पहले चुनाव प्रजातंत्र की मजबूती के लिए होते थे, आज प्रतिष्ठा की लड़ाई के लिए होते हैं. पहले प्रेम और युद्ध में सब जायज़ होता था, अब यह बात चुनाव में भी लागू होती है. येन, केन, प्रकारेण वाले प्राचीन और साम, दाम, दंड, भेद वाले मध्यकालीन तथा ‘बाई हुक और बाई क्रुक’ वाले आधुनिक हथकंडे अजमाने के बाद नेता चुनाव के परिणाम का बिलकुल वैसे ही इंतज़ार करता है जैसे दंगल के महावीर फोगाट हर फंडे लगाने के बाद लड़का पैदा होने का इंतज़ार करते थे.

लड़के या लड़की का पैदा होना तो ऊपर वाले के हाथ में होता है, लेकिन चुनाव के धरती लोक के महारथियों के पास चुनाव परिणाम अपने पक्ष में करवाने की शराब, कबाब और शबाब रुपी सहायता सामग्री भी होती है. यही सामग्री जब उनकी व्यक्तिगत सार्वजनिक वितरण प्रणाली से उनके वोटरों में बंटती है, तब चुनाव परिणाम के लिए उनका सकारात्मक होना स्वाभाविक ही है. लेकिन कहा जाता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा और जनता किस ओर अपना वोट डालेगी यह कहना मुश्किल है .

हमारे शर्मा जी इस बार चुनाव में पूरे विधि –विधान से लडे हैं. इसके लिए उन्होंने उपरोक्त वर्णित सारी सामग्री का प्रयोग किया है. प्रजातंत्र के इस यज्ञ में वह आहुतियों की इन्तहा पार कर चुके हैं. चुनाव परिणाम उनके पक्ष में आएंगे वाला दावा जिस जोर –शोर से जनाब ने मीडिया में किया था, वह सारा जोर अब चुनाव बीत जाने पर मंदिर –मस्जिद की चौखटों पर दुआ मांगने में खर्चा हो रहा है. चौबे जी जो औपचारिक रूप में कुछ न होकर भी अनौपचारिक रूप में उनके खासम-ख़ास कम, दायें हाथ कम, विश्वास पात्र कम थे. उन्होंने कहा, “ शर्मा जी ! मेरी मानो तो काल भैरव में भी माथा टेक आओ, पता चले नतीजे आने के बाद पछतावा हो. पिछली बार मिसिर जी वही के आशीर्वाद स्वरुप आपको पटकनी दिए थे.’’ चौबे जी ने किसी शुभचिंतक की सारी अधिमानी और वांछनीय योग्यता का परिचय अपनी इस सलाह से दे डाला .

शर्मा जी चूंकि नेता थे और एक नेता जितना ऊपर से ताकतवर दिखता है उतना ही अन्दर से खोखला भी होता है. इसलिए उन्होंने चौबे जी के सुझाव पर अमल करने की सैद्धांतिक सहमति जाता दी. लेकिन चुनाव के परिणाम का द्वंद्व उन्हें अभी भी अशांत किये हुए था. इसी द्वंद्व को साझा करते हुए शर्मा जी ने चौबे जी से गुहार लगाई, “ यार! कोई फौरी उपाय बताओ ,कोई बाबा –वाबा नहीं है तुम्हारी नज़र में जो तंत्र –मंत्र से सारे वोट हमारे खाने में खींच लाये,” शर्मा जी के इस स्टेटमेंट से चौबे जी समझ गए कि मामला गंभीर है. चुनाव की गर्मी अब सर तक चढ़ गयी है. शर्मा जी के दिमाग में कोई खतरनाक टाइप का केमिकल लोचा हो गया लगता है. “

शर्मा जी! काहे आप फालतू में इत्ती टेंशन लेते हैं. काहे भूल जाते हैं कि आप एक नेता हैं और नेता टेंशन लेने के लिए नहीं बल्कि देने के लिए जाना जाता है. यह तंत्र –मंत्र सब बेकार की बातें हैं. अब तो यह सोचिये कि खुदा न खास्ता अगर कही आप हार गए तो मीडिया के सामने क्या मुंह दिखायेंगे? जनता के सामने जाने में कोई टेंशन नहीं होगी क्योंकि वह तो वैसे भी नेताओं का मुंह देखना नहीं चाहती है.”

चौबे जी की इस कटु सम्भावना ने शर्मा जी को अन्दर तक लहरा दिया. हार का नाम सुनते ही उनके आँखों के सामने चुनाव में हुआ सारा इन्वेस्टमेंट सामने आ गया. करोड़ों देकर लिया गया टिकट, लाखों देकर किया गया प्रचार, हज़ारों देकर पाया गया कार्यकर्त्ता और सैकड़ों देकर खरीदा गया वोटर.

जाहिर सी बात है, इन सबमे सबसे कम कीमत उस वोटर की ही थी जिसके प्रजातंत्र के नाम पर नेता अपनी कीमत सबसे ज्यादा कर लेता है. खैर प्रजातंत्र के नाम पर जो इन्वेस्टमेंट नेता जी ने किया था वह उसका रिटर्न हार में नहीं पाना चाहते थे. आखिर उन्हें अपनी अगली सात पुश्तों की दाल रोटी का जुगाड़ जो करना था. चुनाव परिणाम में हार को बर्दास्त कर पाना इसलिए भी कठिन था, क्योंकि अब उनके पास अगले इन्वेस्टमेंट के लिए पूँजी भी नहीं बची थी. वह जल्दी से जल्दी फर्श से अर्श पर और साधारण से असाधारण और माफिया से माननीय तथा पिगी बैंक से स्विस बैंक में परिवर्तित होना चाहते थे .

अब शर्मा जी के पास सभी विकल्प खुले थे. वह जीत भी सकते हैं और हार भी सकते हैं. अगर जीत जाते हैं तो सारे प्रश्नवाचक खुद ब खुद शांत हो जायेंगे. अगर नहीं जीत पाये तो उसके लिए भी चौबे जी स्क्रिप्ट तैयार कर रहे हैं. हारने पर नेता जी को करोड़ों के बदले बैक डोर से सदन में इंट्री करवा दी जाएगी. लेकिन मीडिया को कैसे मैनेज करना है वह चौबे जी ने अपने बीस साल के अनुभव से शर्मा जी को समझा दिया. अब देखिये हारने पर संभावित प्रश्नों के संभावित उत्तर.

प्रश्न: “अच्छा तो आपको क्या लगता है आपकी हार के क्या कारण रहे हैं..?
उत्त्तर: (मन में भले ही जनता के लिए गाली निकले लेकिन तब भी बोलना यह है) जी देखिये ! जनता जनार्दन होती है. हम उसके फैसले का सम्मान करते हैं. हो सकता है हम मतदाताओं को अपनी बात ठीक तरीके से समझा नही पाए .

प्रश्न: तो वह चार सौ बीस रैलियां आठ सौ चालीस सभाएं क्या थी ? उनमें क्या आप मतदाताओं को शोले फिल्म की कहानी सुना रहे थे .?
उत्तर: ( पत्रकार को भले ही गोली मारने का मन करे लेकिन उसे कंट्रोल करना है ) जी देखिये हम सब मिल बैठकर हार के कारणों पर मंथन करेंगे .

प्रश्न: क्या आपकी पार्टी के नेताओं ने भीतराघात किया था ?
उत्तर: ( साले बड़े कमीने हैं उन्ही की वजह से ही तो हारे हैं ) देखिये साहब ! नेता जैस प्राणी अघात, प्रतिघात, कुठाराघात, विश्वासघात के लिए ही तो जाना जाता है. अगर भीतराघात भी कर देता है तो कोई बड़ी बात नहीं होगी .

प्रश्न: क्या आप अपनी हार के लिए आप आलाकमान को भी जिम्मेदार मानते हैं ?
उत्तर: ( साले वही तो ले डूबे हैं पता नहीं किसने पार्टी की कमान थमा दी ) जी देखिये ! आलाकमान का हमें पूरा सहयोग मिला उनके कुशल नेतृत्व का ही कमाल है कि मेरा प्रतिद्वंद्वी मुझे मात्र पचास हज़ार के अन्तर से ही हरा पाया है .

“अमां चौबे जी ! बस भी करो तुम तो ऐसा लग रहा है दुश्मन हो हमारे. हरवा के ही मानोगे. चलो मज़ार चलना है वहां मन्नत मांगना तो रह ही गया है.” शर्मा जी का काफिला धूल उडाता हुआ निकल पड़ा. यह धूल अभी जारी रहेगी अभी तो इसे कई आँखों में झोका जाना बाकी भी है..!!

Election Result Hindi Satire (Pic: wamc.org)

Web Title: Election Result Hindi Satire

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