बहुत दिन से आलस्य पर कुछ लिखने की सोच रहे हैं पर जब भी लिखने बैठते हैं, फिर से आलस्य आ जाता है और अपन तान कर सो जाते हैं. “राज में ना पाट में जो सुख अपनी खाट में” जैसी कहावत जरुर किसी हमारे टाइप के ही घोर आलसी मनुष्य की देन ही होगी जो बिस्तर पर पड़े पड़े ही दुनिया जीतने के ख्बाब देखते हैं वो भी खुली आँखों से.

“आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है …आलसी आदमी कभी तरक्की नहीं कर सकता आदि आदि कहने को तो सब बड़े बड़े लेक्चर दे ही देते हैं.आपको लगता होगा ना आलसी होना इतना आसान है?पर कभी उस आलसी के दर्द को किसी ने समझने की कोशिश की है, जो नित्य बिस्तर में पड़े पड़े कार्यों की योजना बनाता है और फिर कल पर टाल कर सिर्फ सोता ही नहीं बल्कि अपने आलसी होने पर गर्व करता है.
हम भी आलसियों की टीम के ही कोर मेंबर हैं, इसलिए हम आलसियों के दर्द को बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं. घर में चारों तरफ फैले कपडे और इधर उधर बिखरा सामान देखकर पतिदेव ने हमे सफाई की अहमियत समझाने की लाख कोशिश की पर आलसियों की परम्परा निभाते हुए हमारे एक जबाब ने ही उनके सैंकड़ों सवालों को चारों खाने चित्त कर दिया ! “घर है होटल थोड़े ही है यहाँ वहां बिखरा पड़ा सामान जीवन्त घर की निशानी है, इससे साबित होता है इस घर में जिन्दा लोग रहते हैं”

आलसी होना सिर्फ एक क्रिया नहीं है ये तो एक महान कर्म है, ये ज्ञान हमें अपने एक घोर आलसी मित्र के विचार जानकर प्राप्त हुआ. उनका कहना था,“हम तो इतने आलसी हैं कि शादी तक ना कर सके,अब यार कौन लड़कियां देखे फिर शादी का तामझाम करे और बाद में जो जिम्मेदारियों का बोझ ढोए, ना बाबा ना ! कौन इतना काम करे, हम ऐसे ही ठीक हैं”अब आप ही बताईये इतना त्याग एक महान आदमी ही कर सकता है ना.

पूरा दिन बिस्तर पर पड़े पड़े पंखा देखकर समय बिताना, किसी साधारण मनुष्य का काम तो हो ही नहीं सकता. कोई उठकर पानी दे दे इस इन्तजार में अपना गला कोई संत ही सुखा सकता है, और आलसी आदमी से बड़ा कोई संत नहीं हो सकता. एक बात साफ़ कर दूँ , आलसी इन्सान सिर्फ शरीर से ही आलसी होता है. उसका दिमाग एकदम दुरुस्त होता है. अपने आलस को सिद्ध करने के पुख्ता कारण होते हैं उसके पास. आलसी सिर्फ काम के आलसी नहीं होते आलस कई प्रकार के होते हैं जैसे पढने लिखने के आलसी …उठने के आलसी ..चलने फिरने के आलसी, नहाने के आलसी, कुछ तो खाने तक के आलसी होते हैं भले ही सूख कर छ्वारा हो जाएँ पर कौन अपने जबड़े और दांतों को कष्ट दे और खाना खाए, वाला विचार कुछ खाने नहीं देता. कुछ आलसी तो ऐसे संतत्व को प्राप्त हो जाते हैं कि बोलने तक की जहमत नहीं उठाते, सिर्फ गर्दन को हल्का सा हिला डुला कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं उनके विचार बहुत ज्यादा ही जरुरी हो तो केवल हूँ हाँ से अपना काम चला डालते हैं. अब कौन ज्यादा शब्द बोलकर अपना मुहं थकाए सो मनमोहिनी मुद्रा बनाये बुत बने रहते हैं.

Laziness is a Great Habit, Hindi Satire (Pic: wikimedia.org)

बहुत से कमेरे लोग आलसियों को ज्ञान देने की नाकाम कोशिश करते हैं. साहित्यकारों ने भी बड़ी मेहनत की इस विषय पर साहित्य रच कर ज्ञान देने की, कबीर दास जी ने भी तो आलसियों के लिए ही लिखा “काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में परलय होयगी बहुरि करेगो कब” लेकिन आलसी भी वीर सैनिक की तरह मैदान में डटा रहता है और “आलस बड़ी चीज है मुहं ढक कर सोइए किस किस को याद कीजिये किस किस को रोइए” जैसे जबाबी हमले को तैयार रहता है. ये ज्ञान देने वाले लोग ये नहीं जानते कि आज जो इन्सान इन्हें आलसी और नाकारा नजर आ रहा है हो सकता है भविष्य में वही इन्सान किसी बड़ी पार्टी का नेता बन जाये और किसी छोटी जाति के गरीब के घर पेट पूजा करके उसकी खटिया पर सोकर ही राष्ट्र निर्माण में सार्थक सहयोग करे , या हो सकता है कल बिजली पानी या किसी अन्य समस्या के लिए आपका इन महान आलसियों से सामना हो जाए क्योकि आलस के सबसे बड़े प्रेमी हमारे सरकारी दफ्तरों की शोभा बनते हैं. कान खुजाते हुए या वाट्सएप पर चैट करते करते ये आपकी समस्या पर कान भी ना दें.

यही वे आलसी हैं जिनके बारे में कहानी रची जा चुकी हैंआलसी कौवे की कहानी याद है आपको जिसमे वो कहता है “तू चल मैं आता हू ,चुपड़ी रोटी खाता हूं ,ठंडा पानी पीता हूँ, ऐसा कहते कहते वो पूरा साल निकाल देता है और उसके बाद बरसात शुरू हो जाती है, उसके पास खाने को कुछ नहीं होता. भूखे रहने और रोने के अलावा अब कोई चारा नहीं था. आप लोग ये सोच रहे होंगे कि मैं आपको ये कहानी क्यों सुना रही हूँ भला आप कोई बच्चे थोड़े ही है?

अरे भाई! मैं तो बस ये समझाना चाहती हूँ कि हमारे देश में कौवा सोच वाले लोग हर प्रदेश की नगरपालिका तथा अन्य सरकारी कार्यालय में बैठे हैं जो पूरे साल चुपड़ी रोटी खाकर ठंडा पानी पीते हैं और समय रहते ना तो नालों की सफाई करवाते हैं ना ही सड़कों की मरम्मत. बरसात में रोनी सूरत बना लेते हैं हमारे देश की जनता बेहाल होती है तो होती रहे इन आलसी कौवो पर कोई असर नहीं होता. इनकी इस आलसी प्रवृति की वजह से लोगों को घंटो ट्रेफिक में सड़क पर गुजारने पड़ते हैं. ये आलसी कौवे सिर्फ कागजों पर नालों की सफाई और सड़कों की मरम्मत करवाते रहते हैं और चुपड़ी रोटी,ठंडा पानी अपने वातानुकूलित कमरे में खाते रहते हैं और इनके आलसी कर्मो की सजा जनता भुगतती है. “अब कौन पचड़े में पड़े” ‘अब कौन वोट करने जाए’ ‘अब कौन लाइन में खड़ा हो’ जैसे खालिस विशुद्द आलसी विचार जनता को विरोध नहीं करने देते और यूँ आलस हर क्षेत्र में बाजी मार चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए पड़ा पड़ा आलस्य के पूर्ण आनंद की अनुभूति करता है.

Laziness is a Great Habit, Hindi Satire (Pic: Youtube)

Web Title: Laziness is a Great Habit, Hindi Satire

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