इस बार भी मौका-ए-वारदात एक जंगल ही था, लेकिन उसे वनवास नहीं बल्कि वाइल्ड लाइफ टूरिज्म एन्जॉय करना कहा जाता था. इस बार भी लोग जंगल में भ्रमण पर थे लेकिन उसे भटकना नहीं थ्रिल कहा जाता है. इस बार भी पांच लोग थे लेकिन वो भाई नहीं किसी एमएनसी की कोल्हू के बैल टाइप्ड नौकरी से त्रस्त होकर हफ्ते भर की जंगल यात्रा में निकले हुए हुए दोस्त थे. इस बार भी उनसे प्रश्न उत्तर जारी थे लेकिन वह यक्ष नहीं फारेस्ट रेंजर महोदय के सामने खड़े थे.

इस बार उसे प्रश्नोत्तरी नहीं बल्कि इंटेरोगेशन कहा जाता था. पांचो दोस्त जंगल में जानवरों के शिकार के शक में वन विभाग की गिरफ्त में आ चुके थे. पांचवें को इसलिए बाहर नहीं निकाला गया था, क्योंकि वह युधिष्ठिर सरीखा सत्यनिष्ठ और तार्किक था, जिसके उत्तर सुनकर आधुनिक यक्ष यानि रेंजर महोदय सभी भाइयों को मुक्त कर देते. बल्कि उसे ऐसे विपरीत मामलों में यक्ष टाइप्ड लोगों को डील करने का अच्छा अनुभव था.

चारों दोस्त वन विभाग के लॉकअप में बंद रेंजर से अपनी रिहाई की ऐसे गुहार लगा रहे थे मानो कोई मेमना किसी शेर से उसे बक्श देने की बात कर रहा हो. रेंजर साहब उनकी गुहार को वैसे ही नज़रंदाज़ कर रहे थे जैसे कोई अम्पायर एलबीडब्ल्यू की गलत अपील को करता है. किसी म्यान में भले ही दो तलवारें न रह पाती हों, लेकिन जंगल में शेर और रेंजर रुपी दोनो खूंखार प्राणी सह अस्तित्व में पाए जाते हैं. रेंजर साहब ने शेर से थोड़ा कम और इंसानों से काफी तेज़ आवाज़ में गरज कर उन चारों से पूछा –‘अच्छा! तो तुम लोग जंगल में शिकार करने आये थे. जेल भेज कर सड़ा डालूँगा, समझे!’ उनकी दहाड़ कम वार्निंग उनके बॉस से हाई डेंसिटी वाली निकली. कम से कम उनका बॉस दिन में ही जेल में रखता था यहाँ तो रात भी जेल में काटने की बात थी. उनका पांचवां साथी समझ गया कि आईएसआईएस और इस बन्दे से रहम की आशा करना फ़िज़ूल है.

‘अरे साहब हम लोग शिकार क्या करेंगे, कभी चूहा तो मारा नहीं है. बस बताइये हम लोगों को आज़ाद होने के लिए करना क्या पड़ेगा?’ पांचवे बंदे ने वही बात कह दी जिसका रेंजर महोदय अभी तक इंतज़ार कर रहे थे.

‘अब आये हो तुम लोग लाइन पर… पहले मेरी बातों का सही –सही जवाब दो, केस डायरी मेंटेन करनी है. तुम कुछ समझदार टाइप के लग रहे हो. अगर मेरे सवालों का सही जवाब दोगे तो देखतें हैं कि क्या हो सकता हैं.’ रेंजर महोदय किसी दिव्य यक्ष की भांति अपने विशालकाय शरीर को उस सरकारी कुर्सी में समाते हुए बोले, जिसका अमूमन एक हाथ टूटा हुआ होता है, तो इसका भी था.

‘अच्छा चलो बताओ ये जंगल के बीचों– बीच क्या करने आये थे तुम लोग?’ रेंजर साहब का अर्दली बाकायदा चित्रगुप्त की भांति अपना रजिस्टर लिए ऐसे तैयार बैठा था मानो यक्ष प्रश्न पूरे होते ही उसे उनकी मृत्यु दंड का एलान करना था.

‘रीसर्च सर वाइल्ड लाइफ रिसर्च’… तार्किकता में युधिष्ठिर के कलयुगी वर्ज़न ने रेंजर को बरगलाते हुए कहा. ‘सर हम लोग जानवरों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर पर आंकड़े इकठ्ठा करने आये थे. भला ऐसे ही कोई क्यों जंगल आने लगा…!’

रेंजर महोदय उसकी चालबाजी को समझते हुए भी नज़र अंदाज़ करते हुए अगले प्रश्न पर आये – ‘अच्छा तो तुम लोग यहाँ किस की परमिशन से आये हो, कोई परमिशन लेटर है तुम्हारे पास?’ रेंजर साहब उसको गिराने के अगले क्रम में बोले.

‘अरे साहब अब आपने पूछा है सही सवाल! है न बिलकुल है. यह देखिये . (उस बन्दे ने जेब से अपना पर्स निकाला और दो हज़ार की नोट उसमे से निकाल कर रेंजर को दिखाते हुए कहा) अब रेंजर साहब का पारा सांतवे आसमान पर पहुँचने का दिखावा करने लगा. ‘क्या समझ रखा है तुमने यहाँ पर सिर्फ इस स्तर की परमिशन से काम चल जायेगा. बड़ा वाला आदेश लाना पड़ता है. क्या तुम्हे पता है तुम लोग बड़ी मुसीबत में फंस चुके हो ?’

युधिष्ठिर ने यक्ष को यही जवाब दिया था कि मुसीबत में ‘साहस’ काम देता है. इसलिए वह बंदा कलयुग में उसका व्यवहारिक उपयोग करता हुआ बोला – ‘हाँ सर मुसीबत तो है लेकिन आप जैसा सुलझा हुआ इंसान जब सामने हो तो वही उस मुसीबत से निकलने का रास्ता भी बताएगा.’ रेंजर साहब मुस्कराए उन्हें लगा बंदा बात समझ रहा है.

‘तुम समझदार लगते हो. कहाँ से आई इतनी बुद्धि ?’… ‘बस सर आप जैसी लोगों के साथ ही उठना –बैठना है.’… ‘यहाँ अकेले में जंगल की यात्रा के दौरान तुम्हे क्या लगा कौन देगा साथ तुम्हारा?’

‘कुछ नहीं सर बस अपने विधायक जी का फोन नंबर साथ में ले चलता हूँ. कहीं सफ़र में तकलीफ होती है तो उन्ही से बात करवा देता हूँ .’ विधायक का नाम सुनते ही रेंजर साहब की टोन एम् टीवी से दूरदर्शन में कन्वर्ट हो गयी.

‘तुम्हे नहीं पता यहाँ खतरनाक जंगली जानवर होते हैं घर में बीबी –बच्चे नहीं है क्या तुम्हारे?’
‘अरे सर सबसे बड़े जानवर तो वही हैं उनको झेल लिया अब किसी जानवर से डर नहीं लगता है’
‘हा हा हा’… रेंजर साहब की बनावटी हंसी से लगा मानो उसने उनकी दिल की बात कह दी हो .’

‘तुम्ही बताओ अगर तुम्हारे जैसे लोग जंगल में किसी मुसीबत में फंस जायंगेतो मैं अपने से ऊपर के लोगों को क्या जवाब दूंगा?’
‘सर आपको क्या जवाब देना है यह आपसे बेहतर हम थोड़े ही जानते हैं. हमें तो बस इतना पता है कि जब जेब में गाँधी जी हों तो सारी मुसीबतें वह रफा –दफा कर देते हैं. कहिये तो जो गांधीगिरी वाली शक्ति हमारी जेब में है वह आपकी जेब में ट्रांसफर कर आपको हमें यहाँ से जाने देने की शक्ति प्रदान कर दें.’

‘गाँधी जी बात कह कर तुमने तो मुझे खरीद लिया भाई. उन्होंने कहा था कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं, लेकिन उनके दर्शन के अधूरे प्रदर्शन से केवल तुम्हे छोड़ा जा सकता है तुम्हारे दोस्तों को नहीं. उसके लिए तुम्हे उनके दर्शन के सम्पूर्ण अर्थ को समझना होगा.’

‘कुछ समझा नहीं सर, मुझे तो लगता था कि गांधी का नोट दर्शन ही कलयुग में पर्याप्त है?’
‘अभी तुम नादान हो तभी इस दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, तुम्हें नहीं मालूम?’

‘नहीं सर मैं कुछ भी नहीं जानता हूँ आपसे बात करने के बाद तो मैं अपना नाम तक भूल गया हूँ. आप ही इस ‘सबसे बड़े आश्चर्य’ वाले दर्शन का रहस्योद्घाटन कर दीजिये !’

‘बच्चे! तो ध्यान से सुन लो. गाँधी दर्शन इतना भी आसान नहीं होता है. मात्र इसका पालन कर अगर सफलता मिलती होती तो बहुत लोग सफल हो जाते. गाँधी दर्शन तभी सफल होता है जब उसके साथ मदिरा का अर्पण भी किया जाता है. आश्चर्य की यही तो बात है कि लोग सरासर देखते हैं कि सफलता उसे ही मिलती है जो गाँधी वाला नोट और मदिरा का घोट भी अर्पित करता है. तब भी तुम जैसे नादान प्राणी महज गाँधी जी वाले नोट से सफलता पाना चाहते हो.’

अब वह पांचो रेंजर रुपी यक्ष को संतुष्ट कर वन विभाग की छाया, जेब में रखे गाँधी वाले नोटों की माया और बैग में रखी शराब की बोतलों वाली काया से मुक्त होकर वनवास से बाहर आ रहे थे.

Web Title: Yaksha, Yudhishthir Dialogue in Kaliyug, Hindi Satire

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