हर चार साल में होने वाले ओलिंपिक खेल किसी खिलाड़ी और देश के लिए कितने अहम होते हैं इस बात से कोई भी अनजान नहीं है. हर देश के खिलाड़ी इसमें पदक जीतने के लिए अपने दिन रात एक कर देते हैं.

ऐसे ही एक खिलाड़ी थे खाशाबा दादासाहेब जाधव जिन्होंने आजाद भारत को पहला इंडिविजुअल ओलिंपिक मेडल दिलाया लेकिन आज कोई उनका नाम तक नहीं जानता!

तो चलिए क्यों न इतिहास के पन्नों से एक बार फिर ओलंपिक मेडलिस्ट जाधव की यादों को जिंदा किया जाए–

बचपन में ही जोड़ लिया था कुश्ती संग नाता

जाधव का जन्म महाराष्ट्र के एक गाँव गोलेश्वर में हुआ था. कहते हैं कि पीढ़ियों से उनके परिवार में कुश्ती सीखने का चलन है इसलिए छोटी उम्र से ही जाधव को भी इसमें आना पड़ा. जाधव के लिए कुश्ती सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि एक एहसास था. माना जाता है कि वैसे तो जाधव स्विमिंग, वेटलिफ्टिंग, जिमनास्टिक जैसे खेलों में भी काफी अच्छे थे… लेकिन उनकी असली जान थी कुश्ती.

कहते हैं कि जाधव बहुत अमीर घराने से नहीं थे. बहुत मुश्किल से उनका महीने का गुजारा चलता था, लेकिन फिर भी उनके परिवार ने कभी भी उन्हें कुश्ती करने से नहीं रोका. जाधव पूरी लगन से कुश्ती सीखते रहे. ऐसा माना जाता है कि आठ साल की उम्र में जाधव ने अपना पहला मुकाबला खेला.

उस मुकाबले के बारे में कुछ यूँ कहा जाता है कि जाधव ने वहां के कुश्ती चैम्पियन को हरा दिया था… वह भी दो मिनट के अंदर!

कहते हैं कि उस दिन के बाद से जाधव ने यह निश्चय कर लिया कि वह एक प्रोफेशनल रेसलर बनके रहेंगे. वह कड़ी मेहनत करने लगे… कुश्ती में आगे बढ़ने के लिए.

Jadhav Started Learning Kushti At A Very Early Age (Representative Pic: telegraph)

लंदन ओलिंपिक में किया हार का सामना!

बड़े होने तक भी जाधव का कुश्ती प्रेम कम नहीं हुआ. वह निरंतर आगे बढ़ते रहे. पहले अपने पड़ोस के गाँव, फिर स्कूल, कॉलेज और नेशनल लेवल तक जो भी जाधव के सामने आया उसे मुंह की खानी पड़ी. अपने निरंतर अच्छे होते खेल के कारण ही जाधव 1948 के लंदन ओलिंपिक के लिए सेलेक्ट हो गए.

यह जाधव के लिए खुशी की बात तो थी कि वह ओलिंपिक के लिए चुने गए लेकिन उनके पास वहां जाने के पैसे नहीं थे. माना जाता है उस समय सरकार भी खेलों पर ज्यादा खर्च नहीं करती थी. जाधव का ओलिंपिक सपना कहीं बेकार न चला जाए इसलिए उनके गाँव वालों और कोल्हापुर के महाराजा ने उनके लिए पैसे इकठ्ठा किए.

उनकी मदद से जाधव ओलिंपिक खेलने जा पाए. कहते हैं प्रोफेशन रेसलिंग जाधव के लिए उस समय एक नई चीज थी. उन्हें नंगे पैर मिट्टी के अखाड़े में खेलना आता था लेकिन रूल्स के साथ मैट पर नहीं! वह थोड़े परेशान जरूर थे लेकिन जब वह खेलने उतरे तो उन्होंने सबको हैरान कर दिया. उनके आगे इंटरनेशनल प्लेयर भी नहीं टिक पा रहे थे.

कुछ मैच तो जाधव ने बखूबी जीते लेकिन अंत में वह छठे पायदान पर आकर हार गए. माना जाता है वह अपने साथ कोई पदक तो नहीं ला सके लेकिन एक लक्ष्य जरूर ले आए. उनका लक्ष्य था कि अगले ओलिंपिक में उन्हें भारत के लिए पदक जीतना ही है… किसी भी हालत में! अपने उस सपने के लिए जाधव ने खून-पसीना एक कर दिया ट्रेनिंग में.

Jadhav Played In London Olympics But He Could Not Get A Title (Representative Pic: wikipedia)

जब जाधव ने दिलाया पहला इंडिविजुअल ओलिंपिक मेडल…

लंदन ओलिंपिक की हार जाधव के दिलो-दिमाग से गई नहीं थी. वह नहीं भूले थे कि आखिर उनका लक्ष्य क्या है!

कहते हैं कि अगले ओलिंपिक के लिए उन्होंने चार साल तक कड़ा परिश्रम किया. 1952 में जाधव के सामने एक बार फिर से ओलिंपिक में जाने का मौका आया लेकिन एक बार फिर उनके सामने पैसों की परेशानी भी आ गई.

कहते हैं फिर उन्हें कोल्हापुर के महाराजा की तरफ से कोई मदद नहीं मिली और न ही सरकार की तरफ से. वह जगह-जगह लोगों के पास जाते रहे पैसे इकठ्ठा करने के लिए लेकिन उन्हें पैसे नहीं मिले. जब जाधव को लगा कि उनका सपना अब अधूरा रह जाएगा तब उनके कॉलेज के प्रिंसिपल उनकी मदद करने सामने आए. माना जाता है उन्हें जाधव पर विश्वास था जिसके लिए उन्होंने 7000 रूपए में अपना घर गिरवी रखा ताकि जाधव ओलिंपिक के लिए फिनलैंड जा सकें.

जाधव जेब में पैसे और आँखों में सपने लिए ओलिंपिक खेलने पहुंचे. उन्होंने वहां कई इंटरनेशनल खिलाडियों को पस्त कर दिया था. कहते हैं कि जाधव ने उस समय एक फाइट लड़ी ही थी कि उनकी अगली फाइट रूस के पहलवान से थी. माना जाता है उस समय के नियमों के हिसाब से दो फाइट्स के बीच 30 मिनट का फर्क होना चाहिए लेकिन जाधव के अलावा वहां भारत से कोई और नहीं था… इसलिए जाधव को तुरंत ही वापस लड़ना पड़ा.

कहते हैं वह थके हुए थे लेकिन फिर भी लड़े और एक घमासान मुकाबला करने के बाद वह हार गए. अपनी हार के कारण उन्होंने फाइनल में जाने का चांस भी खो दिया था. इन सबके बावजूद वह कांस्य पदक हासिल करने में कामयाब रहे. वह आजाद भारत के पहले ऐसे भारतीय बने जो अकेले किसी खेल में मेडल लाया हो. जाधव के इस कारनामे ने इतिहास के पन्नों में उनका नाम दर्ज करवा दिया.

Khashaba Dadasaheb Jadhav’s Medal And Personal Photo (Pic: thelogicalindian/indianexpress)

मरते दम तक गुमनामी में जिए जाधव…

देश के लिए इतिहास रचने के बाद जब जाधव वापस भारत लौटे तो थोड़े समय तो उनकी खूब वाहवाही हुई लेकिन बाद में उन्हें लोग भूलते गए. उन्हें महाराष्ट्र पुलिस में नौकरी दे दी गई. वह पूरी जिंदगी पुलिस की नौकरी ही करते रहे. महाराष्ट्र सरकार ने तो उन्हें कुछ पुरस्कारों से नवाज़ा लेकिन स्पोर्ट्स अथॉरिटी की तरफ से उनके लिए कुछ भी नहीं किया गया. कहते हैं जाधव को पुरस्कारों की भूख नहीं थी वह तो चाहते थे कि देश में कुश्ती को प्रोत्साहित किया जाए.

बाद में इस खेल योद्धा की 1984 में एक मोटरसाइकिल एक्सीडेंट में मौत हो गई.

इसके बाद जाधव के बेटे ने उनके लिए आवाज उठाई जब उन्होंने देखा कि ओलिंपिक विजेताओं को पद्म भूषण पुरस्कार मिल रहा है उनके पिता को नहीं. उनके बेटे ने सरकार से दलील की कि ऐसा भेदभाव भला क्यों किया जा रहा है लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी.

आखिर में सन 2000 में सरकार ने जाधव को अर्जुन पुरस्कार से नवाज़ा… वह भी उनकी मौत के बाद.

Khashaba Dadasaheb Jadhav First Indian To Win Olympic Medal (Representative Pic: ayashbasuphoto)

जाधव का मेडल हो रहा है ‘नीलाम’

अभी हाल ही में जाधव का नाम खबरों में फिर से आया जब यह बात सामने आई कि उनका परिवार उनका ओलिंपिक मेडल बेच रहा है. कहते हैं ऐसा करने के पीछे यह वजह थी कि जाधव हमेशा से चाहते थे उनके गाँव में एक अच्छी रेसलिंग अकादमी हो लेकिन महाराष्ट्र सरकार से उन्हें बस झूठे दिलासे ही मिले.

2009 में उनसे एक बार फिर वादा किया गया अकादमी बनाने का लेकिन वह भी पूरा नहीं हुआ. इस वजह से अंत में आकर जाधव के बेटे ने यह निर्णय लिया कि अगर अकादमी नहीं बनाई तो वह अपने पिता का मेडल बेच कर उसे बनवाएंगे. कहते हैं कि उनके बेटे का मानना है कि वह मेडल अमूल्य है और देश की धरोहर है लेकिन मजबूरन उन्हें ऐसा सख्त कदम उठाना ही पड़ेगा.

KD Jadhav Son Said He’s Going To Auction His Father’s Olympic Medal (Pic: wignallsea)

खाशाबा दादासाहेब जाधव को दुनिया इस तरह भूल जाएगी यह किसी ने सोचा भी नहीं होगा. उनकी जिंदगी के दो ही सपने थे भारत के लिए पदक जीतना और रेसलिंग अकादमी बनवाना.

एक तो उन्होंने पूरा कर दिया लेकिन एक की लड़ाई आज भी जारी है. वक़्त की धूल में जाधव का नाम कहीं खो गया था. अब उम्मीद करते हैं कि जल्द ही उनका आखिरी सपना भी पूरा हो जाए.

Web Title: Khashaba Dadasaheb Jadhav First Indian To Win Olympic Medal, Hindi Article

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