इंसानी जीवन में गलतियों की कोई सीमा नहीं होती. हालांकि, किसी को लूटना और उसकी जान लेना कितना बड़ा अपराध है इसका अनुमान हम और आप आसानी से लगा सकते हैं.

कुछ ऐसी ही प्रवृत्ति डाकुओं की भी होती है. उन्हें किसी के जीवन से कोई मोह नहीं होता. वह बेवजह ही किसी की जान लेकर माल और कीमती सामान लूटकर फरार हो जाते हैं…

महाकाव्य रामायण लिखने वाले महर्षि वाल्मीकि का जीवन भी डाकुओं के जीवन शैली का एक उदाहरण था, जो लोगों की जान लेकर उन्हें लूट लिया करते थे.

शायद उन्हें भी ये अंदेशा न रह होगा की डकैत का रास्ता छोड़ एक दिन वह महाकाव्य रामायण की रचना करेंगे और पूरा विश्व उन्हें महर्षि वाल्मीकि के नाम से जानेगा.

तो आइये आज हम भी कुख्यात डाकू ‘रत्नाकर’ से महर्षि हुए वाल्मीकि के बारे में जानने का प्रयास करें.

हम यह भी जानेंगे की आखिर किस बात से प्रेरित होकर एक डाकू ने महर्षि का रास्ता अपनाया और महाकाव्य रामायण की रचना कर डाली-

डकैती थी वाल्मीकि की परंपरा!

पुराने समय के जानकार महर्षि वाल्मीकि के जन्म के विषय में कोई ठोस जानकारी नहीं होने की बात कहते हैं. परंतु पौराणिक मान्यताओं में महर्षि वाल्मीकि के पिता और माता का नाम वरुण और चर्षणी बताया गया है.

वरुण, महर्षि कश्यप और अदिति के नौवें पुत्र थे. ऐसी भी मान्यता है कि वाल्मीकि के ही भाई महर्षि भृगु थे.

महर्षि वाल्मीकि यानी डाकू रत्नाकर को जन्म के बाद भील प्रजाति की एक महिला ने चुरा लिया था. इस कारण उनका पालन-पोषण भील प्रजाति में ही हुआ.

चूंकि इस प्रजाति में डकैती की परम्परा पूर्वजों से चली आ रही थी, इसलिए रत्नाकर को भी अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए डकैती का रास्ता अपनाना पड़ा.

डकैत होने के बाद रत्नाकर ने कई लोगों को लूटकर मौत के घाट भी उतारा था.

Maharishi Valmiki Was Robber In The Beginning (Representative Pic: youtube)

राम नाम से मिली जीवन को नई राह

एक बार महर्षि नारद की मुलाकात डाकू रत्नाकर से हुई. इस मुलाकात की बहुत ही दिलचस्प कहानी है, जो कुछ इस तरह है…

जब महर्षि नारद निर्जन वन से गुजर रहे थे तभी एक कड़कदार आवाज सुनकर उनके पांव अचानक थम गए. किसी ने उन्हें रुकने के लिए आवाज लगाई थी.

उनके सामने असामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति डाकू रत्नाकर खड़ा था. हाथ में खंजर और बड़ी-बड़ी दाढ़ी मूछों को देखकर महर्षि नारद मन ही मन किसी अनहोनी की आशंका जाहिर करने लगे थे.

इतने में डाकू रत्नाकर ने अपने खंजर की धार को नारद जी की ओर दिखाया और पास के पेड़ से उन्हें रस्सी के सहारे बांध दिया. असल में वह नारद मुनि को लूटने के लिए ऐसा कर रहे थे.

पेड़ से बांधने के बाद नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर से इस व्यवहार की वजह पूछी, तो रत्नाकर ने डकैती को अपने परिवार की जीविका चलाने का एकमात्र साधन बताया.

इसके बाद उन्होंने नारद मुनि से कहा कि वह उन्हें सारा धन दे दें, नहीं तो वह उन्हें जान से मार देगा.

डाकू रत्नाकर की इस बात को सुन कर नारद मुनि ने कहा कि अपने परिवार का भरण पोषण करना परिवार के मुखिया का कर्तव्य होता है. परन्तु जो पाप तुम कर रहे हो उसमें तुम्हारा परिवार कितना भागिदार है.. ?

उनके इस सवाल को सुनकर रत्नाकर ने कहा कि मेरा परिवार हमेशा ही मेरे साथ है, भला वह इस पाप में भागीदार कैसे नहीं होगा.

नारद मुनि ने डाकू रत्नाकर से कहा कि क्या तुमने अपने परिवार से यह बात कभी पूछी है और अगर नहीं पूछी, तो तुम्हें इन सवालों को अपने परिवार से इस समय ही पूछना चाहिए. यदि इस पाप में तुम्हारा परिवार भागीदार होता है, तो मैं अपना सारा धन तुम्हें दे दूंगा…

रत्नाकर नारद मुनि को पेड़ से बंधा ही छोड़कर अपने घर की तरफ चल पड़े. घर जाकर उन्होंने अपने परिवार से इस सवाल को पूछा.

परिवार के किसी सदस्य ने उनके पाप में भागीदार होने की बात नहीं मानी.

इसे सुनकर रत्नाकर के हृदय को गहरा आघात लगा. वह दौड़े-दौड़े नारद मुनि के पास पहुंचे और उनकी रस्सी को खेलकर उनसे छमा याचना करने लगे.

रत्नाकर ने नारद मुनि को के पैर पकड़ लिए और कहा कि उन्हें अच्छाई का रास्ता दिखाएं.

इस पर मुनि ने रत्नाकर को ‘राम-राम’ का उच्चारण करने के लिए कहा.

डाकू रत्नाकर राम के नाम का उच्चारण नहीं कर पा रहे थे. इस पर नारद मुनि ने उन्हें राम के नाम का उल्टा शब्द ‘मरा’ कहने के लिए बोला.

इसमें रत्नाकर को कोई समस्या नहीं हुई और वह ‘मरा’-‘मरा’-‘मरा’ उच्चारण करते हुए पापों का प्रायश्चित करने लगे.

Maharishi Valmiki (Representative Pic: desicomments)

तप के जरिये बने रत्नाकर से महर्षि

डाकू रत्नाकर ने अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए सीतामढ़ी के जंगलों में साठ साल तक कठोर तप किया, और इससे वह डकैत का जीवन त्याग कर महर्षि का जीवन जीने लगे.

लोगों को लूटने और जान से मारने वाले रत्नाकर आस्था के मार्ग पर कदम रख चुके थे. तपस्या में उन्होंने अपने आपको इस कदर लीन कर लिया था कि दीमकों ने कब उनके ऊपर अपना घर बना लिया, उन्हें पता ही नहीं चला!

कहा जाता है कि इसके बाद महादेव ने उन्हें दर्शन दिए और इस तरह से डाकू रत्नाकर महर्षि वाल्मीकि के नाम विख्यात हुए.

एक घटना ने शुरू किया श्लोक का कारवां

महर्षि वाल्मीकि के द्वारा श्लोकों की रचना बहुत सोच विचार कर नहीं की गई. बल्कि उनके मुख से पहले श्लोक अपने आप ही निकले थे. इसके पीछे भी एक कहानी बताई जाती है.

एक बार महर्षि वाल्मीकि वन में घूम रहे थे, तभी उनकी नजर क्रौंच पक्षी के एक जोड़े पर पड़ी. क्रौंच पक्षी का वह जोड़ा प्रेम में लीन था. तभी एक शिकारी ने नर क्रौंच पक्षी पर निशाना साध कर तीर चलाया और उसकी मौत हो गई.

उसी समय महर्षि वाल्मीकि ने क्रोध में आकर शिकारी को जिंदगी भर परेशान रहने का श्राप दे दिया. तभी उनके मुख से अचानक ही कुछ श्लोक निकलने लगे. वह श्लोक इस प्रकार थे….

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वगम: शाश्वती: समा: ।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधी: काममोहितम् ।।

यहीं से शुरू हुआ महर्षि वाल्मीकि के श्लोक का कारवां.

इसके बाद तो धीरे-धीरे श्लोक का यह सिलसिला चलता ही रहा. वक़्त के साथ महर्षि वाल्मीकि ने अपने इन श्लोकों को रामायण का रूप भी दिया. आज तक वाल्मीकि रामायण लोग पढ़ते हैं. महर्षि वाल्मीकि ने इसे इतनी सहजता के साथ लिखा है कि हर कोई इसे पढ़ते हुए इसमें खो जाता है.

Maharishi Valmiki Wrote Ramayana (Pic: maadurgawallpaper)

महर्षि वाल्मीकि का जीवन लोगों के लिए प्रेरणा का विषय है.

इंसानी जीवन के लिए इससे बड़ी सीख कोई नहीं हो सकती कि गलतियों का सुधार कर अपना जीवन बदलने वाले मनुष्य किसी महापुरुष से कम नहीं होते. इसका पाठ महर्षि वाल्मीकि ने बखूबी पढाया है.

इस बारे में आपका क्या कहना है, कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए.

Web Title: Maharishi Valmiki From Robber To Priest, Hindi Article

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