हॉकी के इतिहास की जब-जब बात की जायेगी, उसमें मेजर ध्यान चंद का नाम हमेशा लिया जायेगा. हॉकी के लिए उन्होंने जो किया, उसकी जितनी भी चर्चा की जाये कम होगी.

वह हॉकी में वही स्थान रखते हैं, जो क्रिकेट में सर डॉन ब्रैडमैन का है. अपने खेल से इतर ध्यान चंद एक अन्य किस्से के लिए भी याद किये जाते हैं.

उनके बारे में कहा जाता है कि 1936 में बर्लिन ओलंपिक खेलों के दौरान उन्होंने हिटलर का एक विशेष प्रस्ताव ठुकरा दिया था. क्या है इस किस्से का सच और वह कौन सा मौका था जब ऐसा हुआ?

आईये जानने की कोशिश करते है.

कठिनाइयों के ‘उस पार’

ओलंपिक शुरु होने से लगभग एक महीने पहले भारतीय हॉकी टीम और जर्मनी ने 17 जुलाई 1936 को एक अभ्यास मैच खेला था. इस मैच में भारत के पास अली दारा, अहमद खान और ध्यान चंद जैसे धुरंधर थे. बावजूद इसके यह मैच भारत जर्मनी से नहीं जीत सका था. इस मुकाबले में जर्मनी ने जहां भारत के ऊपर 4 गोल दागे वहीं भारत सिर्फ एक ही गोल कर पाया था.

ओलंपिक से ठीक पहले भारतीय टीम का इस तरह हारना कप्तान ध्यान चंद के लिए चिंता का विषय था. कहते हैं कि वह इस कारण पूरी रात सो नहीं पाये थे. उन्हें इस बात का डर सताने लगा था कि कहीं ओलंपिक में भारत के सिर से हॉकी में बादशाहत का ताज न छिन जाये. हालांकि, सुबह होते ही उन्होंने अपनी गलतियों से सीखते हुए आगे की रणनीति बनाई.

Major Dhyan Chand (Pic: medium)

मेजर ध्यान चंद बने टीम की ‘ताकत’

जल्द ही वह अपनी पूरी टीम को ओलंपिक के लिए मानसिक रुप से तैयार करने में सफल रहे. ध्यान चंद की अगुवाई में टीम एकदम नई और तरोताजा लग रही थी.

तेजी से वक्त बीता तो ओलंपिक भी आ गया. 5 अगस्त 1936 को भारतीय टीम को हंगरी का मुकाबला करना था. दोनों टीमें मैदान पर उतरीं तो भारतीय खिलाड़ियों में एक अलग किस्म की ही ऊर्जा देखने को मिल रही थी. उन्होंने शानदार खेल दिखाते हुए अपने पहले ही मैच में हंगरी को 4 गोल से पीट दिया.

आगे भी उनकी जीत का सिलसिला जारी रहा. 7-0 से यूएस और 9-0 से जापान को हराने के बाद वह सेमीफाइनल में पहुंची थी. वहां उसने फ्रांस को 10-0 से मात देकर दुनिया को बता दिया कि वह गोल्ड लेकर जायेंगे. इस मुकाबले में ध्यान चंद असली हीरो रहे थे. उनकी अगुवाई में भारत फाइनल मुकाबला खेलने जा रहा था.

जर्मनी का भी हुआ उभार

भारतीय टीम की तर्ज पर जर्मनी भी अपने विजय रथ के साथ आगे बढ़ा और फाइनल तक पहुंचा. जर्मनी का क्रूर तानाशाह हिटलर जर्मनी के प्रदर्शन से खुश था. उसने फाइनल मुकाबले के लिए पूरे जर्मनी को बदल डाला. स्टेडियम के दूर-दूर तक खास किस्म के इंतजाम किये गये. सभी को जर्मनी की टीम का हौंसला बढ़ाने के लिए स्टेडियम पहुंचने का आदेश दिया गया.

हिटलर ने सुनिश्चित किया कि वह इस फाइनल मुकाबले में खुद मौजूद रहेगा. वह किसी भी कीमत पर जर्मनी को जीतते हुए देखना चाहता था. उसने मानसिक रुप से भारतीय खिलाड़ियों पर दवाब बनाने का प्रयास नहीं छोड़ा था. दूसरी तरफ ओलंपिक शुरु होने से पहले ही एक अभ्यास मैच में जर्मनी, भारत को हरा चुका था, इसलिए उसके हौंसले बुलंद थे. वह अपनी जीत को लेकर आश्वस्त लग रहा था.

हालांकि, भारतीय टीम भी खुद को कमजोर नहीं आंक रही थी. कप्तान ध्यानचंद समेत सभी खिलाड़ी आत्मविश्वास से लबरेज थे.

बावजूद इसके उस वक्त हिटलर के प्रभाव के कारण जर्मनी में सिर्फ इस बात की चर्चा हो रही थी कि भारतीय टीम कमजोर है. वह जर्मनी की टीम के सामने कहीं नहीं टिक पायेगी. हर तरह से भारत के मुकाबले जर्मनी को मजबूत माना जा रहा था.

कई लोगों ने तो मैच शुरु होने से पहले ही जर्मनी को विजेता मान लिया था.

टीम इंडिया ने दिखाया दम…

यूं तो भारत और जर्मनी को 14 अगस्त को एक-दूसरे से भिड़ना था, किन्तु ऐन मौके पर तेज बारिश ने सारा मामला खराब कर दिया. मैदान पूरी तरह खराब हो गया था, इसलिए मैच को टाल दिया गया. तय किया गया कि अब यह मुकाबला अगले दिन यानी 15 अगस्त को खेला जायेगा. मैच शुरू होने से पहले भारतीय खिलाड़ी थोड़ी चिंता में दिख रहे थे, पर जब वह मैदान पर उतरे तो उन्होंने तेवर बदल लिये. उन्हें पता था कि यह मैच बहुत महत्वपूर्ण था.

मुकाबले से कुछ मिनट पहले कप्तान ध्यान चंद ने सभी खिलाड़ियों से बात की और उनमें नई जान फूंकने का काम किया. रेफरी के इशारे के साथ भारतीय टीम मैच को जीतने निकल पड़ी.

पहले मिनट से ही जर्मनी के खिलाड़ियों को यकीन नहीं हो रहा था कि वह उसी टीम के साथ खेल रहे हैं, जिसे उन्होंने अभ्यास मैच में बड़े अंतर से हराया था. ध्यान चंद तो कुछ इस तरह गेंद को अपनी हॉकी से लेकर विपक्ष के गोल पोस्ट पर दौड़ रहे थे, जैसे मानो गेंद को उन्होंने हॉकी से चिपकाकर रखा हो. देखते ही देखते भारतीय टीम ने एक के बाद एक गोल ठोकने शुरु कर दिए.

Major Dhyan Chand (Pic: storyweaver)

तोड़ दिया ‘हिटलर’ का सपना

मैच में एक पल आया जब पूरे मैदान में सन्नाटा छा गया था. भारतीय टीम जर्मनी को उसी के मैदान में पीटकर विश्व विजेता बनने जा रही थी. जर्मन खिलाड़ी के चेहरों पर हार का भाव साफ देखा जा सकता था. वह सुस्त पड़ चुके थे. इसी बीच भारतीय टीम ने अपना आखिरी गोल दागकर 8-1 के बड़े अंतर से यह मुकाबला अपने नाम कर लिया.

मैदान पर मौजूद सभी की नज़रें भारतीय टीम के ऊपर टिकी हुईं थीं. खासकर कप्तान ध्यान चंद पर, जिन्होंने इस मुकाबले में अकेले 6 गोल दागकर हिटलर का जर्मनी को अपनी आंखों से जीतते हुए देखने का सपना तोड़ दिया था. सब अपनी कुर्सियों से खड़े होकर उनके अभिवादन में तालियां बजा रहे थे.

ध्यान चंद को अपनी टीम पर गुमान था, क्योंकि उन्होंने अपने देश भारत की लाज रख ली थी. साथ ही भारत के नाम एक और गोल्ड कर दिया था.

इस हार के बाद एक बार पूरे स्टेडियम में शांति छा गई. सबकी नज़रें हिटलर की तरफ थीं कि वह क्या करेगा. वह तो किसी भी कीमत पर यह मैच जीतने वाला था. लोगों को लग रहा था कि कहीं वह आग बबूला होकर तानाशाही का कोई नया उदाहरण न पेश कर दे. किन्तु, हिटलर किसी और ही दुनिया में खोया था.

‘मेजर’ के खेल ने जीता हिटलर का दिल

हिटलर ध्यान चंद के खेल से बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ था. वह जल्द से जल्द भारतीय टीम के कप्तान ध्यान चंद से मिलना चाहता था. तेजी से वह भारतीय टीम को सम्मान देने के लिए मंच पर पहुंचा और आगे बढ़ते हुए ध्यानचंद को पदक पहनाया.

ध्यान चंद पुरस्कार लेकर जाने लगे, तो उसने ध्यान चंद को टोकते हुए कहा, रुको!

उसने अपना हाथ बढ़ाते हुए ध्यान चंद से हाथ मिलाया और कहा कि मैंने इससे पहले तुम्हारे जैसा कोई खिलाड़ी नहीं देखा. तुम्हारे हाथों और स्टिक में जादू है. तुम हॉकी खेलने के अलावा क्या करते हो?

ध्यान चंद ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं भारतीय सेना में लांस नायक हूं.

इस पर हिटलर ने कहा, तुम जर्मनी आ जाओ. मैं तुम्हें ‘फील्ड मार्शल बना दूंगा!

तब यह सेना का बहुत बड़ा पद था.

ध्यान चंद हिटलर के प्रस्ताव को सुनकर हैरान थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहें. उन्होंने हिटलर की तानाशाही के किस्सों का सुन रखा रखा. इस कारण थोड़े असहज लग रहे थे. फिर भी उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए कहा,

मॉफ करें, भारत मेरा देश है और मैं वहां ही ठीक हूं. मैंने भारत का नमक खाया है, मैं भारत के लिए ही खेलूंगा.

हॉकी के ‘जादूगर’ के शब्दों को सुनकर हिटलर उनसे और ज्यादा प्रभावित हुआ. इस तरह ध्यान चंद भारत के लिए गोल्ड जीतने के साथ-साथ हिटलर का दिल जीतने में कामयाब रहे थे. हिटलर ने उन्हें सम्मान के साथ विदा किया था.

An Exhibition on Major Dhyan Chand in Berlin (Pic: sportskeeda)

विनम्रता से हिटलर जैसे तानाशाह के सामने भी भारत को सर्वोपरि मानने वाले ध्यान चंद के जज्बे को सलाम!

वह भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन खेल जगत में उनके योगदान को हमेशा याद किया जायेगा. बताते चलें कि उन्हें इसके लिए 1956 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था. साथ ही बीच-बीच में उन्हें भारत रत्न देने की चर्चा भी गर्म होती रहती है.

Web Title: Connection of Hitler and Dhyan Chand, Hindi Article

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