अभी हाल ही में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की भारत यात्रा के दौरान जो टर्म सर्वाधिक चर्चित रहा, वह है ‘बुलेट ट्रेन’.

हालाँकि, भारत के लिहाज़ से इस अति महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी, लेकिन इस बार भारत और जापान के राष्ट्राध्यक्षों ने इसकी आधारशीला रखी. हम सभी जानते हैं कि बुलेट ट्रेन का अभिप्राय गोली की रफ़्तार की तरह तेज चल सकने वाली ट्रेन से है.

पर इससे जुड़े ऐसे कई फैक्ट्स हैं, जिनसे तमाम लोग अनजान होंगे. मसलन जापान, चीन सहित दुनिया के किन विकसित देशों में इसका विस्तार है. भारत को इससे क्या लाभ होने वाला है या फिर हमारे सामने किस प्रकार की चुनौतियां हैं. आइये इन तथ्यों पर एक नज़र डालने की कोशिश करते हैं…

‘शिनकानसेन’ का इतिहास

जी हाँ, जापान में बुलेट ट्रेन को शिनकानसेन के नाम से भी जाना जाता है. विश्व भर में पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के लिहाज़ से अपना हाई स्टैण्डर्ड रखने वाले जापान में तकरीबन 2600 किलोमीटर का बुलेट ट्रेन नेटवर्क है.

1964 के टोकियो ओलम्पिक से तुरंत पहले 1 अक्टूबर को टोकैडो शिनकानसेन नाम से इसे शुरू किया गया था. इसकी सफलता का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अपने शुरू होने के मात्र 3 साल के भीतर इसने 100 मिलियन से अधिक यात्रियों को उनके गंतव्य पहुंचाने में सफलता प्राप्त कर ली थी.

इसके अलावा भी जापान का रिकॉर्ड हाई स्पीड रेल नेटवर्क में बेहद उम्दा है और यह कहना कुछ गलत नहीं होगा कि भारत ने इस कड़ी में जापान के साथ शुरुआत करके एक हाई स्टैण्डर्ड पर कार्य करना शुरू किया है, जिसके नतीजे निकट भविष्य में बेहद सार्थक हो सकते हैं.

500 Series Shinkansen (Pic: Wiki)

यह इस लिहाज से कहीं ज्यादा उत्तम है कि जो दूसरे देश भारत में हाई स्पीड रेल नेटवर्क में अपनी रुचि दिखला रहे हैं, उनके सामने जापान की शिनकानसेन मुंबई अहमदाबाद बुलेट रूट के जरिये एक स्टैण्डर्ड पेश कर चुकी होगी.

चीन भी कुछ कम नहीं!

जापानी पीएम की भारत यात्रा के दौरान ही चीन का बयान भी आया कि वह भारत में हाई स्पीड रेल नेटवर्क डेवलप करने में रुचि रखता है. गौरतलब है कि चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग के अनुसार, चीन भारत में चेन्नई-नई दिल्ली और नई दिल्ली-नागपुर के बीच हाई स्पीड ट्रेन प्रोजेक्ट की संभावित स्टडी पहले ही कर चुका है. कहा जा सकता है कि चीन भी भारत में हाई स्पीड रेल नेटवर्क की बड़ी सम्भावना को देखते हुए कोई कोर कसर नहीं रखना चाहता है.

वैसे भी टेक्नोलॉजी के लेवल पर चीन सस्ते प्रोजेक्ट्स करने के लिए विख्यात है. जहाँ तक वर्क क्वालिटी की बात है, तो जापान के पहले ही मैदान में आ जाने से चीन के सामने एक प्रतियोगी वातावरण, जिसमें कार्य का उच्च स्तर निहित होगा, निश्चित तौर पर मौजूद रहने वाला है.

यूं तो बुलेट ट्रेन के मामले में चीन का ट्रैक रिकॉर्ड जापान की तुलना में काफी नया है. यह 30 जून 2011 को शंघाई और बीजिंग के बीच में शुरू की गयी थी. वैसे इससे पहले 2008 में बीजिंग में पैसेंजर बुलेट ट्रेन पटरियों पर दौड़ चुकी थी. स्पीड की बात करें तो चीन में चलने वाली बुलेट ट्रेन की अधिकतम स्पीड 250-350 किलीमीटर प्रति घंटा बतायी जाती है.

इसी कड़ी में चीन ने बाद के दिनों में तेजी से इन संभावनाओं पर कार्य किया और आज के समय में बुलेट ट्रेन से जुड़ा उसके पास लगभग 10 हज़ार किलोमीटर का नेटवर्क है. इसमें कई जगहों पर कार्य चल भी रहा है, किन्तु निश्चित रूप से यह चीन की स्पीड को दिखलाता है.

Bullet Train Concept in China (Pic: Chinadiscovery)

चीन के मामले में यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि वह किसी नयी तकनीक को न केवल खुद आजमाता है, बल्कि उसे अधिकाधिक जगहों पर त्वरित गति से बेचने की खूबी उसे सलीके से आती है.

अन्य देश भी नहीं हैं कम!

इन दोनों देशों से भारत में बुलेट ट्रेन के लिए सीधी बात चल रही है, किन्तु ऐसा नहीं है कि सिर्फ यही देश बुलेट ट्रेन की तकनीक के महारथी हैं, बल्कि खुद अमेरिका में चलने वाली बुलेट ट्रेन बेहद ख़ास मानी जाती है, जिसकी अधिकतम गति तकरीबन 354 किलोमीटर प्रति घंटा है. इसी तरह, जर्मनी में चलने वाली बुलेट ट्रेन की अधिकतम स्पीड 300 किलोमीटर पर ऑवर है. गौरतलब है कि जर्मनी की सबसे तेज बुलेट ट्रेन बर्लिन, हैम्बर्ग और कोलोन शहर के बीच चलती है.

यूं तो कोरियाई प्रायद्वीप इस वक्त तानाशाह किम जोंग उन और उसके परमाणु परीक्षणों के कारण विश्व भर में चर्चित है, किन्तु आपको जानकर हैरानी होगी कि साउथ कोरिया में चलने वाली बुलेट ट्रेन विश्व भर में सबसे तेज कही जाती है. वर्तमान में वहां चलने वाली सबसे तेज ट्रेन की गति 421 किलोमीटर प्रति घंटा है. सन 1992 में दक्षिणी कोरिया की राजधानी सियोल और बुसन शहर के बीच बुलेट ट्रेन चली थी.

उपरोक्त देशों के अतिरिक्त विश्व के दूसरे तमाम देश जिसमें ऑस्ट्रिया, यूके, फ़्रांस, स्पेन, स्वीडन, इटली, बेल्जियम, पोलैंड, पुर्तगाल, उज्बेकिस्तान जैसे दूसरे देश भी इस हाई स्पीड तकनीक से लैस हैं. जाहिर तौर पर इस हाई स्पीड क्लब में शामिल होना भारत के लिए बेहद खास होगा.

भारत के सामने चुनौतियां एवं लाभ

भारत में बुलेट ट्रेन नेटवर्क की जबसे चर्चा शुरू हुई है, लगभग तभी से आलोचकों का एक बड़ा तबका देश की वर्तमान रेल व्यवस्था की याद दिला रहा है, जिसकी हालत खस्ता है. आखिर हो भी क्यों ना, 8 बिलियन से अधिक यात्री इससे प्रतिवर्ष यात्रा करते हैं, तो विश्व का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क भारत में ही है.

इतनी बड़ी जनसंख्या का बोझ इंडियन रेलवे उठा तो जरूर रही है, किन्तु दिन पर दिन बढ़ रही दुर्घटनाओं की संख्या ने इसकी जर्जर हालत को सबके सामने रखा भी है. ऐसी स्थिति में जब लोगों के पास समय की लगातार कमी है, तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि बुलेट ट्रेन जैसे नए प्रयोग किये जाने की आवश्यकता आन पड़ी थी.

यह ठीक है कि इसमें एक हेवी इन्वेस्टमेंट किया जा रहा है, किन्तु 1998 में शुरू हुए दिल्ली मेट्रो के प्रयोग को भला कैसे भूला जा सकता है? इसकी सफलता ने दिल्ली जैसे बड़े महानगर के व्यापक ट्रैफिक सिस्टम का बड़ा हिस्सा संभाल रखा है. इस प्रयोग की सफलता ही है जो आज लखनऊ, जयपुर, बेंगलुरु, मुंबई और न जाने कितने शहरों में इसका प्रयोग शुरू हो चुका है.

ऐसी स्थिति में भारत जैसे देश में जहाँ रेल नेटवर्क आम लोगों की जान है, वहां इस तरह के प्रयोग को नकारे जाने की कोई वजह नज़र नहीं आती है.

Indian PM Modi with Japanese’s Shinzo Abe (Pic: JapanTimes)

हाँ, इस अहमदाबाद-मुंबई के पहले बुलेट ट्रेन प्रयोग की सफलता ही यह बात तय करेगी कि बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट इंडियन रेल नेटवर्क की मजबूती में इजाफा करता है या फिर यह अव्यवहारिक रूप से आर्थिक बोझ ही बढ़ाता है. तो असल बात इसके एक्जीक्यूशन पर आकर टिक जाती है, किन्तु कहा जा सकता है कि जापान के इस मामले में शामिल होने से एक स्टैण्डर्ड हमेशा कायम रहेगा. खासकर तब जब इंडियन पॉलिटिकल सिस्टम उसके सपोर्ट में मजबूती से खड़ा हो!

Web Title: Bullet Train Concept and Opportunity in India, Hindi Article

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