‘और हाँ ! टमाटर लाना मत भूलना’… बाज़ार जाते समय पीछे से श्रीमती जी का यह आदेश मेरे शरीर को वैसे ही भेदता चला गया जैसे कटप्पा की तलवार बाहुबली को भेदती चली गयी थी. उनका एक वाक्य का आदेश मेरे लिए इस दौर की सबसे बड़ी आपदा के समान बन चुका था. पत्नी के आदेश का अनुपालन करना और अपनी जेब को अनुशासन में रखना एक साथ दोनों काम बड़े ही कष्टकारी लग रहे थे.

नोटबंदी और जीएसटी वाले भूकंपों के बाद टमाटर की महगाई जैसी चीजें किसी ‘आफ्टर इफेक्ट’ की तरह काम कर रही थी. मैंने लगभग दुस्साहस का परिचय देते हुए श्रीमती जी से मुखातिब होते हुए कहा-‘ देखो जी! इस टमाटर की बात न करो. तुम्हें मालूम नहीं टमाटर के दाम आसमान छू रहे हैं. वैसे भी मेरी कमाई सिमित टाइप वाली है.’ मेरे इस अक्षम्य अपराध पर वह बिफरते हुए बोली –‘ कौन सा आपसे मैंने नौलखे हार की डिमांड कर दी है…? कौन सा आपने आज तक मुझे किसी फाइव स्टार होटल में खाना खिला दिया है…? अगर टमाटर लाने की हिम्मत नहीं थी तो घर बसाने की क्या ज़रूरत थी…?

श्रीमती जी के इस प्रत्याशित आक्रमण के कारण ही मैं आज तक उनकी हाँ में हाँ मिलाता चला आया था. लेकिन इस बार मामला मेरे अस्तित्व की रक्षा का था. जुलाई महीने में बच्चों की फीस, स्कूल की यूनिफॉर्म और सेलरी का देर से आना. चक्रव्यूह के इतने सारे गेट तोड़ने के बाद मेरे लिए टमाटर जैसी चुनौती को झेलना असंभव था. मुझे मालूम था मेरा हाल अभिमन्यु वाला होने जा रहा था. इसलिए मैंने उनके आगे हमेशा की तरह आत्मसमर्पण कर दिया और थैला लेकर बाज़ार की ओर कूच कर गया. रास्ते भर टमाटर की लालिमा और श्रीमती जी के गुस्से से भरे लाल गालों में द्वंद्व चलता रहा. हालाँकि जीत किसकी हुई यह बताने की ज़रूरत नहीं है. मैंने ‘एनी हाउ’ मैथेड से टमाटर खरीदने का ठान लिया. जिस हिसाब से मेरे घर में थोक भाव में सदस्य थे उस हिसाब से कम कम से कम दो किलो टमाटर की ज़रूरत थी .

इस टमाटर वाली आपदा के समय दो किलो टमाटर के लिए जितने रुपये की ज़रूरत थी उतने में तो महीने भर की सब्जी आ जाने की सम्भावना बन रही थी. खैर जब आगे टमाटर और पीछे बीबी वाली स्थिति आ जाये तो सारी आशंकाओ से परे होना ही एकमात्र विकल्प था. चूँकि दूरदर्शिता के अभाव में अभी तक किसी बैंक ने ‘होम लोन’ और ‘एजुकेशन लोन’ की तरह ‘टमाटर लोन’ का प्राविधान नही किया था. इसलिए मैंने फिर से अतीत वाली महाजनी ऋण प्रणाली में लौटने का निश्चय किया. सामने से मेरे पुराने मित्र शर्मा जी किसी देव पुरुष की भांति अवतरित हुए. उनसे अच्छा भला और कौन सा संकट मोचन हो सकता था इसलिए मैंने उन्हें तुरंत लपक लिया. जिस शर्मा जी से दुआ सलाम करना कभी ‘बिलो डिग्निटी’ वाली बात लगती थी आज उसी बन्दे में मुझे तारणहार दिख रहा था. शर्मा जी भी हमेशा की तरह मुझे देख कर चहक पड़े. उनकी चहचाहट थोड़ी ही देर में रफूचक्कर होने वाली थी इसका अंदेशा उन्हें कतई नहीं था.

‘अरे वाह शर्मा जी आज तो बड़े स्मार्ट लग रहे हैं आप क्या बात है आपकी उम्र तो कम होती चली जा रही है.’ शर्मा जी के ऊपर सफल प्रयोग करने से पहले मैंने उनको तारीफ रूपी ‘एनेस्थीसिया’ दे दिया. उनकी डेढ़ इंच की मुस्कान बता रही थी कि मेरा तीर निशाने पर लगा है. इसलिए मैंने मौका देख चौका लगा दिया. ‘यार शर्मा! ज़रा दो सौ रुपये उधार देना टमाटर लेने थे और आज मैं पर्स घर पर भूल आया.’ मेरी ‘इस फाइनेंसियल सर्जिकल स्ट्राइक’ से शर्मा जी लगभग मूर्छावस्था में आ गये लेकिन तुरंत अपने को होश में लाकर मुझे दांव देते हुए बोले –‘क्या बताऊँ यार मुझे खुद इस बार की सेलरी अभी तक नहीं मिली है. तुम तो टमाटर के बारे में सोच भी लेते हो यहाँ तो टमाटर की शक्ल कैसी होती है मैं तो उसे भी भूल गया हूँ. मैं तो खुद इन दिनों उधार लेकर नमक रोटी चला रहा हूँ.’ शर्मा जी के इस सफ़ेद झूठ को जानने के बाद भी मैं कोई जवाब न दे पाने की स्थिति में था. इसलिए मैंने उसे ‘रॉंग नम्बर’ की तरह भुलाना ही सही समझा और उन्हें ‘चलो कोई बात नहीं’ वाली सांत्वना देकर टाटा –बाय कर आगे बढ़ गया.

लेकिन टमाटर वाली समस्या अभी भी वैसी ही थी. देश में काला धन वापस लाना और बाज़ार से लाल टमाटर घर लाना अब मुझे एक जैसा लगने लगा था. लगभग असंभव सा काम हो चला था यह. लेकिन इधर जब से देश में एक परम सिद्ध पुरुष का शासन महज बातों से धडल्ले से चल रहा है उसने मुझे एक आशा की किरण दिखाई पड़ने लगी. जब इस देश में बुलेट ट्रेन का झांसा देकर ‘बुलक कार्ट’ भी ठीक से चलाई नहीं जा सकी हो , जब इस देश में स्मार्ट सिटी के नाम पर अभी तक नेताओं में ही ओवर स्मार्ट नेस दिखाई दी हो , जब यहाँ पर काला धन के पंद्रह लाख खाते में लाने के बजाये लोगों के खाते पर ही पहरा बैठा दिया गया हो. जब इस देश में झांसा देने का इतना तगड़ा स्कोप हो तब अगर मैं टमाटर के लिए अपनी निजी पत्नी को झांसा न दे पाऊँ तो धिक्कार है मुझमे कि मैं देश के इस सकारात्मक माहौल से कुछ सीख नहीं ले पाया.

अब मेरे अन्दर के नरेंद्र बाहुबली ने मुझे बीबी रुपी कटप्पा के वार से बचने का संबल प्रदान कर दिया. मैंने बाज़ार से टमाटर छोड़कर अपनी औकात के हिसाब से बाकी सब कुछ खरीदा और टमाटर विहीन थैला लेकर घर पहुँच गया. घर में घुसते ही श्रीमती जी ने वही सवाल फिर दुहरा दिया जिसे लेकर मैं आशंकित था. लेकिन इस बार का सवाल कुछ ज्यादा ही खतरनाक श्रेणी का था . ‘ ले आये टमाटर कितनी देर से मैं इसके चक्कर में बैठी हूँ नहीं तो अब तक मेरी सब्जी तैयार हो चुकी होती .’

उनके इस सवाल कम बवाल का मेरे पास रेडीमेड जवाब तैयार था. मैंने मन ही जय नरेंद्र बाहुबली का जप किया और फट से बोल दिया –‘ देखो यार! मैं तो टमाटर ले आता कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन बाज़ार में अपने मित्र शर्मा जी मिल गए. बताने लगे कि आजकल जो टमाटर बाज़ार में आ रहा है वह ‘मेड इन चाइना’ टमाटर है इसलिए मंहगा भी है और उसमे वह बीमारी फैलाने वाले वायरस भी डाल रहा है. वह हमारा ‘डोकलाम’ तो छीन नहीं पाया इसलिए हमें बीमार कर बदला ले रहा है. इधर हमारे किसान उसके कारण आत्महत्या कर रहे हैं. अब खुद बताओ जिस देश में राष्ट्रवाद चरम पर चल रहा हो उस देश में मैं कैसे चाइना के टमाटर खरीद कर देशद्रोह कर सकता था. इसलिए मैंने टमाटर लाने का विचार छोड़ दिया. सच्चे देश भक्त होने के नाते सही किया न मैंने … ?’

‘मुझे पता था कि आपसे टमाटर खरीदना और राहुल से कांग्रेस चलाना अब दोनों ही काम असम्भव की श्रेणी वाले हो गए हैं इसलिए मैंने आपकी जेब से पैसे निकाल कर फेरी वाले से पहले ही टमाटर खरीद लिए हैं. वह भी खालिस ‘मेड इन इण्डिया’ वाले. 🙁 🙁

मुझे क्या देश की जनता समझ रखा है जो बेवकूफ बन जाउंगी.’ अब ठगे रह जाने की बारी मेरी थी लेकिन श्रीमती जी की बहादुरी वाली समझदारी से सब्जी वाकई मजेदार बनी थी. 🙂 🙂

Web Title: Tomato Price Hike Satire, Inflation, Alankar Rastogi

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