रामायण की कथाओं में एक से बढ़कर एक प्रसंग हैं, जो मानव-जीवन के तमाम पहलुओं की उलझनों को स्पष्ट ढंग से सुलझाते नज़र आते हैं. तमाम व्यावहारिक उलझनों के बावजूद 'आदर्श' की जो परंपरा रामायण में रची गयी है, वह अन्यत्र संभव नहीं!
आखिर, आदर्श राजा, आदर्श भाई, मर्यादित आचरण से भरपूर एक सम्पूर्ण जीवन जीने का ढंग यहीं तो है.
इन तमाम सुलझी हुई कहानियों के बावजूद, रामायण में कुछ-प्रसंग ऐसे भी हैं, जिनकी कल्पना करना भी मुश्किल लगता है.

ऐसी ही एक कहानी है राम-लक्ष्मण से जुड़ी हुई...

भ्रातृ-प्रेम का अनुपम उदाहरण

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ।।
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।।

हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे. तुम्हारा स्वभाव हमेशा से ही मधुर था. मेरे हित के लिए तुमने माता-पिता को भी छोड़ दिया और वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया.

उपरोक्त उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और शेषनाग के अवतार लक्ष्मण के स्नेह की गहराई क्या थी. जब लक्ष्मण को मेघनाद द्वारा चलायी गयी 'शक्ति' लगती है और वह मूर्छित हो जाते हैं, तब अपने अनुज लक्ष्मण के लिए विलाप करते हुए राम उपरोक्त बातें ही कहते हैं.

वस्तुतः लक्ष्मण के लिए राम के अतिरिक्त कोई और प्राथमिकता थी ही नहीं. यहाँ तक कि भ्रातृ-प्रेम के लिए लक्ष्मण ने 14 वर्षों तक निद्रा-रहित जीवन व्यतीत किया था.
अपने भाई राम के लिए लक्ष्मण अपने दूसरे भाई भरत से युद्ध तक करने को तैयार हो गए थे. यह प्रसंग चित्रकूट के समय का है, जब भरत राम को वन से वापस लाने, उनको मनाने वहाँ जाते हैं.
तब लोगों की भारी संख्या, घोड़े-हाथी, दल-बल इत्यादि देखकर लक्ष्मण को लगता है कि राजा बनकर भी भरत का मन नहीं भरा और वह वन में राम से शत्रुता करने आ रहे हैं.
हालाँकि, उनकी यह कल्पना गलत निकलती है, किन्तु मूल बात यह थी कि लक्ष्मण, राम के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे.

अपने बड़े भाई राम के आदेश का पालन करने के लिए सुमित्रानंदन लक्ष्मण ने अपनी इच्छा तक का गला घोंट दिया था. यह सन्दर्भ तब का है, जब जनकनन्दिनी सीता का राम ने त्याग कर दिया था. उस समय स्वयं लक्ष्मण को ही यह आदेश मिला था कि वह सीता को वन में छोड़ आएं. लक्ष्मण तब फूट-फूट कर रोये थे

ऐसे में स्वाभाविक सा प्रश्न है कि आखिर लक्ष्मण जैसे भाई को कोई राम मृत्युदंड दे सकता था क्या?

...जब राम द्वारा लक्ष्मण को 'मृत्युदंड' देने की दुविधा आन पड़ी!

रामायण के प्रसंगों में बताया गया है कि यह सन्दर्भ उस वक्त का है, जब श्रीराम द्वारा रावण का वध हो चुका होता है. वह अयोध्या लौट कर राजकाज संभाल लेते हैं और समूची अयोध्यानगरी सुखी हो जाती है. ऐसे ही अवसर के लिए कहा गया-

दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा.
सब नर करहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती.

मतलब, रामराज्य' में दैहिक, दैविक और भौतिक दुःख किसी को नहीं था. सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों के अनुसार मर्यादा में रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं.

तत्पश्चात धोबी के कथनानुसार देवी सीता को वन में छोड़ने का प्रसंग आता है. फिर सीता के धरती में समा जाने के पश्चात लव-कुश से भगवान राम का मिलन होता है और इस दुःख की घड़ी के बाद एक बार पुनः अयोध्यावासी सुख की दिशा में बढ़ चलते हैं.

सृष्टि के नियमानुसार अब समय आ जाता है कि अपनी लीलाओं के पश्चात् प्रभु श्रीराम को अपनी लीलाओं को विराम देना होता है.

ऐसे में एक दिन यम देवता बेहद महत्व की चर्चा करने श्री राम के पास पधारते हैं. लेकिन, चर्चा शुरू करने से पहले यम भगवान राम से यह वचन ले लेते हैं, जिसके अनुसार

जब तक यम देवता और श्रीराम के बीच बातचीत चलती, तब तक उनके बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसको मृत्युदंड का सामना करना पड़ेगा. भगवान राम, यम को यह वचन दे देते हैं और यहीं से नींव पड़ती है उस प्रसंग की, जिसके ऊपर यह समूची कथा सुनायी जा रही है.

स्वयं और यम की बातचीत के लिए राम अपने भाई लक्ष्मण को ही द्वारपाल नियुक्त कर देते हैं और यह बात स्पष्ट बताते हैं कि बातचीत के बीच वो किसी को भी अंदर न आने दें, अन्यथा उसे उन्हें मृत्युदंड देना पड़ेगा.

लक्ष्मण के लिए हमेशा की तरह भाई की आज्ञा शिरोधार्य थी.

कुछ ही समय पश्चात अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध रहे ऋषि दुर्वासा का आगमन होता है. अत्यंत शीघ्रता में जब दुर्वासा ने लक्ष्मण से अपने आगमन के बारे में राम को जानकारी देने के लिये कहा तो लक्ष्मण ने विनम्र होकर मना कर दिया. फिर क्या था, अपने स्वभावानुसार ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रोधित हो गये तथा उन्होंने सम्पूर्ण अयोध्या नगरी को ही श्राप देने की बात कह डाली.

ऐसे में लक्ष्मण ने वही किया, जो कोई भी योद्धा और नागरिक-प्रेमी व्यक्ति करता!

लक्ष्मण समझ गए थे कि ऐसी विकट स्थिति में उन्हें अपने अग्रज राम की आज्ञा का उल्लंघन करना ही होगा, नहीं तो अयोध्या नगर ऋषि के श्राप की अग्नि में जल उठेगा.
बिना देरी के लक्ष्मण ने स्वयं का बलिदान देना निश्चित कर लिया और उन्होंने अंदर जाकर ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना अपने भाई को दे दी.

राम ने शीघ्रता से यम के साथ बातचीत समाप्त कर ऋषि दुर्वासा की आव-भगत की, परन्तु उन्हें बड़ी दुविधा ने घेर लिया, क्योंकि उन्हें वचनानुसार लक्ष्मण को मृत्यु दंड देना था. आखिर वचनों को लेकर रघुकुल की अपनी परंपरा जो थी-

रघुकुल रीत सदा चल आई, प्राण जाई पर वचन न जाई.

श्रीराम को हर हाल में अपने भाई को मृत्युदंड देना ही था, लेकिन अपने हृदय के टुकड़े को भला वह किस प्रकार मृत्युदंड दे सकते थे?

इस प्रकार की भारी दुविधा के बीच श्री राम ने गुरु का स्मरण किया और कोई रास्ता दिखाने को कहा. तब श्री राम के मन में ऐसा विचार आया, जिसके अनुसार "अपने किसी प्रिय का त्याग, उसकी मृत्यु के समान ही शास्त्रों में माना गया है."

अतः उन्होंने अपने वचन का पालन करने के लिए लक्ष्मण का त्याग करना निश्चय कर लिया.

हालाँकि, लक्ष्मण ने राम से कहा कि 'अपने प्रभु राम से दूर रहने से तो यह अच्छा है कि वह श्री राम के वचन का पालन करते हुए स्वयं मृत्यु को गले लगा लें.'

ऐसा विचारकर शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने सरयू में जल समाधि ले ली.

इस प्रकार दो भाइयों, जिन्होंने समस्त ज़िन्दगी एक दूसरे का सुख दुःख में साथ दिया था, उनका बिछड़ाव हो गया. विधि द्वारा रचित विधान का पालन हर एक को करना होता है, वह बेशक श्री राम हों या उनके सबसे प्रिय लक्ष्मण ही क्यों न हों!

इस कथा के सन्दर्भ में आप अपने विचारों से हमें कमेंट-बॉक्स में अवश्य अवगत कराएं!

Web Title: Why Lord Rama Gave Death Punishment to Laxman, Ramayan Stories in Hindi

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