पौराणिक कथाओं के खलनायकों का अपना एक अंदाज़ है.

ऐसे खलनायकों के सन्दर्भ में यह बात नज़र आती है कि बेहद ताकतवर होने का उन्हें अभिमान अवश्य ही होता है और इसी अभिमान के मद में वह अपनी सीमाओं का उल्लंघन भी करते हैं. कहते हैं कि एक या दो पापों का संभवतः प्रायश्चित भी होता हो, किन्तु तब क्या किया जाए जब खलनायकों द्वारा 'पाप का घड़ा' ही भर दिया जाए!

वस्तुतः यह 'पाप का घड़ा' भरने के बाद ही उनके विनाश की घड़ी नजदीक आ जाती है और फिर वह काल के गाल में समा जाते हैं.
पौराणिक कथाओं में अगर किसी विलेन को सर्वाधिक चर्चित और शक्तिशाली माना जाए तो निश्चय ही वह रावण कहा जाएगा. हम सबको ज्ञात ही है कि उसने श्रीराम की धर्मपत्नी सीता का हरण किया और इस पाप के फलस्वरूप न केवल उसका, वरन समूची श्रीलंका और राक्षस कुल का भी विनाश हो गया!

पर क्या रावण के पाप के घड़े में सिर्फ यही एक पाप था?

या फिर दूसरे तमाम पाप भी उसने किये थे, जिसके कारण अंततः वह विनाश को प्राप्त हुआ!
आइये जानते हैं...

व्यभिचारी रावण द्वारा 'रम्भा' संग दुराचार

अक्सर हमारे आपके मन में यह प्रश्न उठते रहे हैं कि महाशक्तिशाली होने और सीता का हरण करने के बावजूद रावण ने सीता के साथ जबरदस्ती करने का प्रयत्न क्यों नहीं किया?

इसके साथ एक कथा जुड़ी हुई है, जिसके अनुसार विश्वविजय के अभियान पर निकला रावण जब स्वर्गलोक पहुंचा तो उसने रम्भा नामक अप्सरा को देखा. अनुपम सौंदर्य से मोहित होकर रावण ने रम्भा पर अपना प्रेम-पांसा फेंकना चाहा, लेकिन रम्भा ने यह कहकर इंकार कर दिया कि वह नलकुबेर के साथ पत्नी की तरह रहती हैं. इस पर भी रावण नहीं माना और उसने रम्भा के साथ जबरदस्ती बलात्कार किया. हालाँकि, कुछ जगहों पर यह बात भी सामने आती है कि रावण ने रम्भा और नलकुबेर के रिश्ते का मजाक बनाया था, उसका उपहास किया था.

बहरहाल, नलकुबेर ने रावण को उसके कृत्य के लिए श्राप दे डाला था कि अगर वह किसी नारी की इच्छा के विरुद्ध उसके साथ सम्भोग करने की कोशिश करेगा तो उसका मस्तक 100 टुकड़ों में फट जाएगा.

बताते चलें कि नलकुबेर, रावण के भाई कुबेर का पुत्र था और उसी के श्राप के कारण रावण ने बुरी निगाह होने के बावजूद सीता के साथ जबरदस्ती की कोशिश नहीं की थी.

'माया' पर बुरी निगाह!

माया, रावण की पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन थी, जिसका विवाह वैजयंतपुर के राजा शंभर से हुआ था. एक बार रावण वैजयंतपुर गया तो माया को देखकर उसके मन में वासना जाग गयी. माया के मना करने के बाद भी रावण अपनी वासना पर काबू नहीं रख सका और अंततः यह बात शंभर को पता चल गयी.
शंभर वीर था और रावण को उसने तत्काल बंदी बना डाला.
कहते हैं ठीक उसी समय राजा दशरथ ने वैजयंतपुर पर हमला किया था और उक्त हमले में शंभर की मृत्यु हो गयी.
शंभर की मृत्यु के पश्चात भी रावण का वासनायुक्त मन काबू में न रहा... उसने माया के साथ जबरदस्ती करनी चाही. ऐसी स्थिति में रावण को माया ने श्राप दे डाला कि 'स्त्री वासना' के कारण ही उसकी मृत्यु होगी.

तपस्विनी संग दुराचार की 'कोशिश'

रावण के पापों की कहानी यहीं तक नहीं है, वरन इससे आगे भी उसने कई बार सीमाएं लांघीं.
एक बार अपने पुष्पक विमान से रावण कहीं जा रहा था, तभी उसकी दृष्टि एक तपस्विनी पर पड़ी और वह मोहित हो गया.
वह तपस्विनी भगवान विष्णु की तपस्या में लीन थी, लेकिन इसकी परवाह न करते हुए रावण ने उस योगिनी के बालों को पकड़कर घसीटा, जिससे अपमानित होकर उस नारी ने अपने प्राण त्याग दिए.
लेकिन जाते-जाते रावण को वह कठोर श्राप दे गयीं कि उनका अंत स्त्री के कारण ही होगा.

शिव के 'सेवक का उपहास'

नंदी महाराज शिव के अनन्य भक्त माने जाते हैं, साथ ही उनके वाहन भी हैं.
रावण ने ताकत के मद उनका उपहास भी उड़ाया था.
यह प्रसंग बेहद रोचक है और ताकत के नशे में रावण के डूबे होने की पुष्टि भी करता है.
रावण संहिता में स्पष्ट किया गया है कि कुबेर पर विजय प्राप्त कर जब रावण लौट रहा था तो वह कैलाश पर्वत पर कुछ देर के लिए रुका था. वहीं पर शिव के प्रमुख गण नंदी के कुरूप स्वरूप को देखकर रावण ने भयंकर उपहास किया. बस फिर क्या था... नन्दीश्वर ने क्रोध में आकर रावण को यह श्राप दे डाला कि वह जिस पशु स्वरूप को देखकर व्यंग्य कर रहा है, उन्हीं के कारण उसका सर्वनाश हो जाएगा.
वस्तुतः इसी कारण बंदरों द्वारा रावण के सर्वनाश में मुख्य भूमिका निभाई गयी.

शूपर्णखा की नाराजगी

शूपर्णखा को भला कौन नहीं जानता है!
आखिर, उसी की एंट्री के बाद ही तो रावण और दूसरे राक्षसों का कथा में प्रसंग आया था, अन्यथा राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित आराम से पंचवटी में रह रहे थे.
अब आप कहेंगे कि भला शूपर्णखा रावण का बुरा क्यों चाहने लगी?
तो आइये, इस कथा की तरफ बढ़ते हैं.

प्रसंग है शूपर्णखा के पति विद्युतजिव्ह का. विद्युतजिव्ह कालकेय नामक राक्षस राजा का सेनापति था और जब रावण विश्वविजय के अभियान पर निकला था, तब कालकेय के साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ था. इसी युद्ध में विद्युतजिव्ह को भी रावण ने यमलोक पहुंचा दिया और तभी शूपर्णखा ने मन ही मन ठान लिया था कि वह ही रावण के विनाश का कारण बनेगी.

अनरण्य का 'श्राप'

रावण की वह कथाएं तो आपने सुनीं, जिसमें कई श्राप उसकी वासना के कारण उसे मिले थे तो कुछ लोगों का उपहास करने से. अपनी बहन के पति का वध करने के कारण उसकी बहन भी उस पर खफा थी, किन्तु यह प्रसंग रघुकुल से जुड़ा हुआ है.
वही रघुकुल, जिसमें राम का जन्म हुआ और जिन्होंने रावण का वध किया.

किन्तु, यह कथा राम के जन्म से बहुत पहले की है.

तब रघुकुल में अनरण्य नामक राजा हुआ करते थे. विश्वविजय के अभियान पर तब रावण अक्सर ही निकल जाया करता था और इसी क्रम में उसका अनरण्य से भयंकर युद्ध हुआ. रावण के हाथों अनरण्य मृत्यु को प्राप्त हो गये, किन्तु उन्होंने जाते-जाते यह श्राप दे डाला कि रावण का विनाश होगा और ज़रूर होगा, वह भी रघुकुल के ही किसी वंशज के हाथों!

जाहिर है कि इन श्रापों के प्रभाव में फंसकर रावण जैसा महावीर, महाज्ञानी, विश्वविजयी योद्धा विनाश को प्राप्त हुआ.
सच ही तो कहा गया है कि 'पाप का घड़ा भर जायेगा और 'तुम्हें' प्रायश्चित का मौका भी नहीं मिल पायेगा'!

आप क्या कहेंगे 'पाप के घड़े' की परिकल्पना पर?

Web Title: Sins of Ravana, Ramayana Stories in Hindi

Featured image credit: prayatn