गुड़गांव से नोएडा लौटते वक्त मैंने टैक्सी ड्राइवर से पूछा कि भाई, कहां के रहने वाले हो? कब से गाड़ी चला रहे हो?

जवाब मिला, बुंदेलखण्ड का और पिछले 2 साल से गाड़ी चला रहा हूं.
क्या मैं पूछ सकता हूं कि तुमने ड्राइवरी को ही क्यों चुना?
साहब क्या करते पढ़ा-लिखा हूं नहीं और गांव की खेती किसानी का तो तुमको पता ही है. मरते क्या न करते आ गये शहर…

इस तरह के कई सवाल मैंने उस टैक्सी ड्राईवर से पूछे. निष्कर्ष था बुंदेलखण्ड बदहाली की ओर बढ़ रहा है. किसानों की हालत दयनीय हो चली है और युवा पलायन को मजबूर हैं.

सवाल-जवाब का सिलसिला

अब मन में सवाल था कि आखिर ऐसा क्यों है? जबकि, समय-समय पर इस राज्य के लिए विशेष पैकेजों की घोषणा होती रहती है. राहुल गांधी, अखिलेश यादव और दूसरे राजनीतिक दिग्गज वहां हर चुनाव में नज़र आते हैं. फिर ऐसे कौन से कारण हैं, जिनके कारण स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है? इनके जवाब उस टैक्सी ड्राइवर से जानने की कोशिश करता, इससे पहले उसने गाड़ी पर ब्रेक मारते हुए कहा भाई साहब हम पहुंच गये. उसका किराया देते हुए धन्यवाद कहा और अपने घर पर आ गया.

यात्रा खत्म हो चुकी थी और ड्राइवर जा चुका था, लेकिन बुंदेलखंड के किसानों की बदहाली के सवाल अभी भी गले में फंसे हुए थे. मन नहीं माना तो कुछ बुंदेलखंड के दोस्तों से मिलने चला गया, जो पास में ही रहते थे.

देर न करते हुए मैंने उनसे पूछा, भाई आपके यहां खेती किसानी के क्या हाल है? पैदावार तो अच्छी होगी. उन्होंने टोकते हुए कहा, न भाई कुछ नहीं होता खेती किसानी में. अपने ही घर की बात करुं तो हमारे पास कहने के लिए ढ़ेर सारी जमीन है. ट्यूबवेल, ट्रैक्टर जैसे सभी जरुरी संसाधन भी हैं. इस कारण ज्यादा दिक्कत नहीं होती फसल की बुआई से लेकर कटाई तक. बावजूद इसके ले-देकर लागत निकल आये, वही काफी होता है.

Bundelkhand Farmers (Pic: livemint.com)

पानी का गिरता स्तर…

चर्चा आगे बढ़ी तो मैंने पूछा, सुना है आपके बुंदेलखण्ड में पानी की बहुत समस्या है? हां दोस्त पानी की तो समस्या है. वह कुंए बिल्कुल सूख चुके हैं, जिन पर हम कभी बचपन में बैठकर नहाया करते थे. तालाब भी या तो मर हो चुके हैं या फिर मृत होने की कगार पर हैं. कुछ सालों में वक्त कुछ यूं बदला है कि पूरा गांव भूगर्भीय जल स्रोतों पर निर्भर हो चला है. अब जब जल स्तर कई मीटर नीचे होता जा रहा है, तो समस्या सबके सामने है.

बड़ों की माने तो पिछले कुछ वर्षों में भूगर्भ को रिचार्ज करने वाले तालाब उजड़ चुके हैं. साथ ही ट्यूबवेलों व हैंडपंपों की संख्या लगातार बढ़ी है. परिणाम स्वरुप बुंदेलखण्ड के ज्यादातर इलाके भीषण सूखे की चपेट में आ चुके हैं. इस लिहाज से देखा जाये तो पानी की एक बड़ी समस्या से बुंदेलखण्ड लगातार जूझ रहा है.

स्थाई समाधान की अनदेखी

साथी आगे बताते हुए कहता है कि ऐसा नहीं है कि समस्या इतनी बड़ी है कि इसका समाधान नहीं हो सकता. बस पानी की समस्या के स्थाई सामाधान के लिए जरुरत है वहां के प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख की! यह संजीवनी बन सकती है, पर अफसोस ऐसा होता नहीं दिख रहा. इनको लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है. गांव जाने पर कभी चर्चा होती है तो बड़े बताते हैं कि बुंदेलखण्ड में हमेशा से कम बारिश होती रही है. बस पहले लोग कम पानी में काम चला लेते थे और आज सभी को ज्यादा पानी चाहिए.

वह पानी के लिए पूरी तरह से सरकार के ऊपर निर्भर हो चुके हैं. सरकार भी अपनी जिम्मेदारी तय नहीं करती दिखती. हां, सूखे के नाम पर राहत राशि का ऐलान जरुर होता रहा है. जबकि, बुंदेलखण्ड को राहत पैकेज नहीं बल्कि वहां मौजूद पानी के संसाधनों को जिंदा करने की जरुरत ज्यादा है.

यहां पर ‘जलपुरूष’ के नाम से मशहूर राजेंद्र सिंह का जिक्र जरुरी है. सभी जानते हैं कि कैसे उनके जल प्रबंधन से राजस्थान के करीब 1000 गांवों में फिर से पानी उपलब्ध हो गया. ऐसे में क्या बुंदेलखण्ड में यह नहीं हो सकता? बिल्कुल हो सकता है. बशर्ते इच्छा शक्ति होनी चाहिए. बुंदेलखंड में धसान, केल, केन जैसी गहरी नदियां हैं, जिनमें पानी कम होता जा रहा है. उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है. अगर इन नदियों पर छोटे-छोटे बांध बन जाये तो पानी को रोका सकता है. इससे पानी की किल्लत से पूरी न सही, लेकिन काफी हद तक राहत तो मिल ही सकती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

  • बारिश के पानी की एक-एक बूंद के संचयन के बाद ही इस क्षेत्र को सूखे से बचाया जा सकता है: संजय सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता
  • जलस्रोत खत्म होते जा रहे. देश का अन्नदाता अब मजदूर में तब्दील होता जा रहा है. इसे किसी भी हालात में बचाए जाने की जरूरत है. यह किया जा सकता है: राजेन्द्र सिंह, जल पुरुष

Rajendra Singh (Pic: Wikki )

प्रशिक्षण और तकनीक

गांव के लोगों के प्रशिक्षण पर जवाब देते हुए साथी कहता है, सभी जानते हैं कि एक लम्बे अरसे से बुंदेलखण्ड सूखे से जूझ रहा है. ऐसे में वहां कम पानी वाली खेती लाभकारी सिद्ध हो सकती है. मसूर इसका एक बड़ा उदाहरण है. इसके अलावा बागवानी भी की जा सकती है. परंतु जानकारी के अभाव के कारण अक्सर यहां के किसान इनको नहीं चुनते. किसी और की बात क्या मेरे पिता जी खुद नहीं चुनते. इसके पीछे उनका तर्क होता है कि कम पानी वाली खेती का बाजार में उचित दाम नहीं मिलता. उन्हें खूब समझाने की कोशिश की जाती है पर वह समझने के लिए तैयार नहीं होते और लगातार नुकसान झेलते रहते हैं.

खैर, यह तो मेरी बात थी कि मैं पिता जी से बात कर सकता हूं. उन्हें समझा सकता हूं, लेकिन गांव में मौजूद उन ढ़ेर सारे परिवारों का क्या, जिनके परिवार में बहुत कम पढ़े लिखे लोग हैं? उन्हें कम पानी और ज्यादा पानी वाली खेती का फायदा कौन समझायेगा? अब आप कहेंगे कि सरकार ने किसानों के लिए ढ़ेर सारे हेल्पलाइन नंबर जारी कर रखे हैं, तो उनकी मदद ली जा सकती है.

मैं सहमत हूं आपसे. मैंने भी टीवी पर केंद्र सरकार के कई विज्ञापन देखे हैं. इनमें खुशहाल किसानों की तस्वीरें दिखाई जाती हैं. मेरा देश बदल रहा है का टाइटल सांग भी बजता सुनाई देता है. अफसोस मेरा गांव नहीं बदला है. प्रशिक्षण के नाम पर ‘स्किल इंडिया’ योजना के लिए केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है. प्रधानमंत्री मोदी कभी हमारे गांव आयेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि उनकी यह योजना कितनी कारगार हुई है.

अखिलेश सरकार ने भी अपने कार्यकाल में बुंदेलखण्ड के लिए ढ़ेर सारी योजनाओं की घोषणा की. इसी में एक योजना के तहत उन्होंने मनरेगा के तहत 100 के स्थान पर रोजगार दिवसों की संख्या बढ़ाकर 150 कर दी थी. इसकी खूब सराहना हुई थी, जो ठीक भी था. लेकिन, इस योजना में मजदूरों के प्रशिक्षण के लिए कुछ नहीं था. यही कारण रहा कि मजदूर मनरेगा से आगे नहीं निकल सके.

युवाओं का तेजी से बढ़ता पलायन

चर्चा चल ही रही थी कि, अचानक मेरा ध्यान एक बार फिर से पिछली शाम मिले टैक्सी ड्राइवर पर चला गया. साथी ने टोकते हुए कहा, कहां खो गये दोस्त. मैंने कहा कहीं नहीं. यह सूखा, प्रशिक्षण, राहत राशि तो ठीक है, लेकिन यह बताओं लोग सैकड़ों बीघें जमीन छोड़कर शहरों की तरफ क्यों बढ़ रहे हैं. वैसे तो इस सवाल का सीधा जवाब खेती-किसानी की बदहाली था, पर शायद मैं कोई नया जवाब सुनना चाहता था.

साथी ने उत्तर देते हुए कहा, हमारे क्षेत्र के किसानों को ‘वोट बैंक’ मानकर सरकारों ने सिर्फ बहलाया-फुसलाया. सही रास्ता दिखाने की कोशिश नहीं की. यही वजह है कि गांव तेजी से वीरान होते जा रहे हैं और शहर अनामंत्रित लोगों के बोझ से परेशान है. दिल्ली में हमारे यहां के ढ़ेर सारे लोग मिल जायेंगे. दूर न जाते हुए हमें ही देख लो.

लोग शहरों की तरफ न भागे तो क्या करें. उनकी थाली से दाल नदारद हो गई है. वे सुबह और शाम आलू या घर के आस-पास जतनपूर्वक उगाई गई एकाध हरी सब्जी खाकर गुजारा करते हैं. तकलीफ होती है इन लोगों को देखकर, क्योंकि यह वहीं लोग हैं, जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी जेठ की दोपहरी में हल चलाकर अनाज पैदा किया.

पलायन का एक और बड़ा कारण कर्ज भी है. हर साल बेहतर फसल की उम्मीद से किसान कर्ज लेते जाते हैं. बाद में जब कर्ज की राशि ज्यादा हो जाती है तो वह कर्ज की राशि को उतारने के लिए शहरों की तरफ आ जाते हैं. ऐसे में कुछ लोग परेशान होकर खुदकुशी भी कर लेते हैं. इससे कई आंदोलनों का जन्म होता है. साथ ही सियायत गर्म हो जाती है.

बदहाल किसान नहीं बनते मुद्दा!

सरकारों के साथ समस्या यह है कि वह इनका स्थायी समाधान निकालती. वह किसानों के आक्रोश को कानून और व्यवस्था की समस्या समझकर फैसले लेती है. ऐसा नहीं होता, तो हमारे बुंदेलखण्ड से समय-समय पर आंदोलन की खबरें न सुनने को मिलती. गजब की बात तो यह है कि बुंदेलखण्ड के बदहाल किसानों के लिए कोई एक पार्टी या कुछ नेता नहीं, बल्कि पूरी की पूरी सियासत दोषी है. इसी वजह से समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं.

आंकड़े परेशान करने वाले हैं. आप यकीन नहीं करेंगे, 2002 से लेकर 2016 तक के बीच बुंदेलखंड एक नहीं आठ बार सूखा झेल चुका है. इसके परिणाम स्वरुप यहां की खेती-किसानी चौपट हो गई. यही नहीं सूखे की इस मार ने लगभग 18 लाख किसानों को मजदूर बनने पर विवश कर दिया.

आज मोदी सरकार सत्ता में है तो लोग उसकी आलोचना कर रहे रहे हैं. पर सच तो यह है कि ऐसा ही हाल कांग्रेस का भी रहा है. कांग्रेस के राहुल गाँधी ने गरीब किसानों के साथ खाते हुए तस्वीरें तो खिंचाई, किन्तु उनकी सरकार भी सत्ता के दौरान ठोस कदम उठाने से दूर ही भागती रही. आज जब वह विपक्ष में है तब जेएनयू व सहिष्णुता जैसे गैर जरूरी मुद्दों को लेकर संसद को ठप्प करते देखे जाते हैं. अफसोस होता है कि हमारे बुंदेलखंड के दर्द की आवाज बनना इन्हें कतई जरूरी नहीं लगता है.

Real Issues of Bundelkhand Farmers (Pic: thehindubusinessline.com)

इस चर्चा के बाद मैं पिछली शाम को मिले टैक्सी ड्राइवर के दर्द को महसूस कर पा रहा था. उससे मिलने के बाद जेहन में जन्में सारे सवालों के जवाब मेरे पास थे. बुंदेलखण्ड के किसानों की बदहाली को लेकर तस्वीर एकदम साफ थी. समझ आ रहा था कि क्यों बदहाल किसान आत्महत्या का रास्ता चुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं?

Web Title: Real Issues of Bundelkhand Farmers, Hindi Article

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