Jallikattu and related traditions in India, Hindi Article on Indian Culture (Pic Credit: India.com)

पिछले कई दिनों से तमिल नाडु में खेले जाने वाला परंपरागत खेल “जल्लीकट्टू” को लेकर काफी हंगामा किया जा रहा है. बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने चार साल पहले इस खेल पर प्रतिबन्ध लगा दिया था और उसी प्रतिबन्ध को हटाने के लिए लाखों लोग चेन्नई के मरीना बीच पर इकठ्ठा हो कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. अब तक शांतिपूर्ण रहा यह प्रदर्शन हिंसा की तरफ बढ़ चुका है.

देश भर के कई हिस्सों में लोगबाग इस खेल को लेकर बेहद अचरज में हैं और इस बारे में ज्यादा जानने की कोशिश भी कर रहे हैं. एक तरफ वे लोग हैं जो इस परंपरागत खेल को बनाये रखने के पक्ष में खड़े हो रहे हैं, तो दूसरी ओर जानवरों पर अत्याचार की बात भी कही जा रही है.

सुपरस्टार रजनीकांत, कमल हासन, ए. आर रहमान, धनुष जैसे बड़े सितारे तो खुलकर ‘जल्लीकटूट’ के समर्थन में हैं. ऐसे में इस खेल ‘जल्लीकट्टू’ और इस जैसी दूसरी परम्पराओं को जानना लाजमी हो जाता है:

आखिर यह जल्लीकटूट है क्या ?

हमारा देश परम्पराओं एवं उत्सवों के लिए ही जाना जाता है. देश के अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न त्यौहारों पर अलग तरह के खेल आयोजित किये जाते हैं, जैसे कुश्ती का दंगल! ऐसे ही, तमिल नाडु में पोंगल (देश के विभिन्न हिस्सों में ‘मकर संक्रांति’) के आसपास एक खेल का आयोजन होता रहा है, जिसमें बैलों की रेस कराई जाती रही है. समय के साथ इस खेल में काफी बदलाव भी हुए हैं. पुरानी मान्यता के अनुसार पोंगल के त्यौहार में मुख्य रूप से बैल की पूजा की जाती रही है, क्योंकि बैल के माध्यम से किसान अपनी जमीन जोतता था और उसी से कृषि उत्पादन हुआ करता था.

पुराने समय में इसे ‘सल्लीकटूट’ कहा जाता था. इसमें ‘सल्ली’ का अर्थ होता है ‘सिक्के’ और इस खेल का मुख्य प्रारूप होता था दौड़ते हुए बैल के सिंग में सिक्के की माला डालना. पर जैसा कि दूसरी परंपराएं बदलीं, धीरे-धीरे यह खेल भी सल्लीकटूट से जल्लीकट्टू बन गया और इसका रूप बैलों के सींगों में ‘सिक्के की माला’ डालने से लेकर कई जगह ‘सींगों’ को तोड़ने की हद तक बढ़ गया.

Cock Fighting, Jallikattu and related traditions in India (Pic Credit: IndianExpress.com)

ऐसे खेल और भी हैं … क्या ?

जी हाँ, न केवल जल्लीकट्टू, बल्कि देश विदेश में आपको ऐसे तमाम खेल मिल जायेंगे, जहाँ मनोरंजन के नाम पर तो कहीं परंपरा के नाम पर जानवरों के साथ इंसान कई बार खेल करता है तो कई बार यह ‘क्रूरता’ भी हो जाती है. विदेशों में स्पेन की ‘बुल फाइटिंग’, अमेरिका में बुल राइडिंग इत्यादि को तो हम जानते ही हैं, अपना देश भी इस मामले में कुछ कम नहीं है. यहाँ-

  • कर्नाटक में एक खेल के दौरान लोमड़ियों का शिकार किया जाता था, इन्हें पकड़ा जाता था, पीटा जाता था और जिंदा जला दिया जाता था. अब इसकी जगह ‘कंबाला’ ने ले ली है. इसमें गायों को पानी की तेज धारा में दौड़ाया जाता है. लगातार पिटाई और पानी के तेज बहाव में दौड़ने से कई गायों के पैर टूट जाते हैं जिससे वे मर भी जाती हैं. हालाँकि, इस खेल पर भी प्रतिबन्ध लग चुका है, किन्तु खबरें आ रही हैं कि जल्लीकट्टू आंदोलन का उदाहरण लेकर कुछ लोग ‘कंबाला’ को लेकर राजनीति कर सकते हैं.
  • असम के गांवों में बुलबुल की लड़ाई कराने का प्रचल रहा है. हालाँकि, गुवाहाटी हाई कोर्ट की वेकेशन ब्रांच ने इस पर भी रोक लगा दी है, पर इसका भी अनधिकृत आयोजन करने के प्रयास किये ही जाते हैं. इन लड़ाइयों में चिड़ियों के पंख टूट जाते हैं और नाजुक, छोटी चिड़िया मर भी जाती हैं.
  • इसी तरह आंध्र प्रदेश में लाखों मुर्गों को अंधेरे पिंजरों में रखा जाता है और इन्हें तब तक लंबी लकड़ियों से कुरेदा जाता है जब तक कि ये हिंसक नहीं हो जाते. इसके बाद इनके पंजों में धारदार रेजर बांध दिए जाते हैं. इसके बाद इन मुर्गों की आपस में लड़ाई कराई जाती है. ये मुर्गे धारदार रेजरों से एक-दूसरे के शरीरों को काटते हैं. अंत में एक मुर्गा अपनी चोटों से तत्काल मर जाता है, तो जीतने वाला मुर्गा भी कुछ देर में मर ही जाता है.
  • गोवा में बैलों की लड़ाइयां आयोजित की जाती हैं. शराब पिलाकर दो बैलों को लड़ाया जाता है. ये बैल एक-दूसरे पर सींगों से हमला करते हैं, तो नशे में धुत्त भीड़ शोर मचाती है और इन जानवरों पर चीजें फेंकती है ताकि ये और उग्र होकर आपस में लड़ें.
  • इसी कड़ी में महाराष्ट्र में ग्रामीण दौड़ें, जिनमें बैलों और भैसों शराब पिलाकर एक-दूसरे से बांधकर दौड़ाया जाता है, तो गुजरात में पतंग उड़ाने के फेस्टिवल पर (मकर संक्रांति के शुरू होने के समय) नायलॉन के धागे पर चिपकाए गए कांच से बने मांझे से तकरीबन तीन लाख से ज्यादा पक्षी इस दौरान मर जाते हैं. अगर जानवरों की हत्या की बात करें तो तमाम समुदायों के त्यौहार में बकरों ,गायों, और ऊंटों की बड़ी संख्या में हत्या की जाती है, जिसके परिणाम स्वरुप कई दिनों तक सड़कों और नालों में खून बहता रहता है.

Kambala Tradition, Jallikattu and related traditions in India, Animal Rights (Pic Credit: Youtube)

क्या कहती है हमारी संस्कृति ?

हमारे देश में त्यौहारों और पर्वों के माध्यम से अपनी ख़ुशी मनाने की परंपरा सदा से ही रही है. इसमें प्रकृति के साथ-साथ जानवरों की सहभागिता भी रहती है.

चूंकि, हमारा देश कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था रहा है, इसलिए गायों और बैलों से सम्बंधित परम्पराओं की संख्या कहीं ज्यादा रही है. वस्तुतः जानवरों और प्रकृति के पूजन की परंपराएं कालांतर में विकृत होकर ‘ग्लैमर’ बटोरने और ‘हिंसक मनोरंजन’ के रूप में कुख्यात हो चुकी हैं.

कई लोग अथवा लोगों का समूह ऐसे अवसरों को बदनाम करने में पीछे नहीं हटते हैं, क्योंकि कई बार इससे उनकी आमदनी भी जुड़ी होती है. ऐसे में ‘जल्लीकटूट’ जैसे उत्सवों के नियम तय करने की आवश्यकता है. जनता को भी राजनेताओं के दांव पेंच समझने की कोशिश करनी चाहिए, और अपनी लड़ाई अथवा प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से ही करना चाहिए. इस क्रम में, साउथ के मशहूर अभिनेता कमल हासन ने जल्लीकट्टू के सपोर्ट में कुछ ऐसा ही कहा है कि “स्पेन की बुल फाइट में जानवरों को चोट पहुंचती है, जबकि जल्लीकट्टू में सांडों को परिवार का हिस्सा मानकर देवताओं की तरह पूजा जाता है.” काश कि देश के विभिन्न हिस्सों में जानवरों के साथ ‘निर्दयता’ से पेश आने वाले लोग ऐसा ही सोचते!

Bull Fighting, Hindi Article on Animal Rights (Pic Credit: esdaw.eu)

Web Title: Jallikattu and related traditions in India, Hindi Article on Indian Culture

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