मेज़ पर रखे खाने से ज्यादा मेरा ध्यान उस डांट पर लगा था जो आज मैं ऑफिस लेट पंहुचने के लिए अपने बॉस से खानेवाला था. खाने को लगभग मुंह में ठूंसते हुए, जूते को लगभग पैरों में अटकाते हुए , बाइकको लगभग सत्तर की स्पीड में भगाते हुए मैं ऑफिस के लिए कूच कर गया. माफियाओं की राक्षसनुमा एसयूवी से बचते हुए, नगर महापालिका की मेहरबानी से विकसित हुई गड्ढेनुमा सड़को पर उछलते हुए, आवारा सांडों की सींगों से बचतेहुए, कालेज जा रही खूबसूरत कन्याओं का सौन्दर्य दर्शन करने का लोभ छोड़ते हुए, ट्रेफिक जाम में अपने पंद्रह मिनट का बलिदान करते हुए  जैसे ही स्मूथ सड़क आने पर मैंने स्पीड बढाई वैसे ही जेब में रखा मोबाइल घनघना उठा.

मोबाइल के बजते ही जो नामुराद अंदेशे मन में आने लगते हैं उनमे सबसे पहले बॉस का कोई आपातकालीन आदेश या बीबी का कोई अनिवार्य निर्देश या बच्चों का कोई मासूम सन्देश होता है.

इन तीनों ही परिस्थितियों में फोन का उठा न पाना किसी अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आ जाता है. यही कारण था कि मैंने बिना किसी ‘इफ या बट’ के टॉप पर चल रही गाडी में ब्रेक लगाए, गाड़ी को इंडिकेटर और हाथ दोनों देकर किनारे किया. सुरक्षा के प्रतीक हेलमेट को सर से निकाला, धूप से बचाने वाले दस्ताने से हाथों को बाहर  किया. चक्रव्यूह के इतने गेट तोड़ने के बाद जाकर कहीं मेरा और मोबाइल का मिलन हो पाया .

काल अभी जारी थी. न वो नंबर बॉस नामक आफत का था, न बीबी की शामत का और न ही बच्चों की नजाकत का था. किसी अनजान नंबर को देखकर किसी और अंदेशे की मन में इंट्री हो इससे पहले ही मैंने फोन रिसीव कर लिया. उधर से किसी पुरुष का किसी महिला सी मधुर आवाज़ में… ’हेल्लो फलाना जी बोल रहे हैं ..? मैं अमुक रियल स्टेट कंपनी से बोल रहा हूँ .. क्या मैं आपका कीमती वक्त ले सकता  हूँ ?’ वाला उदबोधन हुआ.

जिस विकट परिस्थिति में उस तथाकथित मृदुभाषी टेलीकालर का फोन आया था, उसमें तो साक्षात् इंद्र देवता भी उस समय कॉल करके कोई वरदान मांगने को कहते तो मैं शायद उन्हें भी पहले फोन करने के टाइम की तमीज के बारे में लेक्चर देता और उसके बाद फोन काट देता. खैर, जिस समय मुझे सड़क पर लगे रेड सिग्नल में भी अपने बॉस का गुस्से से भरा लाल चेहरा ही दिख रहा हो उस समय कोई मुझसे अपने प्लाट या फ़्लैट खरीदने की बात करे तो कैसा लगा होगा यह बताना फ़िज़ूल है… आप कल्पना कर सकते हैं.

मैं अपने गुस्से के ज्वालामुखी को डीफ्यूज़ करते हुए, बॉस की अवश्यम्भावी डांट को सहने की शक्ति अर्जित करते हुए उस बेवक्त के आतंकवादी हमले पर सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए बोला .!

मैं: जीहाँबोल रहा हूँ .!!

टेलीकॉलर उर्फ़ टेकॉ: क्या यह आपसे बात करने का उपयुक्त समय है ?’

मैं: बिलकुल यह उपयुक्त है बस थोड़ी देर बाद फांसी पर चढने ही वाला था, बड़े मौके से आपका फोन आया.

टेकॉ: ऐसी क्या बात है सर… वैसे आप बोल कहाँ से रहे हैं…?

मैं: एनएच फोर हाई वेकी बायीं तरफ की सड़क के किनारे से बोल रहा हूँ .

टेकॉ: अच्छा तो आप सड़क पर हैं!

मैं: जो परिस्थिति इस समय बन रही है उसके बाद सडक पर ही आने का समय है.

टेकॉ: वैसे सर आप प्राइवेट नौकरी करते हैं या सरकारी?

मैं: अभी तक तो प्राइवेट करता हूँ लेकिन आपकी इस कॉल के बाद नौकरी भी करता रहूँगा कि नहीं इस पर भी सस्पेंस है.

टेकॉ :सर आप किसी इन्वेस्टमेंट की तो नहीं सोच रहे हैं?

मैं: बिलकुल किसी टेलीकॉलर की सुपारी देने का इन्वेस्टमेंट करना चाहता हूँ.

टेकॉ: मेरा मतलब सर आप कोई प्लाट तो नहीं लेना चाह रहे हैं?

मैं: अरे मैं उसी की तलाश में हूँ, है कोई आपकी नज़र में?

टेकॉ :सर आप एरिया कितना चाहेंगे बताइए ?

मैं: बस एक आदमी को जिंदा या मुर्दा गाड़ने पर जितनी ज़मीन की ज़रूरत होती है उतना बड़ा प्लाट चाहिये होगा.

टेकॉ: अरे सर आप कैसी बात कर रहे है !!

मैं: मैं वैसी ही बातें कर रहा हूँ जैसी कोई अपनी नौकरी जाने से पहले करता है.

टेकॉ: भला किसी को फोन करने से नौकरी जाने का क्या सम्बन्ध?

मैं: कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता बस कोई लेट हो जाता है और खूंखार बॉस उसे नौकरी से निकाल देता है. बस वही सीधा सम्बन्ध मेरे लेट होने और किसी टेली कालर की जान जाने से होगा.

टेकॉ: लगता है सर आप बुरा मान गए ?

मैं: नहीं तो मैं बस यह मना रहा हूँ  कि आपके साथ कोई बुरा न हो जाये.

टेकॉ: अच्छा सर अगर आप इंटरेस्टेड नहीं हैं तो कोई बात नहीं.

मैं: मैं तो ज़बरदस्त इंटरेस्टेड हूँ बस अपना पता बता दीजिये.

टेकॉ(सकपकाते हुए): हमारे साथ बात करने का शुक्रिया आपका दिन शुभ हो.

मैं: मैं तो चाह कर भी आपको ऐसा नहीं कह सकता क्योंकि किसी की ज़िन्दगी का आखिरी दिन भला कहाँ शुभ होता है!

Hindi Satire on Telecalling (Pic: manuinfo…)

 

टेली कालरने उसी भय से फोन काट दिया जिस भय से किसी बकरे को अपने कटने का एहसास होता है. उस टेली कालर को ध्वस्त करने के बाद मैं किसी छप्पन इंची छाती वाले योद्धा की तरह विजयी मुस्कान लिए ऑफिस पंहुचा. रास्ते में हुई टेली कालर सेमुठभेड़ के बाद ऑफिस लेट पहुंचना स्वाभाविक था.

लेकिन अस्वाभाविक यह लगा कि बॉस उस दिन खुद लेट थे. यह परिस्थिति सुखद थी. अपनी सीट पर बैठने के बाद मैं यह मनन करने लगा कि उस टेली कालर का क्या हुआ होगा?

मेरे पास सभी विकल्प खुले थे. सबसे पहला विकल्प तो यही था कि उसने अब बेटाइम  किसी को कॉल करने से तौबा कर ली होगी! हो सकता है उसने अब तक जो लोगों को तंग किया उसके लिए ऊपर वाले से मांफी मांगने की सोच रहा हो. यह भी संभव है कि वह अपने पाप से मुक्ति पाने के लिएछुट्टी लेकर गंगा नहाने चला गया हो. या फिर उसने अपनी रोज़ – रोज़ की ज़लालत से तंग आकर नौकरी छोड़ दी हो.

इससे पहले कि मेरे मन के और भी विकल्प खुल पाते,बगल के शर्मा जी का फोन घनघनाया और उधर से उसी टेली कालर की आवाज़ सुनाई पड़ी ..
‘क्या मैं आपका कीमती समय ले सकता हूँ ..?’

Web Title: Tele Calling Satire in Hindi, Alankar Rastogi

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