रहने के लिए मिट्टी का बना छोटा सा घर. खाने के लिए नालियों में घूमते चूहे. बदन ढकने के लिए फटे-पुराने कपड़े के टुकड़े. ये किसी ट्रैजिक फिल्म की स्टोरी नहीं, बल्कि मॉडर्न भारत के एक गाँव की सच्ची कहानी है.

इस गाँव के लोगों की जिंदगी इतनी बदतर थी कि उसे शब्दों में बयान कर पाना बहुत मुश्किल था. कई पीढ़ियों से मुसहर जाति के ये लोग एक अंधकार भरी जिंदगी जीने को मजबूर थे.

महादलित कहे जाने वाले ये लोग हर आस छोड़ चुके थे कि तभी सुधा वर्गीस इनकी जिंदगी में आईं. आज उनकी ही बदौलत ये पिछड़ा हुआ समुदाय एक बेहतर कल की ओर बढ़ रहा है.

एमजी मोटर इंडिया (MG Motor India) एवं दी बेटर इंडिया (The Better India), यूएन विमेन (UN Women) के सहयोग से अपनी चेंजमेकर कैम्पेन में ऐसी ही ‘विशेष महिलाओं’ से दुनिया को रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने तमाम बाधाओं को पार करके समाज में बदलाव लाने का काम किया.

तो चलिए जानते हैं कि आखिर कैसे सुधा वर्गीस मुसहर जाति के लिए एक चेंजमेकर बनीं–

गरीबों के हालात बदलना चाहती थीं...

केरल के एक अच्छे और सम्पूर्ण परिवार में जन्मी सुधा वर्गीस अपने जीवन के शुरूआती समय में ही लोगों की मदद में जुट गयी थीं. वो The Sisters of Notre Dame संस्थान के साथ काम करती थीं.

इस संस्था ने 1965 में बिहार के एक कॉन्वेंट स्कूल में सुधा को भेजा. इससे पहले सुधा न तो बिहार गयी थीं और न ही उन्होंने कभी गरीबी और भेदभाव को देखा था.

हालांकि, बिहार पहुँचते ही उन्हें यह सब दिखा!
जिस जगह पर उनका स्कूल था, वहां पर काफी गरीब लोग रहते थे. सुधा और उनके जैसी बाकी कैथोलिक नन उन गरीबों की मदद किया करती थीं.

इसी बीच सुधा को ‘मुसहर जाति’ के बारे में पता चला, जिन्हें बिहार में महादलित भी कहा जाता है. उन्हें ज्ञात हुआ कि मुसहर लोग, आम गरीबों से भी ज्यादा गरीब हैं!

इसके बाद उन्होंने इस गरीबी और लाचारी को खत्म करने का एक तरीका सोचा.

उन्हें ये समझ आ गया था कि अगर गरीबों की ठीक से मदद करनी है, तो पहले उनके साथ रहकर उनकी परेशानी समझनी पड़ेगी.

इसके बाद उन्होंने अपना सामान बाँधा और जमसौत गाँव, पटना की ओर निकल गयीं. यह मुसहर जाति का ही गाँव था.

मुसहर की जिंदगी देखकर हो गयी थीं हैरान!

मुसहर जाति के गाँव में जीवन जीना किसी जंग लड़ने के बराबर था!
बिजली-पानी तो दूर की बात है, वहां शौचालय तक का प्रबंध नहीं था. जैसे-तैसे सुधा को वहां एक घर मिल गया.

उनका घर बहुत ही छोटा और गंदगी से भरा हुआ था. मुसहर लोगों के साथ रहने के लिए उन्हें कई बदलाव भी करने पड़े.

उन्हें रोजाना सुबह 4 बजे उठना पड़ता था, ताकि वह गाँव की महिलाओं के साथ शौच करने जा सकें. उस गाँव में न तो साफ पानी था और न ही अच्छा खाना. ऊपर से, जहां तक नजर डालो, वहां तक गंदगी ही गंदगी.

सुधा को एहसास नहीं था कि समाज का एक हिस्सा इतने बुरे हालातों में जी रहा है. मुसहर जाति का ‘महादलित’ होना उनकी असली परेशानी थी.

उन्हें उनका हक नहीं मिलता, और न ही उन्हें अपने हक मालूम थे. मुसहर जाति के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, क्योंकि वहां उन्हें अछूत कहकर क्लास से दूर रखा जाता था. कई बच्चों को तो बेंच पर बैठने भी नहीं दिया जाता था.

वहीं दूसरी ओर बड़े लोगों के पास सिवाए मजदूरी के और कोई व्यवसाय नहीं था. हालांकि यहाँ भी उनके साथ भेदभाव किया जाता था और उन्हें बाकियों से कम वेतन मिलता था.

मुसहर लोग इस भेदभाव के खिलाफ कुछ नहीं कह पाते थे.

ये सब जानने के बाद सुधा ने सोच लिया कि वह इन लोगों की मदद करेंगी. इसके साथ ही उनका नया सफर शुरू हुआ.

Musahar Community Is Also Known As Rat-Eaters (Pic: straitstimes)

सुधा वर्गीस से बनीं 'साइकिल दीदी'

मुसहर लोगों की जिंदगी सुधारने के लिए सुधा ने लड़कियों की पढ़ाई से शुरुआत की. शुरूआती समय में सुधा बच्चियों के घर वालों से बात करने और उन्हें मनाने के लिए घर-घर गयीं, ताकि वे उन्हें पढ़ने भेज सकें.

सुधा गाँव की बच्चियों के साथ उनके घर वालों को भी जरूरी शिक्षा देती थीं.

उन्होंने खुद वकालत की पढ़ाई भी की, ताकि वह कानूनी अड़चनों को भी संभाल सकें.

1987 में सुधा ने एक NGO भी शुरू किया, जिसका नाम रखा गया 'नारी गुंजन'. मतलब 'औरतों की आवाज'. इसके जरिए वह औरतों को उनके कानूनी अधिकार के बारे में बताकर, उन्हें आगे बढ़ाना चाहती थीं.

इसके जरिए आज बहुत सी महिलाएं घर चलाने के लिए कुछ पैसा कमा पा रही हैं. करीब 750 महिलाओं को सुधा ने आज ‘किचेन गार्डेनिंग से जोड़ दिया है.

इतना ही नहीं आज मुसहर महिलाओं का अपना खुद का एक ‘महिला बैंड’ भी है.

अपनी साइकिल पर घूमने वाली सुधा वर्गीस को लोग 'साइकिल दीदी' के नाम से बुलाने लगे.

उन्होंने गाँव वालों को उनके हक, सफाई और अच्छे जीवन के बारे में बताया. साथ ही कई सरकारी योजनाओं में भी गाँव वालों को जोड़ा.

उनके आने के बाद से गाँव के हालात सुधरने लगे थे. जिस चेंज को वो लाना चाहती थीं, वह नजर आने लगा था.

She Started Her NGO 'Nari Gunjan' For Women Empowerment In Musahar Community (theglobeandmail)

गाँव के लिए स्कूल बनाकर शुरू किया बदलाव

थोड़े ही वक्त में सुधा के NGO से करीब 850 सेल्फ हेल्प ग्रुप जुड़ गए. इसके बाद ही उनका NGO बिहार के पांच जिलों तक पहुँच पाया.

सुधा लड़कियों को पढ़ाई से अलग चीजें भी सिखाना चाहती थीं. घर-घर जाकर ये काम करना थोड़ा मुश्किल था, तो उन्होंने एक स्कूल खोलने की सोची.

इसके बाद 2005 में उन्होंने अपना पहला स्कूल 'प्रेरणा' शुरू किया. इस स्कूल में लड़कियों को खेल, पढ़ाई, हस्त-कला वाले काम और कराटे जैसी चीजें सिखाई जाने लगीं.

इनमें से अधिकांश लड़कियां वह थीं, जिनके खानदान में कभी कोई स्कूल गया ही नहीं था.

स्कूल जाने से गाँव की लड़कियों के अंदर आत्मविश्वास पैदा होने लगा. इतना ही नहीं उनमें आगे बढ़ने की ललक भी दिखाई देने लगी थी.

2011 में हुए गुजरात स्कूल गेम्स में प्रेरणा स्कूल की बच्चियों ने भी भाग लिया था. उन्होंने इसमें कराटे का ऐसा प्रदर्शन दिखाया कि 5 गोल्ड, 5 सिल्वर और 14 ब्रोंज उन लड़कियों ने अपने नाम किए.

इतना ही नहीं ये लड़कियां मार्शल आर्ट प्रतियोगिता के लिए जापान तक गयीं.

सुधा के स्कूल की सफलता देखकर खुद बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार ने स्कूल की दूसरी ब्रांच शुरू करने को उन्हें कहा. इसके बाद 'गया' में प्रेरणा-2 के नाम से स्कूल की दूसरी ब्रांच खोली गई.

वहीं दूसरी ओर गाँव में मुसहर लोगों की जिंदगी भी बदल रही थी. उन्हें सफाई की अहमियत समझ आ रही थी. उन्होंने कई ऐसे काम सीख लिए थे, जिससे वह कुछ पैसे भी कमा सकते थे.

जो सपना लेकर सुधा वर्गीस मुसहर लोगों के पास गई थीं, आखिर में उन्होंने उसे काफी हद तक पा ही लिया. करीब 30 साल लग गए सुधा वर्गीस को अपनी एक सोच को हकीकत बनाने में.

Many Musahar Girls Are The First Generation Of Learners (Representative Pic: vqronline)

सुधा की इस मेहनत के लिए उन्हें 2006 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

एमजी मोटर इंडिया (MG Motor India) एवं दी बेटर इंडिया (The Better India), यूएन विमेन (UN Women) के सहयोग से भारतीय महिलाओं के सम्मान का उत्सव मना रहा है, जो प्रत्येक दिन नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं तो भारत को एक उन्नत भविष्य की ओर प्रभावी ढंग से अग्रसर कर रही हैं.

समाज में बदलाव लाने के लिए जो काम सुधा वर्गीस ने किया उसके आगे हर पुरस्कार छोटा है. यही कारण है कि आज सुधा वर्गीस को ‘चेंजमेकर’ भी कहा जाता है.

उनके द्वारा लाए गए बदलाव के कारण एक पूरे समुदाय की जिंदगी बदल गई.

ऐसे अभियानों को सपोर्ट करने के लिए आप यथासंभव दान कर सकते हैं. डोनेट करने के लिए इस लिंक पर जाएँ: https://milaap.org/fundraisers/mgchangemakers

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Web Title: Sudha Varghese: Lady Who Changed The Life Of Bihar’s Mahadalit

Feature Image Credit: thebetterindia