हमने पान वाले से एक जोड़ा पान लिया, पान मुंह के अंदर और पैसे उसकी ओर बढ़ा दिये. पान वाले ने बचे पैसे घुमाते हुए कागज का एक बड़ा सा टुकड़ा भी साथ में थमा दिया. पहली नज़र में तो यह टुकड़ा चूने के कागज़ जैसा लग रहा था क्योंकि जिस तरह से लोग एक नेता से चूना लगाने की आशंका रखते हैं वैसे ही पान वाले से चूना खिलाने की ही आशा पालेंगे. लेकिन यह कोई चूने का कागज नहीं बल्कि उस पान वाले साहब का तथाकथित ‘विज़िटिंग कार्ड‘ था. यह सब उस‘विज़िटिंग कार्ड‘ की महिमा का कमाल है जिसने पान वाले को साहब तक कहलाने को मज़बूर कर दिया…

मैंने सोचा आदमी शौकीन लगता है, एक सरसरी निगाह डाल लूं. लेकिन‘विज़िटिंग कार्ड‘देखते ही होश फाख्ता हो गए. विजिटिंग कार्ड बाकायदा अंग्रेजी में लिखा था. जिस पर एक तरफ पान और दूसरी तरफ उसकी फोटो लगी थी. हालाँकि, दोनों की शक्लें इतनी मिलती थी कि दोनों में फरक कर पाना मुश्किल था. वैसे मुझे पान वाले से ज्यादा पान में इंटरेस्ट था इसलिए मैंने उस विजिटिंग कार्ड को भरपूर इज़्ज़त बख्शते हुए उसे अपनी जेब के हवाले कर महफूज़ कर दिया.

इस ‘विज़िटिंग कार्ड‘ वाले काण्ड का गवाह बनने के बाद मैं अपने आफिस की ओर कूच कर गया. चूंकि मेरा स्कूटर ससुराल का माल था इसलिए बीबी की तरह उसे भी गले से लगाने की मजबूरी थी. दोनों ही ओवर हालिंग और मेंटेनेंस के सहारे चल रहे थे.अब वह स्कूटर कम जान की आफत ज्यादा हो गया था. हमेशा की तरह उस दिन भी मेरा स्कूटर मझधार में दगा दे गया गया. किसी तरह उसे घसीटते हुए गैराज की इमरजेंसी में दिखाया. स्कूटर को घसीटना और बीबी को डांटना दोनों ही हालातों में नुक्सान आपका ही होता है.समझदार लोग दोनों ही परिस्थितियों को नज़रंदाज़ करते हैं. खैर, मिस्त्री अच्छा था सो उसने थोड़ी ही देर में ही उसे दुरूस्त भी कर दिया. लेकिन पान वाले की बीमारी के कीटाणु गैराज के मालिक में भी मौजूद थे. साहबान ने भी अपना विजिटिंग कार्ड बनवा रखा था, और वो भी कोई मामूली कागज का नहीं बल्कि प्लास्टिक कार्ड में था. मैं तो ठगा सा रह गया कि किसी ज़माने में जो विजिटिंग कार्ड स्टेटस सिम्बल हुआ करता था आज वह प्रचार का साधन सा बन गया है. ‘विज़िटिंग कार्ड‘अब डाक्टर, वकील और इंजीनियरों की बपौती नहीं रह गये हैं. अब तो मुझे जिस दिन किसी का विजिटिंग कार्ड नहीं मिलता उस दिन बड़ी हैरानी होती है.

अभी थोड़े दिनों की बात है मैंने अपने दूध वाले से मज़ाक में कहा, ‘अरे भाई ननकऊ! का तुमअपना विजिटिंग कार्ड नहीं बनवाये हो? आजकल तो सभी विजिटिंग कार्ड रखतेहै.’ अब दूधवाला चहकते हुए बोला,‘साहब यह आपने अच्छा याद दिलाया, मैं भी काफी दिनों से अपना कार्ड बनवाने की सोच रहा हूं कोई पूछता है तो बड़ी शरम आती है कि इतने बड़े मिल्क सप्लायर के पास विजिटिंग कार्ड नहीं हैं. आपकी नजर में कोई अच्छा कार्ड छापने वाला हो तो मुझे जरूर बताइयेगा, पैसे की कौनो बात नहीं हैं.’ मेरे तफरीह में कहे गए डायलाग को दूधवाला इतना पसंद करेगा मुझे इसका अंदाज़ा न था.

उधर सड़क किनारे कैनोपी लगा कर वाटर प्यूरीफायर बेचने वाले बन्दे. देश की बढती हुई बेरोज़गारी की नुमाइंदगी करने वाले बन्दे, कुकुरमुत्ते की तरह खुले संस्थानों से एमबीए किये हुए बन्दे, कमीशन बेस पर काम करने वाले बन्दे, तनख्वाह के नाम छले जाने वाले बन्दे जब अपनी कंपनी का प्रचार करने के लिए ‘विज़िटिंग कार्ड‘ थमाते हैं जिस पर ‘सेल्स एग्जीक्यूटिव’ जैसी भारी भरकम पोस्ट लिखी होती है तब वह ‘विज़िटिंग कार्ड‘ कम शोषण का झुनझुना ज्यादा महसूस होता है.

जिस बेरहमी से उनके सपनो को चकनाचूर कर दिया जाता है उसी तरह उनके नाम और काम को धता बताते हुए लोग उनके ‘विज़िटिंग कार्ड‘ को थोड़ी दूरी पर जाकर कूड़ेदान के हवाले करते हुए पाए जाते हैं. यह ‘विज़िटिंग कार्ड‘ दूसरे अर्थों में कुछ लोगों के लिए भौकालमारक यंत्र भी बन पड़ता है. कमीशन पर मकान और फ़्लैट बिकवाने वाले दलाल ‘विज़िटिंग कार्ड‘ पर प्रॉपर्टी डीलर लिखवाते हैं. फर्जी डिग्री दिलवाने वालों के ‘विज़िटिंग कार्ड‘ पर ‘एजुकेशनल काउंसलर’ लिखा हुआ मिलता है. उनके लिए भी यह वरदान साबित हो जाता है, जिनको बस के किराए में हवाई जहाज का मज़ा लेना होता है. ढाबे में पैसे का हिसाब लेने वाले होटल मैनेजर बन जाते हैं. पेथालोजिस्ट अपने को डॉक्टर के रूप में ऐलान करवा देता है. यहाँ तक कि अखबार के हॉकर तक अपने ‘विज़िटिंग कार्ड‘ पर बड़ा –बड़ा प्रेस लिखवाए जलवा गांठते पाए जाते हैं.

‘विज़िटिंग कार्ड‘ के इस वृहद् दर्शन को देखकर उसके निहितार्थ को भांप कर अब मेरी समझ में आ गया था कि लोग विजिटिंग कार्ड क्यों छपवाते हैं. यह मात्र अपनी पहचान बताने का जरिया ही नहीं होता है. असल में यह एक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाणपत्र भी होता है, जिसमें आपकों अपना ओहदा बताने का और बढ़ाने का अवसर मिलता है. आपको समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का लाइसेंस भी मिल जाता है. अब मुझे लगा कि शायद मुझे ‘विज़िटिंग कार्ड‘ विहीन होने के कारण ही वह तवज्जो नहीं मिल पाती है जिसका मैं हकदार हूँ. माना कि एक लेखक हूं, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा तो मुझे भी पसन्द है. इसीलिए मैंने भी अपना विजिटिंग कार्ड बनवाने का निश्चय किया. प्रिटिंग प्रेस में जाता हूं तो क्या देखता हूँ कि प्रेसवाले के पास मुझसे बात करने का समय ही नहीं है. करीब आधा घंटे बाद उसने थोड़ी सी जहमत की और पूछा, ‘कितने कार्ड बनवाने हैं?’

मैंने जोश में आने का दावा करते हुए कहा,‘सौ ‘विज़िटिंग कार्ड’ छाप दो.’ यह सुनते ही कार्ड वाला मुझे भिखारी के समान देखने लगा और मेरे जोश को होश में लाते हुए तुनककर बोला,‘ पांच सौ ‘विज़िटिंग कार्ड‘से कम का आर्डर हम नहीं लेते, कोई दूसरी दुकान देख लीजिए.’ अब उसको कौन बताता कि दूसरी दस दुकाने छानने के बाद ही तो उसके पास आया था. मेरे लिए ‘विज़िटिंग कार्ड‘ प्रतिष्ठा बनाने से पहले ही उतारने का कारण बन रहा था. खैर मैंने अब हथियार डाल दिये थे क्योंकि पांच सौ कार्ड वाली तो मेरी औकात थी नहीं.

वास्तविकता के धरातल पर आकर महसूस हुआ शायद विजिटिंग कार्ड एक लेखक के लिए होता ही नहीं है. यह तो केवल पान वाले, दूध वाले, गैराज वाले और छद्म लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ाने की चीज है. शायद ऐसा लिए है क्योंकि दूधवाला तो दिन भर कई लीटर पानी बेच कर भी पैसे कमा लेता है, एक गैराज वाला नकली पुर्जे लगाकर पैसे कमा लेता है, पान वाला तो लोगों को कैंसर का मरीज बनाकर भी पैसा कमाता है, छद्म लोगों के काल्पनिक जाल में फंसने के लिए हर कोई तैयार दिख जाता है. संभवतः ‘विज़िटिंग कार्ड‘ का अस्तित्व ही लोगों के छद्म अस्तित्व और सामाजिक प्रतिष्ठा को बनाने के लिए होता है.

एक बेचारा लेखक ही ऐसा होता है जो समाज को अच्छा साहित्य देकर भी कभीं सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं कमा पाता है. अभी समय लगेगा एक लेखक को मुख्यधारा में आने के लिए. उसे भावना से लिखने के बजाये अपने लिखे हुए का भाव लगाना आना चाहिए. उसे अर्थपूर्ण लेखन के बजाये वही लिखना होगा जिससे उसके बटुए का अर्थ पूर्ण हो जाए. उसे अब वह सब करना पड़ेगा जिसमे वह साहित्यिक प्रतिमान के साथ स्वाभिमान भी गढ़े.

Web Title: Visiting Card and Social Status, Hindi Satire

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