किक्रेट एक ऐसा खेल है, जिसका जुनून लगभग हर व्यक्ति के सिर पर चढ़कर बोलता है. खासकर भारत में तो किक्रेट की दीवानगी लोगों में कुछ ज्यादा ही देखी जाती है.

यूं तो इस खेल में भाग लेने वाली हर चीज बहुत महत्वपूर्ण है. किन्तु इसमें प्रयोग होने वाली गेंद कूकाबुरा की बात ही कुछ और है!

क्या आप जानते हैं कि यह गेंद बनती कैसे है?

यकीन मानिए एक लंबी प्रक्रिया के बाद कूकाबुरा गेंद अंतर्राष्ट्रीय मैच के लिए तैयार की जाती है. यह प्रक्रिया क्या है और इसके चरण कौन-कौन से हैं आईये जानने की कोशिश करते हैं–

साधारण गेंद नहीं है कूकाबुरा!

सदियों से किक्रेट के इतिहास में इस्तेमाल हो रही ‘कूकाबूरा’ गेंद वर्तमान समय में एक ब्रांड बन चुकी है. किक्रेट के मैदान में टेस्ट मैच से लेकर टी-20 खेलने के लिए इसका ही प्रयोग किया जाता है. असल में विश्व किक्रेट में अपनी अलग पहचान बना चुकी कूकाबुरा गेंद अन्य गेंदों की तरह ही फैक्ट्री में तैयार की जाती है, पर इस गेंद की मज़बूती और इसको बनाने के दौरान प्रयोग होने वाली साम्रगी इसको असाधारण पहचान दिलाती है.

कूकाबुरा गेंद को किक्रेट पिच के अनुरुप ही तैयार किया जाता है. बेहद ठोस एवं वज़नी होने के कारण किक्रेट ग्राउंड पर कूकाबुरा गेंद काफी उछाल लेती है.

कहा जाता है कि कूकाबूरा के कारण ही दिनोंं-दिन क्रिकेट में रोमांच बढ़ता जा रहा है. खासकर यह गेंदबाजों के लिए मददगार है. उनके लिए यह सिर्फ गेंद नहीं होती, बल्कि एक हथियार जैसी होती है, जिसके दम पर वह बड़े से बड़े मुकाबले को जीतने का दम भरते हैं.

Kookaburra Ball (Pic: pakimag)

कैसे पड़ा कूकाबुरा नाम ?

असल में कूकाबुरा एक पक्षी का नाम है, जो आस्ट्रेलिया में पाया जाता है. इसी पक्षी के नाम पर कूकाबुरा कंपनी की स्थापना की गई, जो अब खेल के लिहाज़ से विश्व की सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी है. कंपनी की स्थापना सन् 1890 में एल्फ्रेड थॉम्सन ने की थी.

माना जाता है कि थॉम्सन एक दिन अपने घर पर बैठे थे. इसी दौरान उनके दिमाग में विचार आया क्यों न गेंद बनाने की कोई कंपनी स्टार्ट की जाये. अब उनके सामने समस्या थी कि इसका नाम क्या होगा? वह उसका जवाब ढू़ंढ ही रहे कि उन्हें अचानक आस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले पक्षी कूकाबुरा का ख्याल आया.

उन्होंने देर न करते हुए इसी के नाम पर कंपनी खोल दी और गेंद बनाना शुरु कर दिया. कुछ ही सालों में यह कंपनी आस्ट्रेलिया में काफी लोकप्रिय हो गई. बाद में यह पूरी दुनिया में अपने पैर पसारने में सफल रही.

कैसे लेती है आकार?

अंतर्राष्ट्रीय किक्रेट खेल के लिए तैयार की जाने वाली कूकाबुरा गेंद को बेहद मजबूती और बड़ी सावधानी से बनाया जाता है. कूकाबुरा गेंद को बिल्कुल ठोस बनाने के लिए रेड लेदर और मजबूत धागे को प्रयोग में लाया जाता है.

सबसे पहले रेड लेदर को धूप में सुखा कर उसको सख्त बनाया जाता है. उसके बाद उसे मशीनों द्वारा गेंद की गोलाई के बराबर गोल आकार में काटा जाता है. बॉल को अंदर से और ठोस बनाने के लिए बड़े पेड़ों की लकड़ी की छाल पीसकर उसका गोला बनाया जाता है. इसके बाद उस गोले पर धागे की मोटी परत चढ़ा दी जाती है, ताकि वह समतल रहे.

आखिर में इस गोले को बॉल के अंदर भर कर सफेद धागे से मशीन द्वारा सिलाई कर दी जाती है.

वैसे तो यह पूरी प्रक्रिया मशीनों के द्वारा की जाती है, लेकिन इसे फाइनल टच देने के लिए हाथों का ही प्रयोग किया जाता है. सुनकर थोड़ी सी हैरानी होती है, लेकिन सच तो यह है कि एक कूकाबुरा गेंद को बनाने में महज पंद्रह से बीस मिनट का समय लगता है.

खेल जगत का बड़ा ब्रांड

मौजूदा समय में कूकाबुरा अब न सिर्फ किक्रेट तक सीमित रह गया है, बल्कि हर खेल के मैदान में इस कंपनी का डंका बज रहा है. शुरुआती दौर में बेशक यह कंपनी किक्रेट बॉल बनाने तक सीमित रही, लेकिन अब कूकाबुरा कंपनी फुटबॉल से लेकर हॉकी के खेल के सामानों के लिए विश्व विख्यात हो चुकी है.

हॉकी खेलने के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली हॉकी स्टिक एवं बल्लेबाजों के बेहतरीन बैट कूकाबुरा कंपनी द्वारा तैयार किये जा रहे हैं. कूकाबुरा की लोकप्रियता एवं इसके बेहतरीन उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी भी इसे काफी प्रमोट करते हैं.

यही कारण है कि कूकाबुरा कंपनी को प्रोमोट करने के लिए कई इंटरनेशनल किक्रेट खिलाड़ी आगे आ चुके हैं. इसमें आस्ट्रेलियाई किक्रेटर ग्लैन मैक्सवेल से लेकर मिचेल स्टार्क तक के नाम शामिल हैं.

Kookaburra (Pic: kookaburra.biz)

‘टेस्ट किक्रेट’ के साथ टेस्ट की गई

यूं तो कूकाबुरा गेंद 1890 में बनाई जाने लगी थी, लेकिन इंटरनेशनल मैचों में इसका इस्तेमाल 1946 में होना शुरु हुआ था. सबसे पहले यह ऑस्ट्रेलिया में होने वाले मैचों के दौरान इस्तेमाल की गई. फिर उसके बाद कूकाबुरा गेंद न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड में होने वाले मैचों में इस्तेमाल होने लगी.

मौजूदा समय में कूकाबुरा गेंद न सिर्फ आस्ट्रेलिया में बनती है, बल्कि इसकी फैक्ट्रियां इंग्लैंड, अफ्रीका, बांग्लादेश और इंडिया में भी है. यहां से यह किक्रेट बॉल तैयार कर खेल के मैदानों में पहुंचाई जाती है.

इंटरनेशनल में प्रसिद्ध हो चुकी कूकाबुरा गेंद के दाम की बात जाये तो यह आम गेंदों से बहुत ज्यादा महंगी है. लोकल मैच में इस्तेमाल होने वाली अन्य लेदर गेंदो की तुलना में इस गेंद का दाम तीन गुना अधिक होता है. अन्य कंपनी की एक अच्छी लेदर बॉल की कीमत, जहां दो हज़ार रुपये से शुरु होती है, वहीं असली कूकाबुरा गेंद की कीमत 12 हज़ार रुपये से शुरु होती है.

यही कारण है कि असली कूकाबुरा गेंद राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय मैचों या आईपीएल सरीखे मैचों में ही इस्तेमाल की जाती हैं. हालांकि राज्य स्तरीय मैचों में भी लैदर बॉल का ही प्रयोग होता है, लेकिन ये गेंदें कूकाबुरा कंपनी की नहीं होती.

क्यों होता है कूकाबुरा का रंग लाल?

जब भी आप किक्रेट मैच देखते होंगे. आपकी नज़र गेंद पर पड़ती होगी, तो कभी न कभी यह सवाल जहन में ज़रुर आता होगा कि इसका रंग लाल ही क्यों होता है?

असल में लाल रंग की सबसे बड़ी वजह है बल्लेबाजी के दौरान गेंद का बल्लेबाज़ को स्पष्ट रुप से नज़र आना. किक्रेट के शुरुआती दौर में सभी देशों के खिलाड़ी सफेद ड्रेस पहन कर ही किक्रेट खेला करते थे. सफेद ड्रेस पर लाल गेंद जब बल्लेबाज़ के पैड पर पड़ती है, तो अंपायर को एलबीडब्लू विकेट देने में आसानी होती है.

इसके अलावा तेज़ धूप में जब फील्डर मैदान में फील्डिंग करता है, तो हवा में लाल रंग की गेंद अन्य गेंदों की तुलना में अधिक चमकती है. इससे कैच छूटने की संभावना कम हो जाती है.

टेस्ट मैच की बात करें, तो इसमें खिलाड़ी सफेद कलर की ड्रेस पहनते हैं. इस लिहाज से लाल कलर खेलने में सुविधाजनक हो गया. यही कारण थे कि लाल रंग की यह कूकाबुरा टेस्ट मैचों का हिस्सा बन गई.

बल्लेबाजों के लिए घातक!

कूकाबुरा सख्त होने की वजह से गेंदबाजों की रफ्तार बढ़ा देती है. इसके चलते कई बार उन्हें अतिरिक्त उछाल मिलता है. इस उछाल को संभालना आसान नहीं होता. हालांकि, इसके लिए हेलमेट जैसे कई सुरक्षा कवच पहनकर बल्लेबाज मैदान पर उतरता है.

किन्तु कई बार यह घातक साबित हुई है. वर्ल्ड किक्रेट में इस गेंद के कारण कई किक्रेटरों की जान भी जा चुकी है. नंवबर 2014 में आस्ट्रेलिया में खेले जा रहे एक मैच के दौरान ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी फिलिप ह्यूज इसका शिकार बन चुके हैं. बल्लेबाजी करने के दौरान सिर के निचले हिस्से में इसके लगने से उनकी मौत हो गई थी.

Australian Cricketer Phillip Hughes (Pic: kessbentv)

तो यह थे कूकाबुरा से जुड़े कुछ पहलू. आपको हमारी यह पेशकश कैसी लगी. नीचे दिये गये कमेंट बॉक्स में जरुर बताइयेगा.

Web Title: History Of Kookaburra Ball, Hindi Article

Featured Image Credit: espncricinfo