भारत एक बाहुबली प्रधानदेश है. यह बात हमें तभी मालूम चल गयी थी जब हमने बचपन में महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की कहानियाँ ‘हमारे पूर्वज’ वाली किताब में पढ़ी थी. कसम से तब से हम जब भी उस किताब के पन्ने पलटते हमारे अन्दर किसी बाहुबली सा एहसास होने लगता. हमारी छाती के अन्दर कड़कने वाली डेढ़ पसली तक फड़कने लग जाती. इसी बाहुबली के सैद्धान्तिक पक्ष को व्यवहारिक बनाने के चक्कर में अपनी कक्षा के न जाने कितने बच्चों को हमने अस्पताल पहुंचा दिया था.

खैर, समय बदला… कुछ अकल आई तो पता चला कि हमारे देश के अभिन्न हिस्से जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्से को पाकिस्तान ने कब्जियाया हुआ है और कुछ चीन ने. तब महसूस हुआ कि हमारे पूर्वज वाली किताब में जो बाहुबली का कांसेप्ट था, वह भूतकाल की तरह भूत बन चुका है. वर्तमान में बाहुबली के बारे में सिर्फ परीक्षा में नंबर लाने के लिए पढ़ा जाता है. उनका व्यवहार से कोई लेना–देना नहीं होता है. आये दिन पाकिस्तान हमारे सैनिकों पर हमला किया करता है और हम अपने बाहुबल को सिर्फ छब्बीस जनवरी को परेड में नुमाइश के लिए बचा कर रख लेते हैं. बाहुबली फिल्म में तो उसे कटप्पा ने मार दिया था… लेकिन हमारे अन्दर के बाहुबली को किसने मार दिया है यह भी आज एक बड़ा सवाल है.

किताबी बाहुबली को जानने से परीक्षा में नम्बर बढ़िया आ जाते है. और यदि कहीं किसी काल्पनिक बाहुबली नामक किरदार पर फिल्म बना दिया जाए तो टिकट भी अच्छे बिक जाते है.

भारतीय मानसिकता सदा शक्तिशाली का साथ देती है फिर वह चाहे वह उन्हें डरा कर उनका साथ पा ले या फिर लोग उसके छद्म चरित्र से प्रभावित होकर उसका साथ दे दे. बाहुबली फिल्म ने जिस तरह से डंका बजाया है वह न जाने कितने कीर्तिमान अपने साथ बटोर लाया है. इस समय मरियल से मरियल लोग भी के लिए भी चर्चा का एक मात्र विषय बाहुबली ही है. चार घंटे बिजली पाने वाले सरकार से यह नहीं पूछ पा रहे हैं कि उन्हें चौबीस घंटे बिजली क्यों नहीं दी जा रही है… बल्कि उनकी चिंता का पहला बिंदु है कि कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? स्कूलों ने इतनी ज़ल्दी फीस क्यों दोगुनी कर दी वाली बात उनके लिए कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा के आगे गौण हो चुकी है. नक्सलवाद हमारे बहादुर सैनिकों को लीलता चला जा रहा है लेकिन उस पर बहस करना अभी उतना प्रासंगिक नहीं है जितना कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा है…

अब देखना है कि पाकिस्तान के अन्दर जो कटप्पा की आत्मा घुस कर हमारे बाहुबली जैसे सैनिकों को मारती चली जा रही है उस पर कोई निष्कर्ष निकलता है या नहीं.

किताबी बाहुबली की स्वप्निल रूपरेखा से वास्तविक बाहुबली की ज़मीनी हकीकत में बहुत बड़ा फरक होता है जनाब. आदर्शवादी बाहुबली तलवारबाजी में माहिर होता है… वास्तविक बाहुबली रंगबाजी में निपुण होता है. आदर्शवादी बाहुबली के पास लम्बी –चौड़ी सेना होती है वास्तविक बाहुबली लुच्चो –लफंगों की फौज से लैस रहता है. आदर्शवादी बाहुबली आदर्श के लिए मर मिटने के लिए तैयार रहता है, लेकिन वास्तविक बाहुबली टोल पर पैसा न देना पड़े इसके लिए मारने और पीटने को हमेशा तत्पर रहता है. ‘बाहुबली फिल्म’ में एक काल्पनिक बाहुबली की वीरता लोगों ने देखी है, लेकिन अपने यूपी और बिहार वाले असली बाहुबली क्या होता है यह पेट से अभिमन्यु स्टाइल में जान कर आते हैं. अब फिल्म की इतनी इतनी चर्चा हो रही है कि हमारे यू पी -बिहार के खांटी बाहुबली भाई लोग टेंशनिया गए हैं. यहाँ ससुरा बीस ठौर मर्डर, पंद्रह अपहरण, दस रेप और करोड़ों की रंगदारी मांगने की हिस्ट्री शीट बनती है तब जाकर कही अगला बाहुबली की डिग्री झटक पाता है. उधर फिल्म में एक बंदा झरने पर चढ़ कर ही बाहुबली बना जा रहा है. यहाँ पूछो कितनी मेहनत लगती है पूरे पांच साल इंतज़ार करने के बाद चुनावी गंगा में डुबकी लगाकर… तब जाकर कहीं अगला माफिया से माननीय बन पाता है.

Real vs Filmy Bahubali, Hindi Satire, Alankar Rastogi, Reality (Pic: Patrika.com)

अपने यू पी-बिहार वाले आधे लोग इसी मुगालते में फिल्म देख आये कि इसमें कहीं अपने भैया जी का माफियाई चरित्र-चित्रण और नेता बनने के संघर्ष को तो नहीं दिखाया गया है. कई रंगरूट इस फिल्म को बतौर ट्रेनिंग देखना चाहते थे लेकिन हुआ उल्टा…  फिल्मी बाहुबली में तनिक भी लक्षण न थे जो हमारे रियल लाइफ बाहुबलियों में पाए जाते है. वहाँ एक ठौर बूढ़ा कट्प्पा इतने बलशाली बाहुबली को मार दिए. लगता है उसने सरकारी गनर नहीं लिए थे वरना हमारे बाहुबली भैया को देखो चार मर्डर कर के भी छाती चौड़ी कर शैडो से घिरकर चलते हैं… मजाल है कहीं कोई उन पर आँख भी उठा कर देख ले.

अपने यहाँ के बाहुबली टाइप के लोग रोज के रोज ऐसी फिल्में किया करते हैं जिसमे हवालात में बीमार बन कर अस्पताल में शिफ्ट होने का ड्रामा, थाने में सरेंडर करना है या अदालत में इसका सस्पेंस, गैंगवार में किसको निपटाना है इसका थ्रिलर और एसयूवी के काफिले लेकर असलहों से लैस गुर्गों का एक्शन शामिल होता है. हमारे बाहुबली सत्ता के लिए संघर्ष नही करते हैं बल्कि अपनी सामानांतर सत्ता बनाने में यकीन करते हैं. इनकी बाहुबली छवि स्पेशल इफेक्ट्स रहित वास्तविकता सहित इतनी कान्तिमान होती है कि कोई भी सरकार इनके सद्कर्मों की आड़ में अपना जुगाड़ ढूंढने से पीछे नही हटती. इनका मजबूत साथ और पाक गठबंधन हर नेता का स्वप्न होता है. फिल्मी बाहुबली तीन घंटे में परदे की सीमाओं में जकड़ा एक पटकथा से बंधा किरदार मात्र है. वहीं अपने रियल बाहुबली कानून की सीमाओं से परे, समाज की मर्यादाओं से रहित, मानवता के दायरे से बाहर और सवैधानिक नियंत्रणों से मुक्त एक ऐसा प्राणी होता है जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अवश्यम्भावी सा हो गया. उसे देखने के लिए हमें सिनेमाघरों की खिड़की के आगे लम्बी कतारें नहीं लगानी पड़ती हैं… यहाँ तो हर दूसरा महत्वाकांक्षी शख्स एक सपनीले भविष्य की तलाश में आपको अपने अन्दर का बाहुबली दिखाता सुलभता से मिल जाता है. यह बाहुबली शायद इसलिए भी सुलभ है कि इसको अपने लक्ष्य को मुकाम तक पहुंचाने की उर्वरा जमीन भी आसानी से मिल जाती है.

यहाँ बाहुबली के पास वह कटप्पा नहीं होता जो उन्हें मार कर पहेली बना दे, यहाँ का बाहुबली न जाने कितने कटप्पों को टपका कर खुद अपनी उलझन सुलझा देता है. यहाँ का बाहुबली लोगों की नस –नस से वाकिफ होता है और वह अपना कोई दूसरा पार्ट नहीं बना कर रखता है. उसे एक बार में ही लोगों को हलाल करने में मज़ा आता है. उसे न्याय के लिए नहीं लड़ना पड़ता है, क्योंकि उसके लिए उसके पास बड़े –बड़े वकीलों की फौज़ है. वह मौज में रहता है क्योंकि उसे पता है कि यहाँ की जनता प्रजातंत्र नामक बेड़ियों से जकड़ी है जिसे खोलने का भ्रम दिखाकर उसे हर पांच साल बाद जनता जनार्दन से निरीह जनता में परिवर्तित किया जा सकता है.

बाहुबलीको कोई नयी भाषा बनाने की ज़रूरत नहीं… वह लोगों हर भाषा में सिखाने का माद्दा रखता है. इस बाहुबली की ओपनिंग कितनी शानदार होती है उसका रिकार्ड शायद यह फ़िल्मी बाहुबली कभी न कर पाए.

Web Title: Real vs Filmy Bahubali, Hindi Satire, Alankar Rastogi

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