जैसे किसी मनचले और लड़की छेड़क लड़के को कोई नाजुक सी लड़की छेड़ दे.. उसी तरह 46 डिग्री में तप रहे बनारस को सुबह की हल्की बारिश छेड़ देती है.. फलस्वरूप इस लजाए, सकुचाए और शरमाये से मौसम में खिड़की से ताजी हवा आती है… मन मयूर नृत्य करने को उत्प्रेरित होता ही है कि दिल से आवाज आती है..”साधो अब नाशपाती और खीरा ख़ा-खा कर मन पाकिस्तान हो गया है..

जैसा कि आप जानते हैं कि भीतर से आने वाली हर आवाज जोरदार होती है… सो तत्क्षण मन आशा और उम्मीद की क्षत पर चढ़कर जोरदार तरीके से ये सोचने लगा है कि अब आम और जामुन में रस भर जाएंगे. कम्बख़्त इस नाशपाती और खरबुजा के भाव कम हो जाएंगे.. और इस दिल को हम फिर आबाद हिन्दुस्तान बनाएंगे.

इस आशावादी सोच के साथ सुबह होती है.. देखता हूँ दुनिया में सब ठीक-ठाक है. .मन सोचता है जरा बाहरी देश-दुनिया की खबर भी ले ली जाए.. मैं खीरा-नाशपाती और आम-लीची में उलझा हूँ, लेकिन दुनिया में आजकल बड़ी गड़बड़ चल रहा… सो बहती गंगा के सामने इस ग्राम्य चिंतन को विराम लग जाता है. मोबाइल स्क्रीन पर एक खबर तैरने लगती है..

“शादी का प्रस्ताव ठुकराये जाने पर चरमपंथी बने थे सबजार..”

देखता हूँ कि ये समाचार दुनिया के एक प्रतिष्ठित समाचार समूह का है.. जिसे सुनते हुये हमारी एक पीढ़ी बुद्धिजीवी बनी है.. समाचार खोलकर देख रहा तो उसमें एक और बड़े समाचार समूह का हवाला देकर तमाम ट्वीट, ट्रेंड और सोशल मीडिया पर लोगों के रिएक्शन का सहारा भी लिया गया है… लेकिन समाचार में एक बर्बर आतंकी के लिए ‘उन्होंने’ ‘वो‘ ‘बने थे‘ ‘वो हैं‘ जैसे आदरसूचक शब्द का इस कदर प्रयोग देखकर लगता है कि जैसे कोई दामाद अपनी ससुराल में गलती से अपने ससुर जी के हाथ से मार दिया गया है.. हत्या किए जाने के बाद भी संस्कार का लिहाज ससुर जी कर रहें हैं…

मन में आता है हंसू.. ‘बने थे’ मानों आतंकी बन जाना बुद्धत्व की प्राप्ति कर लेना है.. कम्बख्त! आजकल शादी हो जाने के बाद पति का इतना सम्मान तो बीबी भी नहीं करती जितना सम्मान एक आतंकी का कुछ मीडिया और पत्रकार कर देते हैं!

खैर.. अचानक मेरा मन जानने का उत्तेजित होता है कि ये सबजार जी कौन हैं.. कौन हैं वो आदरणीय सबजार जी जिनका दिल टूटने पर वो आतंकी बन गए.. यहां तो लौंडे दिल टूटने पर पीडब्लूडी में ठीकेदार हो जातें हैं… और दिन में बनी-बनाई सड़क तोड़ते हैं और रात को दारू की बोतलें..

बेचारे भल मानुष सबजार जी जरूर मनरेगा में पोखरा खोनते होंगे तभी आतंकी बन गए.. इनको रोड तोड़ने का ठेका नहीं मिला.. या दारू पीने का ठीका…

तभी अचानक से एक मासूम चेहरे पर नज़र जाती है.. आह! हवा में हथियार लहराकर शांति और अमन की आशा करने वाले सबजार जी की आँखो में कितना प्रेम भरा है… कितने नेक, ईमानदार और क्यूट से तो हैं सबजार जी!

कितना आदर्श प्रेम है सबजार जी का.. कम्बख्त हमारे गांव के वो लौंडे कब सीखेंगे जो आज भी हँसी-खुशी पापा की जगह मामा बन जाते हैं.. महबूबा की शादी में पूड़ी, पत्तल, गिलास चलाते हैं.. रात को दो बजे पुलाव और पनीर के साथ एक बोतल दारू लेकर आर्केस्ट्रा में ‘सदा खुश रहो तुम दुआ है हमारी जैसे गाने पर’ नाच भी लेते हैं.. और दो साल बाद मोटी हो गयी महबूबा के बच्चे से मामा नामक शब्द सुनकर पापा की तरह खुश भी हो जातें हैं…

आपको बताएं… एक थे झुम्मन जी… पांच फीट दस इंच के.. आँख भले भगवान ने उनको एक ही दिया था लेकिन दिल के मामले में भगवान ने दिलदारी का परिचय दिया था… मल्लब की दिल पूरे चार दिए थे.. दिल में इतनी जगह थी कि दुनिया भर की लड़कियों से दिल लगाकर उसे तोड़ा जा सकता था..
मोहल्के की चिंकी, मिंटी से लेकर सुधा और वसुधा तक को प्रेम किया जा सकता था.. उस दिल में एक नहीं 3 BHK के कई फ्लैट थे. इतने कि झुम्मन जी उसे बेचकर रातों-रात दुनिया के सभी बिल्डरों का झुनझुना बजा सकते थे..

क्या हुआ कि उन्हें मोहल्ले की तेरह लड़कियों से सच्चा प्यार हो चुका था… एक ही प्रेम-पत्र को फ़ोटो स्टेट करा-करा के वो सबको बांट चुके थे.. लेकिन किसी पत्थर दिल लड़की ने उसे पढ़ना उचित नहीं समझा था.. उनके दिल के बने स्वीमिंग पूल में तैरना उचित नहीं समझा था.. सो इस घनघोर उपेक्षा से ग्रस्त होकर उन्हें लगा कि ये उपेक्षा नहीं ये शायद वैश्विक आर्थिक मंदी का असर है.. लेकिन कुछ दिन बाद वो महबूबा झुम्मन जी के ही बाल सखा गुड्डन जी के साथ एक दिन गन्ने के खेत में प्यार करते हए पाई गयी तो उन्हें ये दिव्य ज्ञान हुआ कि ये आर्थिक मंदी नहीं.. ये बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन का मामला है.. घर को सजाना संवारना पड़ेगा तब तो कोई इसमें रहेगा.

एक दिल के डॉक्टर ने उनको बिना फीस लिए सलाह दे दिया कि कोई बात नहीं मिंटी न सही डेजी ही सही. जरा अपने दिल रूपी घर का मरम्मत तो करवा लो.. झुम्मन जी ने बड़ी सजाया.. सँवारा.. झाड़ू-पोछा और पेंट डिस्टेम्पर लगाकर चमकाया लेकिन डेजी भी बेवफा निकल गयी.. उसने दुनिया की सभी शरीफ लड़कियों की तरह अपने भाई को बता दिया.. कि ए भइया वो कुत्ता-कमीना हमको तंग करता है.

बस क्या था. लड़की के भाई ने झुम्मन जी को बिना छीलल बांस से इतना प्यार किया इतना कि बेचारे की दूसरी आँख बाल-बाल बच गयी..

हाय! दस साल हो गए इस महादुर्घटना को. किसी मीडिया ने इसे तरजीह नहीं दी.. किसी पत्रकार की भावनाएं आहत न हुई.. झुम्मन जी के दिल मे बने सारे घर एक डंडे की चोट से भरभराकर गिर गए..

आजकल बेचारे वो झुलनिया चट्टी पर दवाई बेचते हैं.. साथ में सुरती-चुना भी.. लौंडे उनसे प्यार हुआ इकरार हुआ वाले एड का प्रोडक्ट लेते हैं.. और बूढ़े जवान होने वाली दवाई की एक शिला जीतने वाली गोली…

साधो.. प्यार में धोखा खाकर सब्जी बेचने, ठेला लगाने, नेता बनने और देश बेचने के न जाने कितने किस्से प्रेम की इतिहास-भूगोल की किताबों में दर्ज हैं. इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं.. लेकिन सबजार जी को याद करते हुए मुझे लगता है कि झुम्मन जी को बगदादी बन जाना चाहिए… चाहिए कि नहीं.. ?

पता नहीं.. कोई तो नहीं बना अभी तक!

लेकिन एक दुर्दांत आतंकी को आखिर इतनी इज्जत दी जाएगी तो वो शादी टूट जाने से आतंकी बने या न बनें इस बेहिसाब सम्मान से जरूर बन जाएगा..

ये मूर्ख किस्म के पत्रकार और बिके हुए एजेंडा छाप मीडिया घरानों को ये सब सोचना पड़ेगा कि वो जाने-अनजाने क्या कर रहे हैं.. देश उन्हें लगातार खारिज कर रहा तो भी नहीं सचेत हो रहे हैं. टीआरपी गिर जाने का मतलब ये नहीं कि अपना ईमान गिरा लिया जाए. अरे! पत्रकार को आइना की तरह होना चाहिए ताकि उसमें जो जैसा है वैसा ही दिखे. अफसोस कम्बख्तों ने इस पर अपने एजेंडे की धूल चढ़ा रखी है..बस! सब्ज़ार जी और इस नरमपंथी पत्रकारिता के लिए प्रचण्ड कवि खूँटा बनारसी का एक शेर अर्ज है.. साधो..

रकीबों मेरा नाम न लो इतनी इज्जत के साथ
इन हूरों के हाथ से जाम छलक जाता है

Web Title: Love, Terrorism and Journalism, Hindi Satire, Atul Kumar Rai

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