायक परीक्षण किया.

वह खुद नहीं जानते थे कि आखिर इन प्रयोगों का कैदियों पर क्या असर पड़ेगा. इसके बावजूद भी उन्होंने निरंतर जंग ख़त्म होने तक उन पर प्रयोग किया. माना जाता है कि कई बार प्रयोग विफल भी हुए मगर जापानियों को कोई फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने कैदियों को यूँ ही पड़े रहने दिया.

Unit 731 Experiment In Japan (Representative Pic: tasteofcinema)

खुद अपने ऊपर किया जानलेवा प्रयोग

ऑस्ट्रेलियाई चिकित्सक बैरी मार्शल को साल 2005 में अपने प्रयोगों के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उन्होंने तर्क दिया था कि हेलिकोबैक्टर पाइलोरी बैक्टीरिया पेप्टिक अल्सर का कारण होते हैं. यह प्रयोग चूहों पर किया जा सकता था पर चूंकि गिनी पिग राष्ट्रीय जीव है इसलिए उन्हें यथार्थवादी परीक्षण की जरूरत थी. ऐसे में बैरी खुद यह परीक्षण अपने ऊपर करने को तैयार हुए.

इस प्रयोग मे उनकी जान को भी खतरा था पर वे नहीं घबराए!

उन्होंने अल्सर के रोग के जीवाणु के नमूने को अपने शरीर में एकत्र किया. पांच से आठ दिन में उनके शरीर पर अल्सर के लक्षण दिखाई देने लगे. एंडोस्कोपी से सुनिश्चित किया गया कि पेट में अल्सर तेजी से फैलना शुरू हो गया है. इस परीक्षण के बाद वह लंबे समय तक के लिए रोगग्रस्त हो गए.

Barry Marshall Who Did Experiment On His Own Body (Pic: dailytelegraph)

‘मासूम अल्बर्ट’ पर किया गया अनोखा प्रयोग

बच्चों के मनोविज्ञान से जुड़ी हुई ‘लिटिल अल्बर्ट’ प्रक्रिया के बारे में हर डॉक्टर बहुत अच्छी तरह से जानता है. यह एक पूरी श्रृंखला है, जिसे एक छोटे बच्चे अल्बर्ट पर प्रयोग करके तैयार किया गया. ‘शास्त्रीय अनुबंधन’ का सिद्धांत देने वाले डॉक्टर जे. पावलोव की तरह ही मनोवैज्ञानिक, जॉन बी वाटसन बच्चों के मनोविज्ञान का परीक्षण करना चाहते थे. वे साबित करना चाहते थे कि कैसे ज्यादा शोर बच्चों के मन में डर पैदा कर देता है.

इस परीक्षण के लिए उन्होंने अल्बर्ट नाम के एक छोटे से बच्चे को चुना.

उन्होंने उसे खेलने के लिए खिलौने, छोटे कुत्ते और सांता क्लॉज दिया. इसके बाद उन्ही खिलौनों के पीछे से आवाज की गई. उन तेज आवाजों के कारण अल्बर्ट बहुत डर गया. यह साबित हो गया कि बच्चों के अंदर तेज आवाज से डर पैदा हो जाता है. अपने इस प्रयोग के बाद वाटसन तो ख़ुशी-ख़ुशी लोगों की वाह-वाही लूटने लगे मगर वह बच्चा अल्बर्ट बुरी तरह परेशान हो गया. उसके मन में इतना गहरा डर पैदा हो गया कि उसका बचपन उससे छिनने लगा था.

Little Albert Worst Experiment (Representative Pic: medimetry)

यह थे दुनिया के कुछ ऐसे प्रयोग जिन्हें पूरा करने के चक्कर में लोग इंसानियत भूल गए थे. यूँ तो विज्ञान ही है जो हमें आज इतनी प्रगति पर लाया है, मगर कई बार यही विज्ञान इंसानों का दुश्मन भी साबित हुआ. इन प्रयोगों के बारे में जान के पता चला कि हर चीज के दो पहलु होते हैं.

आप क्या सोचते हैं वैज्ञानिकों और उनके प्रयोग और सनक… दोनों के बारे में?

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Web Title: Worst Scientific Experiment In The World, Hindi Article

Feature Image Credit: Independent