जबसे ये ऑनलाइन खरीददारी शुरू हुई है, सारे आलसी खुशियाँ मना रहे हैं. खासकर वो पति जो हर हफ्ते बीबी के शोपिंग के शौक को पूरा करने के चक्कर में एकदम वैसे नजर आते हैं जैसे किसी धोबी के कपडे ढो कर घाट पर ले जा रहे हों… बेचारों को ढेर सारे बैग जो लादने पड़ते थे. ये ऑनलाइन शोपिंग है भी तो कितनी मजेदार, ना ट्रेफिक में खड़े हो, ना भीड़ में चलो, ना मोलभाव बस किसी जिन्न या परी की तरह एक ऊँगली हिलाई और सामान घर पर आ जाएगा.

पर जिसको इस ऑनलाइन शोपिंग की आदत एक बार लग गयी तो उसे तो फिर भगवान भी नहीं छुड़ा सकते. वैसे भी इस ऑनलाइन बाजार में हर सामान तो उपलब्ध है और आराम से बिना ये सोचे कि ‘इतने सारे सूट खुलबा कर भी कोई पसंद नहीं आया तो, दुकानदार घूरेगा… ? आप ढेरों वैरायटी देख सकते हैं. यहाँ कपडे, जूते, पर्स, मोबाइल, घर के राशन से लेकर हवन सामग्री और गोबर के कंडे तक उपलब्ध हैं. बस एक बार सीखने की देर है, फिर तो चस्का लगा ही समझो. आजकल के तो बच्चे तक इस ऑनलाइन शोपिंग के चस्के का शिकार हो चुके हैं. और तो और, उन्हें तो ये भी लगता है कि ऑनलाइन मतलब सस्ती या फ्री. लोगों के चस्के को देख ऑनलाइन बाजार वाले भी ऐसे ऐसे लुभावने ऑफर और स्कीम लाते हैं कि इन्सान बेचारा लालच में फंसा ही समझो. और तो और होम डिलीवरी मुफ्त! ये बात और है कि कई बार ये शौक उल्टा भी पड़ जाता है.

हमारे पड़ोसी मिस्टर कपूर ने यही पंगा तो लिया था. अब ना रो पा रहे हैं ना हँस पा रहे हैं. किस्सा कुछ यूँ शुरू हुआ …मिसिज कपूर मार्केट जाने की आलसी थी और हर बात के लिए मिस्टर कपूर को फोन करती थी “सुनो जी टेलर के यहाँ से मेरे ब्लाउज ले आना”… तो कभी “सुनो बंटी का बैग फट गया आज ऑफिस से आते वक्त लेते आना, नहीं तो वो कल स्कूल नहीं जाएगा”. इन रोज रोज की डिमांड से कपूर साहब परेशान थे और मैडम से कहते खुद ले आओ तो वो अपने कामों की लम्बी लिस्ट सुना उनकी बोलती बंद करा देती. फिर अपनी जान छुडाने के लिए मैडम को ऑनलाइन शोपिंग सिखा दी मिस्टर कपूर ने! बस फिर क्या था, मैडम घर बैठे नित नया उटपटांग सामान मंगवाती हैं और बजट की बैंड बजाती हैं.

मैडम तो खुश हैं… बाजार उनके बैडरूम तक जो आ गया है, उन्हें क्या क्लिक ही तो करना है पर मिस्टर कपूर की तो रातों की नींद उड़ी हुई है. ऑफिस के काम में भी मन नहीं लगता. यही सोच कर परेशान रहते हैं कि आज मैडम ने क्या मंगा डाला होगा?

अभी पिछले दिनों ही मैडम ने मिस्टर कपूर के लिए ऑनलाइन टी शर्ट मंगा डाली और पहनने की जिद भी की. बेचारे परेशान अजीब सा प्रिंट मानो सारे देश की खेती उसी टीशर्ट पर हो रही हो, पहनो तो पेट पर चढ़ कर जनाने ब्लाउज का अहसास कराये. पर क्या करें… श्रीमती जी ने इतनी महंगी मंगाई थी वो भी प्यार से (याद रहे पत्नियाँ तो अपने पति के लिए प्यार से ही खरीददारी करती हैं) तो पहननी तो पड़ेगी, सो पहन रहे हैं और अपनी हालत पर रो रहे हैं क्योंकि हंसने के लिए तो पूरा महल्ला है ना.

परेशान तो घर के बड़े बुजुर्ग हैं जो बेचारे समझ ही नहीं पा रहे कि घर के बच्चे कम्यूटर और मोबाइल में लगे दिनभर करते क्या हैं? और ढेर के ढेर डब्बो में कुरियर से मंगवाते क्या हैं?

Free Home Delivery, Online Shopping, Women with Shopping Bags (Pic: infotechlead.com)

वैसे इस ऑनलाइन शोपिंग के चस्के से परेशान और बीमार सी तो वो महिलायें भी हैं जिन्हें घूम घूम कर शोपिंग करने का शौक था और आज उनके पतियों को इस मरी ऑनलाइन शोपिंग का ऐसा चस्का लगा है कि बेचारी बाजार तो जा नहीं पाती… पर दिनभर इस मुई ओनलाइन शोपिंग को कोसती हैं. कहाँ तो वो दस पंद्रह दुकानों पर घूमती एक साड़ी खरीदने के लिए पचास साड़ियाँ खुलवाती और दुकानदार से मांग करती “भाईसाहब ये नीली साडी वाला पैटर्न मुझे पीले रंग में चाहिए और ये हरी साड़ी वाली लेस और ये वाली बूटियां जो पिंक साडी में है और कपडा क्रेप का होना चाहिए”. दुकानदार बेचारा अन्दर ही अन्दर भुनभुनाता.. मानो कह रहा हो “हाँ जी मैडम डिजाइन करवाता हूँ आपके लिए” पर ऊपर से मुस्कुराता और फिर नए डिजाइन दिखाने लगता और वो सबसे अलग सबसे बढ़िया साडी लेकर एक विजयी मुस्कान के साथ निकलती …… पर आज वो औरतें इस ख़ुशी से वंचित हैं, क्योंकि उनके पति एक क्लिक पर उनके लिए बाजार घर पर ले आते हैं और समझाते भी हैं, “मैडम अब जमाना बदल गया है, भीड़ और गर्मी में धक्के खाने का वक्त गया, खामखा में पेट्रोल फूंको और पार्किंग की तलाश में वक्त बर्बाद करो. बेहतर हो कि घर बैठे बैठे एसी चलाकर, टीवी देखते हुए ऑनलाइन शोपिंग करो. सामान घर पर मंगवाओ कितना आसान है ना” कहने को तो पति ने कह दिया, वैसे भी ये मर्द क्या समझें? हम औरतों को कितना शुकून मिलता है, जब हम दुकानदार से 100 रूपये कम करने के लिए आधे घंटे बहस करते हैं और अंत में “अच्छा तुम्हारी ना मेरी 80 तो कम कर ही लो” और अंत में पचास रूपये कम करा कर ऐसा महसूस होता है कि मानो हल्दीघाटी का युद्ध विजय कर लिया हो, कितना आनंद आता है जब विजयी सैनिक की मुद्रा में दुकान से बाहर निकलो कि आखिर हमने पचास रुपये बचा ही डाले और ऐसे ही ना जाने कितने रूपये बचाते हैं. भले ही हमारी टाँगे दुःख जाएँ घूम घूम, पर इन मर्दों को क्या? ये तो लगे हैं अपने पेट्रोल और पार्किंग की बचत का रोना रोने में.

वो औरत उदास क्यों ना हो? एक शोपिंग ही तो थी जिसे करने से पहले भी वो उत्साहित होती. घंटों सजधज करती और मनमाफिक खरीददारी करने के बाद भी, कलेजे में जो ठंडक का एहसास होता, उसे ये मर्द क्या समझे? वो नाराज है उस बाजारवाद से, जो उसके घर में ही नहीं, उसके बैडरूम तक घुस चुका है और उससे उसका खुश रहने का इकलौता कारण छीन चुका है.

वो औरत उस मर्द को कोसती है… जिसने ये मुई ऑनलाइन दुकानदारी शुरू की और बाजार घर भेज दिया. मर्द ही होगा ये पक्का है, क्योंकि ये मर्द बड़े आलसी होते हैं और खरीददारी का काम तो इन्हें वैसे भी बुरा लगता है छुट्टी के दिन बस बिस्तर पर पड़े पड़े मैच देखते रहो और खाने की फरमाईश करते रहो.

बताओ ये कोई बात हुई, न हम चप्पल पहन पहन कर देखे, ना लिपस्टिक का शेड पसंद करने के चक्कर में हाथ रंगीन करें, न चेंज रूम में जाकर कपड़े पहन पहन कर देखे और ना ही खरीददारी में मोलभाव करके बचाए रुपयों की चाट और गोलगप्पे खाए और हो गयी खरीददारी… बताओ “ना जीभ जरी ना स्वाद आया”. वो मरी टीवी वाली लड़की देखो, सब कुछ खुद ही पहन पहन कर दिखाती है, अरे भई कैसे मान लें कि हम भी सुन्दर लगेंगे ये पहन कर.

औरतों पर कुछ भी बीते पर सारे पति खुश हैं इस घर में घुसे बाजारवाद से, क्योंकि ना तो ट्रेफिक की पी पों, ना पार्किंग का झगडा और छुट्टी के दिन पूरा आराम और तो और उनकी जेब फ़ालतू कटने से बच गयी, क्योंकि श्रीमती जी दस दुकान घूमती और सेल या फ्री के चक्कर में बहुत सी अवांछित वस्तुएं खरीद डालती और जेब पर खामखाँ में बोझ बढ़ता सो पति और उनकी जेब दोनों स्वस्थ हो रहे हैं.

अब तो ऑनलाइन रिश्ते से लेकर शादी तक कर सकते हैं. त्यौहारों पर रिश्तेदारों के यहाँ गिफ्ट और मिठाई ऑनलाइन भेज देते हैं, भाई के लिए राखी और मिठाई ऑनलाइन ,बहन की साड़ी ऑनलाइन पर क्या प्यार की भावना मिलेगी ?औरों का तो है सो है पर हमारा तो नींद चैन सब उड़ गया है जबसे हमने पढ़ा है कि बहु ने सास से परेशान होकर ऑनलाइन पोर्टल पर बिकने के लिए उनकी डिटेल पोस्ट कर दी. बताओ ये कोई बात हुई हमारे साथ कितनी नाइंसाफी है… माँ ने सहनशीलता का पाठ पढ़ा कर भेजा सो हमने सास की हर ज्यादती सहन कर डाली. वैसे भी हमारे ज़माने में कुछ भी बेच डालो वाले ऑप्शन नहीं थे,और आज जब हम सास बनने वाले हैं तब कमबख्त ये ऑप्शन आ गया… यानी सहिष्णुता के अलावा कोई चारा नहीं हमारे पास फ़ालतू बोले और गए काम से.

ऑनलाइन शोपिंग के मजे लेने में लोगों को समझ में नही आ रहा कि वो दुनियादारी से कित्ती दूर जा रहे हैं. एक तो पहले ही प्राइवेसी की बिमारी ने अड़ोस पड़ोस से दूर कर दिया था, जो बाजार आते जाते राम राम, नमस्कार होती थी वो इस ऑनलाइन ने ख़त्म करा दी. पर इत्तू सी बात किसी को समझ आये, तब न…

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