‘विरह’ जिसे आज के दौर में ब्रेकअप कह सकते हैं. कहते हैं ब्रेकअप के दिनों में प्रेमी और प्रेमिका एक-दूजे के लिए तड़प उठते हैं. ऐसे में वह दुख भरे गाने सुनते हैं, लव गुरुओं को फालो करते हैं. पर अफसोस वह विरह के उस सम्राट के नजदीक जाते नहीं दिखते, जिसने विरह पर जब भी लिखा कलेजा हाथ में रखकर लिखा. बात हो रही है कृष्णभक्त सूरदास जी की, जिन्होंने श्रृंगार, वात्सल्य आदि पर तो बहुत कुछ लिखा,  पर विरह पर लिखा हुआ उनका कंटेंट आज के मॉडर्न दौर में भी किसी पोटाश से कम नहीं है. पेश है एक बानगी:

सुनौ गोपी हरि कौ संदेस ।
करि समाधि अंतरगति ध्यावहु, यह उनको उपदेश ।।
वै अविगत अबिनासी पूरन, सबघट रहे समाइ ।
तत्त्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीं है, वेद पुराननि गाइ ।।

श्री कृष्ण से विरह होने के कारण जब ब्रज की गोपियां परेशान होती हैं तब कृष्ण अपने सखा उद्धव को गोपियों के पास एक संदेश के साथ भेजते हैं. उद्धव कहते हैं, सुनो गोपियो! तुम्हारे प्रिय यानी श्री कृष्ण का यही संदेश है तुम सबके लिए कि तुम अपने मन से निर्गुण निराकार ब्रम्हा का ध्यान करो और कृष्ण को भूल जाओ. इससे पहले कि कोई गोपी कुछ कहती वह आगे कहते है:

सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इक चित इक मन लाइ ।
यह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रम्ह तब आइ ।।
दुसह सँदेस सुनत माधौ कौ, गोपी जन बिलखानी ।
‘सूर’ विरह की कौन चलावै, बूड़ति मनु बिनु पानी ।।

मतलब, वेद पुराण भी यही कहते हैं कि बिना इसके मुक्ति संभव नहीं है. इसी उपाय से तुम विरह की पीड़ा से छुटकारा पा सकोगी. अपने कृष्ण के सगुण रुप को भूल जाओ. उद्धव के मुंह से अपने प्रेमी का आदेश सुनकर गोपियां व्यथित हो जाती हैं. यहां तक कि क्रोध में आकर वो उद्धव को काला भंवरा कहकर कटाक्ष करती हैं.

Surdas Jayanti 2017, Gopis of Braj (Pic: jkyog.org)

ऐसा सीन आज भी आसपास आपको देखने को मिल जाता होगा जब आपके किसी दोस्त का उसकी प्रेमिका से ब्रेकअप हो जाता होगा. तब वह अपने किसी दोस्त को उद्धव बनाकर भेजता होगा और उसका हाल भी कुछ ऐसा ही होता होगा.

रहु रे मधुकर मधु मतवारे ।
कौन काज या निरगुन सौ, चिर जीवहु कान्ह हमारे ।।
लोटत पीत पराग कीच मैं, नीच न अंग सम्हारे ।
बारंबार सरक मदिरा की, अपरस रटत उघारे ।।

आगे गोपियां भ्रमर के बहाने उद्धव को सुना-सुना कर कहती हैं, हे ! भंवरे तुम मधु पीने में व्यस्त रहो,  हमें भी मस्त रहने दो. तुम्हारे इस निर्गुण स्वरुप से हमें क्या लेना देना? हमारे लिए तो कान्हा का सगुण रुप ही सबकुछ है. तुम पहले खुद को संभालो. तुम तो पराग में लोट-लोट कर ऐसे बेसुध हो जाते हो कि खुद को होश तक नहीं रहता.

तुम जानत हौ वैसी ग्वारिनि, जैसे कुसुम तिहारे ।
घरी पहर सबहिनि बिरमावत, जेते आवत कारे ।।
सुंदर बदन कमलदल लोचन, जसुमति नंद दुलारे ।
तन मन ‘सूर’ अरषि रही स्यामहिं, कापै लेहि उधारे ।।

हम तुम्हारे जैसे नहीं हैं कि यहां वहां हर फूल पर बहकने के लिए तैयार रहें. हमारे मन में केवल एक ही बसा हुआ है, वह है हमारा कान्हा. नीलकमल से नयन वाला, सुंदर मुख वाला और अपनी मां यशोदा का दुलारा कान्हा. हम अपना तन-मन सबकुछ कान्हा को सौंप चुके हैं. अब तुम्हीं बताओ किसी और के लिए हम नया तन और मन कहां से लेकर आयें.

कुछ ऐसी ही दलीलें आपके दोस्त की प्रेमिका देती होगी आपको, जिसके बाद आपके पास खामोश रहने के अलावा और कोई दूजा विकल्प न बचता होगा.

उधौ जोग सिखावनि आए।
सृंगी भस्म अथारी मुद्रा, दै ब्रजनाथ पठाए।।
जो पै जोग लिख्यौ गोपिन कौ, कत रस रास खिलाए।
तब ही क्यों न ज्ञान उपदेस्यौ, अधर सुधारस लाए।।

गोपियां कहती हैं सखियों आओ,  देखो ये श्याम के सखा उद्धव हमें योग सिखाने आए हैं. स्वयं ब्रजनाथ ने इन्हें भेजा है. हमें तो खेद है कि जब श्याम को इन्हें भेजना ही था. तो, हमारे साथ प्रेम का अद्भुत आनंद क्यों बांटा? जब वे हमें अपने अथरों का रस पिला रहे थे तब ये ज्ञान की बातें कहां गई थी? उस वक्त कहां चला गया था इनका सारा ज्ञान?

Surdas ji with Bal Gopal (Pic: charanamrit.com)

ऐसे सवालों का जबाव आप भी नहीं दे पाते होंगे और आपका ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता होगा.

मुरली शब्द सुनत बन गवनिं, सुत पितगृह बिसराए।
सूरदास संग छांडि स्याम कौ, हमहिं भये पछताए॥

गोपियां आंखों में आंसू भरकर बोलती हैं. अपने कान्हा की मुरली के स्वरों में हम सुधबुध खोकर अपने पिता के घर को भुला दिया करती थीं. हम दौड़े-दौड़े कान्हा के पास चले आया करते थे. हमारे भाग्य में श्याम से विरह ही लिखा था, तो हमने उनसे प्रेम ही क्यों किया. वो फूट-फूट कर रो पड़ती हैं और भारी गले से कहती हैं कान्हा से प्रेम करना उनकी बहुत बड़ी गलती है, लेकिन वह उन्हें विरसा नहीं सकती.

जिस दोस्त की गर्लफेन्ड को आप समझाने के लिए गये होते हैं. वह भी कुछ इस तरह का ही रियक्ट करती होगी, क्योंकि विरह होता ही कुछ ऐसा ही है.

मधुबनी लोगि को पतियाई।
मुख औरै अंतरगति औरै, पतियाँ लिख पठवत जु बनाई।।
ज्यौं कोयल सुत काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाई।
कुहुकि कुहुकि आएं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाई।।

आगे एक गोपी तंज कसते हुए कहती है, मथुरा के लोगों का कौन विश्वास करे? इनके मन में कुछ और होता है और इनके मुंह से कुछ और निकलता है. यह किसी से प्रेम नहीं कर सकते. यह मौसम की तरह बदलते रहते हैं. वंसत आने पर यह कोयल की तरह आवाज निकालते हैं और जाने पर कौआ बन जाते हैं.

ज्यौं मधुकर अम्बुजरस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातें आई।
सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाई

इनका हाल एक भंवरे जैसा होता है जो कमल के पराग को चखने के पहले तो उसके आसपास खूब चक्कर लगाता है और बाद में उसे पूछता तक नहीं है. ये सारे काले शरीर वाले एक से होते हैं. इनसे प्रेम करने का कोई लाभ नहीं है. हमारी ही मति मारी गई थी.

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै।
यह ब्योपार तिहारो ऊधौ, ऐसोई फिरि जैहै॥

गोपियां यहीं नहीं रुकती… वह आगे बढ़ते हुए कहती हैं, हे! उद्धव तुम्हारी योग विद्या यहां नहीं चलने वाली है. इसे तुम अपने पास ही रखो. हमें बेवकूफ न समझो.

यह जापे लै आये हौ मधुकर, ताके उर न समैहै।
दाख छांडि कैं कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै॥
मूरी के पातन के कैना को मुकताहल दैहै।
सूरदास, प्रभु गुनहिं छांड़िकै को निरगुन निरबैहै॥

मूली के पत्तों के बदले माणक मोती हम क्या कोई नहीं दे सकता. भला तुम्हीं बताओ किशमिश छोड़कर कड़वी निंबौली कौन खाना पंसद करेगा. हमने तो कृष्ण पर मोहित होकर प्रेम किया है. अब तुम्हारे इस निर्गुण का निर्वाह हमारे बस का नहीं है. हमें माफ करो.

Surdas Jayanti 2017 (Pic: surdasa.blogspot.in)

आपने देखा कि किस तरह सूरदास जी ने कृष्ण और गोपियों के विरह को बखूबी प्रदर्शित किया. उनका हर एक शब्द करुणा से भरा हुआ है. गोपियों के दर्द को जिस तरह से उन्होंने अपने शब्दों में पिरोया है उसे कोई विरला ही कर सकता है, जो कम से कम आज के दौर में तो कोई दिखाई नहीं देता. भारतवर्ष की महान धरोहर के रूप में कविश्रेष्ठ सूरदास को शत शत नमन.

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