सफाई अभियान फुल फॉर्म में जारी है. गंदगी तो कही साफ़ नहीं हो पाई, अलबत्ता देश से विपक्ष बहुत जोरों से साफ़ होता चला जा रहा है. कहते हैं एक स्वस्थ प्रजातंत्र में सशक्त विपक्ष बहुत ज़रूरी होता है. प्रजातंत्र तो खैर अपने देश में उतना ही स्वस्थ रहा है, जैसे आईसीयू में पड़ा मरीज़. और सशक्त विपक्ष के नाम पर कोने में रखा हुआ जंग खाता ऑक्सीजन का खाली सिलेंडर मिलता है.

अभी तक लगता था कि सत्ता के मद में चूर सरकार के ‘नशे को हिरन’ एक मज़बूत विपक्ष कर सकता है, लेकिन इधर जिस गति से विपक्ष की दुर्गति हो रही है उसे देखकर तो लगता है विपक्ष की आवाज़ बिलकुल नक्कारखाने में तूती की तरह रह जाएगी. वैसे विपक्ष का काम अभी तक की परम्परानुसार सत्ता पक्ष का विरोध करना होता रहा है. यानि विपक्ष और विरोध बिलकुल वैसे ही काम करते हैं जैसे आत्मा और शरीर. बिना विरोध के विपक्ष मृत प्रायः सा हो जाता है, लेकिन जिस तरह विपक्ष संख्या शून्य होता जा रहा है उसे देखें तो वह विरोध क्या सदन में खुल कर छींकने और खासने की स्थिति में भी नहीं है. अब बाते चल रही हैं कि सारे विपक्ष को एक साथ मिलकर मोदी के खिलाफ एक होना होगा!

अरे भाई ऐसा कैसे संभव है फिर आप लोग कैसे कह पाओगे कि मोदी राष्ट्रीय एकता में बाधक है..!!

विपक्ष के पास इस एकता को दर्शाने के लिए सबसे पहले एक अदद सर्वसम्मति प्राप्त नेता को तलाशना होगा. नेता वह होता है जो जनता मन भाये. विपक्ष के नेता जनता के मन तो भाना दूर अपने घर परिवार के मन में ही नहीं भा पा रहे हैं. उन्हें काम जनता के हिसाब से नहीं उनके पोलिटिकल मैनेजर के हिसाब से तय करने होते हैं. चलिए एक नज़र डालते हैं विपक्ष के नेताओं और उनकी लाचारी पर.

विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता जिन पर कथित रूप से युवराज का ठप्पा लगा है, वह आम जनता के लिए महज गूगल में सर्वाधिक बनने वाले चुटकुले के किरदार के रूप में ही अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं. उनका हर कृत्य उनको सत्य से परे करता चला जा रहा है. वह अपनी पहचान जनमानस में एक आम आदमी की तरह बनाने के लिए अपने फटे कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर दुनिया को यह बताने की असफल कोशिश करते हैं कि वह एक साधारण से इंसान है. उन्हें किसी ने शायद गलत समझा दिया है कि जनता मूर्ख होती है. वास्तव में प्रजातंत्र को झेलते- झेलते जनता अब बहुत समझदार हो चुकी है. उसे मालूम है कि जिस परिवार ने हमेशा देश पर राज किया है उसका युवराज अगर अपना फटा कुरता दिखाए तो यह गरीबी नहीं मासूमी भरी बेवकूफियत ज्यादा है. वह अपना कीमती वोट उस फटी जेब में डालना भी नहीं चाहती जो फटी हो और उसमे से उसके वोट के गिरने का खतरा हो. उनका शेर पढना जनता के आगे किसी आदमखोर शेर को छोड़ देने जैसा हो जाता है.

उनका हर भाषण किसी स्कूली बच्चे के डिबेट की याद दिला जाता है. उनका कुरते की बांह चढ़ाना अपने आत्म विश्वास के गिराने जैसा हो जाता है. कहीं ऐसा न हो कि फिर बाकी राजनितिक दल यह कहे कि ‘लोग टूट जाते हैं एक पार्टी बनाने में तुम तरस नहीं खाते हो पार्टियों की लुटिया डुबोने में ‘.

इस समय विपक्ष की नैया बिलकुल टाईटेनिक `की तरह हिचकोले खा रही है इससे पहले वह समन्दर में समां जाये और उसके अवशेष भी न मिले. इसके कैप्टन को बदलना ज़रूरी है. विपक्ष के दूसरे बड़े नेता अपने परिवार से त्रस्त हैं. उनके लिए चक्रव्यूह किसी पराये को नहीं बनाना है, उनके अपने ही उन्हें घेर कर ध्वस्त करने की तैयारी में रहते हैं. अगर ऐसे बन्दे को विपक्ष का पक्ष लेने का दारोमदार सौंप दिया जाए तो वह खुद कन्फ्यूज़ रहेंगे कि पहले अपनी पार्टी के अन्दर वालों से निपटे कि बाहर वालों से. इन चुनाव में हार के बाद जनाब वैसे ही बैक फुट में आ चुके हैं. उनके लिए अपनी साख को फिर से बनाना ही चुनौती है. सुना है आजकल वह उसी स्मार्ट फोन से टाइम पास कर रहे हैं जो उन्होंने प्रदेश की जनता को देने का वादा किया था.

भाभी जी भी आजकल कुकरी शो देखकर अपना गम उसी कुकर में व्यंजन बनाकर गलत कर रही है जो उन्होंने प्रदेश की महिलाओं को देने का वादा किया था. चचा जी आजकल गाना गाने का अभ्यास कर रहे हैं ताकि चुनाव न सही सिंगिंग कम्पटीशन ही जीत सके.

Opposition in India, Hindi Article, Mayawati (Pic: makingindiaonline.in)

चचाजान आजकल बेरोजगार हो गए हैं. उन्होंने कहा भी था कि काम नहीं होने पर लोग बच्चा पैदा करने में लग जाते हैं. अब देखना है कि वह अपना टाइम पास ऐसे ही करते हैं या कुछ और तरीके भी हैं उनके पास! यानी विपक्ष के नाम पर अब जो भी है उस पर खुद की ही इतनी जिम्मेदारियाँ है कि जनता उनसे भी उम्मीद छोड़ चुकी है.

कभी हाथी अपने विरोधियों को रोंदने के लिए जाना जाता था, आजकल अंडे देने के लिए जाना जाता है. लोक सभा में उसने अंडा दिया तो लोग समझे विधान सभा में वह अपनी गलती सुधार लेगा. लेकिन वह बस उन्नीस कदम चल कर ढेर हो गया. दावा किया जा रहा है कि उसका सारा चारा इवीएम मशीन खा गयी. अब विपक्ष के नाम पर हाथी के पास इवीएम की गड़बड़ी वाला लोलीपोप मिल गया है, जिसे उन्होंने कार्यकर्ताओं और जनता को फिलहाल के लिए पकड़ा दिया है. जनता उसे चूस कर इस खुशफहमी में जीने भी लगी है कि यही लोलीपोप अब उन्हें उनका हक़ दिलाने में मददगार सिद्ध होगा. खैर विपक्ष की नेता के रूप में उनके पास उन भ्रष्ट नेताओं का व्यापक मनोबल प्राप्त है जिनके ऊपर लोकायुक्त की जांचे चल रही है.

वैसे भी आधे से ज्यादा नेता पहले ही हाथी की सवारी छोड़ चुके हैं.

विपक्ष के नेता के रूप में सुशासन बाबू से कुछ उम्मीद जरूर बची थी, किन्तु वह खुद दूसरों के कंधे के सहारे हैं! हाँ, शराब बंदी कर जनाब वाह -वाही तो लूट चुके हैं, लेकिन समस्या यहाँ है कि शराब छोड़ जिस तरह उन्होंने चारे को गले से लगाया है वह उनके गले की हड्डी बनता चला जा रहा है.

इस हड्डी का यह आलम है कि इसने इनकी सरकार तो बनवा दी लेकिन उनकी छवि को उस कवि सा कर दिया है जिसकी रचनायें तो लोग सुनना चाहते हैं, लेकिन जिस मंच पर खड़े होकर वह रचना पाठ कर रहे हैं, वह उन्हें पसंद नहीं. इसलिए अगर उन्हें विपक्ष के नेता के रूप अपने को स्थापित करना है तो पहले उन्हें अपना मंच और प्रायोजक बदलना पड़ेगा. यानि वह कह रहे हैं अबकी बार हमारी सरकार और जिस विपक्ष की एकता की बात चल रही है वह अबकी बार पूरी तरह से लग रहा है लाचार.

Opposition in India, Hindi Article, Nitish Kumar (Pic: campusghanta.com)

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