दुनिया में खेलों के हर प्रारुप में भारत ने अपना वर्चस्व बनाना शुरू कर दिया है. देश और विदेश में आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं में अब भारतीय खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने की कोशिश करते नज़र आते हैं. इस कड़ी में, राष्ट्रीय खेलों से लेकर ओलिंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों की प्रतिभा नज़र आ रही है.

लेकिन, यह कहानी तब की है जब भारतीय खिलाड़ी उस स्तर के पेशेवर नहीं थे. बावजूद इसके उन्होंने भारत के झंडे की शान हर जगह ऊँची रखी.

ऐसे ही एक महान भारतीय खिलाड़ी की हम बात कर रहे हैं, जिसने मुफलिसी और तंगी की दुनिया से निकलकर कड़ी मेहनत से मुकाम पाया. इस खिलाड़ी को दुनिया फ्लाइंग सिख के नाम से जानती है.

आपने ठीक पहचाना… हम बात कर रहे हैं भारत के सफल धावक मिलखा सिंह की जिन्होंने अपनी रफ्तार से सबका दिल जीत लिया. आइये इस फ्लाइंग सिख के बारे में और करीब से जानते हैं.

अब तक सताती हैं पुरानी यादें…

Flying Sikh Milkha Singh (Pic: pinterest)

इस मशहूर भारतीय धावक का जन्म पाकिस्तान में हुआ था. रिकार्ड के अनुसार पाकिस्तान के पंजाब राज्य के छोटे से गांव गोविंदपुरा में 20 नवंबर 1929 को मिलखा सिंह का जन्म हुआ. कहा जाता है कि मिलखा सिंह के पंद्रह बहन-भाई थे. बंटवारे के दौरान दोनों देशों के बीच हुई हिंसा में मिलखा सिंह के सिर से माता-पिता का साया उठ गया था. हिंसा में उनके माता-पिता एक भाई और दो बहनों की मौत हो गई थी.

मिलखा सिंह इन हत्याओं के खुद इकलौते गवाह रहे हैं.

हिंसा में खुद को बचाते हुए मिलखा सिंह ट्रेन से भारत आ गये थे. पाकिस्तान से ट्रेन में छुप कर भारत आने के लिये बिना टिकट ट्रेन में सफर करने पर उन्हें कुछ समय के लिये तिहाड़ जेल भी जाना पड़ा. तब मिलखा सिंह की बहन ने अपने कीमती ज़ेवर बेच उनको तिहाड़ जेल से रिहा कराया था. अपनी जिंदगी के शुरुआती दौर में पाकिस्तान से भारत आये मिलखा सिंह को शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा था. जीवन बहुत कठोर था. कहते हैं कि आज तक मिलखा सिंह को वह कड़वी यादें सताती हैं.

Many Member Of Milkha Singh’s Family Got Killed During Riots (Partition Pic: time)

फौज में जाने की थी तमन्ना…

पाकिस्तान में हो रही हिंसा से मिलखा सिंह खुद को बचाते हुये भारत तो आ गये, लेकिन उनके लिये चीज़े यहां बिल्कुल आसान नहीं थीं. शरणार्थी शिविर में पेट भरने के लिये खाना भी कई बार मयस्सर नहीं होता था.

उनके सामने रोजगार का सिर्फ एक ही जरिया था ‘भारतीय सेना‘!

सिर्फ वहीं वह कुछ पैसे कमा सकते थे. अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए उन्होंने फौज का हिस्सा बनने की ठान ली. कहते हैं कि उन्होंने फौज की भर्ती के लिए खुद को तैयार करना शुरू कर दिया. माना जाता है कि मिलखा सिंह ने तीन बार कोशिश की भर्ती होने की, लेकिन तीनों बार उनके हाथ बस असफलता ही लगी. वह हताश थे कि तभी उनके भाई उनके लिए उम्मीद की किरण बन के सामने आए.

मिलखा सिंह के भाई ने जैसे तैसे उन्हें इलेक्ट्रिकल मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर में नौकरी दिला दी. बड़ी कोशिशों के बाद मिलखा सिंह का फौज में जाने का सपना पूरा हो पाया था. फौज में आने के बाद से मिलखा सिंह के जीवन का एक बिल्कुल ही नया पड़ाव शुरू हो गया.

After The First Three Rejection’s Milkh Singh Got Selected In Indian Army (Representative Pic: wikimedia)

सेना में ही शुरु हुआ धावक बनने का सफर

खेल कूद के लिए भारतीय सेना हमेशा तैयार रहती है.

कितने ही बड़े खिलाड़ी सेना ने देश को दिए हैं. मिलखा सिंह का नाम भी उस सूची में शामिल है. फौज में भर्ती होने के बाद मिलखा सिंह एक धावक बनने की राह पर चल पड़े. उन्हें इस चीज का कोई अंदाजा नहीं था, लेकिन फिर भी वह एक बार इसे आजमाना चाहते थे.

1951 में उन्होंने अपनी पहली दौड़ शुरू की. वह एक पांच मील लंबी क्रॉस कंट्री रेस थी. इतनी लंबी दौड़ का मिलखा सिंह को कोई अनुभव नहीं था. कहते हैं कि उनके लिए यह बहुत ही मुश्किल था. दौड़ते हुए वह कई बार जमीन पर गिरे. उन्हें भागने में परेशानी हुई, लेकिन वह डटे रहे. उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी. रेस जीतने वाले पहले दस खिलाड़ियों का अगले पड़ाव के लिए सिलेक्शन होना था. मिलखा सिंह की नजर भी उस पर ही थी.

रेस खत्म हुई और कई परेशानियों के बावजूद भी मिलखा सिंह छठे पायदान पर आने में कामयाब रहे. रेस के बाद उन्हें हिदायत दी गई कि वह तेज दौड़ते हैं, इसलिए उन्हें मैराथन नहीं बल्कि 400 मीटर की दौड़ में हिस्सा लेना चाहिए. इसके साथ ही मिलखा सिंह सेना की स्पोर्ट्स टीम का हिस्सा बन गए. इसके बाद मिलखा सिंह सेना की ओर से सैन्य खेलों में हिस्सा लेने लगे.

Milkha Singh Started His Career From Running For Army Games (Pic: timesofindia)

कॉमनवेल्थ में रचा इतिहास!

1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में मिलखा सिंह पहली बार हिस्सा ले रहे थे.

इससे पहले उन्होंने एशियाई खेलों में अपने नाम का परचम लहरा दिया था, लेकिन कॉमनवेल्थ जैसे बड़े खेलों में कोई भी उनके नाम से परिचित नहीं था. कहते हैं कि मैच से एक रात पहले मिलखा सिंह इतने प्रेशर में थे कि वह सो भी नहीं पा रहे थे. उनसे उम्मीदें थीं कि वह भारत को पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड दिलवाएंगे. सुबह की धूप के साथ मिलखा सिंह की रेस का समय शुरू हो गया. दुनिया भर के तेज धावक स्टार्टिंग लाइन पर खड़े हो गए थे. मिलखा सिंह भी वहां पहुँचे और मैदान को माथे से चूमते हुए रेस के लिए तैयार हुए.

रेस शुरू हुई और मिलखा सिंह अपने पहले 350 मीटर ऐसे भागे कि जैसे वह उनकी आखिरी रेस हो. उन्होंने थोड़े ही समय में दुनिया के सबसे बेहतरीन और नामचीन धावकों को पीछे छोड़ दिया. कुछ ही पलों बाद वह पल आया जिसने मिलखा सिंह को हीरो बना दिया. उन्होंने सबसे पहले फिनिश लाइन पर कदम रख रेस और गोल्ड मेडल दोनों को अपने नाम कर लिया.

पूरे स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया… जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं थी मिलखा सिंह ने वह कर दिखाया था!

स्टेडियम में उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन भी थीं. वह मिलखा सिंह की इस उपलब्धि के लिए उन्हें ईनाम देना चाहती थीं. उन्होंने मिलखा सिंह से कहा कि प्रधानमंत्री आपको इस ऐतिहासिक जीत के लिए ईनाम देना चाहते हैं… कहिए आपको क्या चाहिए? मिलखा सिंह चाहते तो बहुत कुछ मांग सकते थे, लेकिन उन्होंने बस इतना कहा कि एक दिन के लिए भारत में छुट्टी दे दीजिए. उन्होंने आखिर में अपना यह ईनाम पा लिया.

Milkha Singh Won First Commonwealth Gold Medal For India (Representative Pic: urbanasian)

…और अयूब खान से मिला ‘फ्लाइंग सिख’ का नाम!

1960 में पकिस्तान में खास खेल आयोजित किए गए. मिलखा सिंह का नाम उस रेस में दौड़ने के लिए सेलेक्ट हो गया था. कहते हैं कि मिलखा सिंह पकिस्तान नहीं जाना चाहते थे क्योंकि वहां ही उनके माता-पिता का कत्ल हुआ था. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर आखिर में मिलखा मान गए.

उन्हें पकिस्तान के चैम्पियन रेसर अब्दुल खालिक के साथ मुकाबला करना था. हर तरफ बस मिलखा सिंह और अब्दुल खालिक के मुकाबले की ही चर्चा हो रही थी. मुकाबले के दिन पूरा स्टेडियम लोगों से खचाखच भरा हुआ था. रेस से कुछ देर पहले ही स्टेडियम में बैठे लोगों ने प्रार्थनाएं शुरू कर दी खालिक की जीत के लिए.

थोड़े समय बाद रेस शुरू होने का समय आ गया. हर कोई दिल थाम के बैठे गया था इस नजारे को देखने के लिए. जैसे ही रेस का बिगुल बजा पाकिस्तान के खालिक गोली की रफ़्तार में मिलखा सिंह को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए. क्योंकि खालिक 100 मीटर रेस खेलते थे इसलिए पहले 100 मीटर में वह मिलखा सिंह से आगे रहे. एक बार जैसे ही खालिक थोड़े धीमे हुए मिलखा सिंह ने अपना दाव चला और तेजी से खालिक को पछाड़ते हुए आगे निकल गए और रेस अपने नाम कर ली.

Milkha Singh with India’s First Prime Minister Jawahar Lal Nehru (Pic: youtube/holycow)

रेस खत्म हुई और मेडल लेने के लिए मिलखा सिंह पहुंचे. वहीं पर उनकी मुलाकात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब से हुई. कहते हैं कि उन्होंने मिल्खा से कहा कि वह दौड़ नहीं उड़ रहे थे. उन्होंने ही फिर मिलखा सिंह को उनका विश्व प्रसिद्ध नाम दिया ‘फ्लाइंग सिख’!

आज तक उनके साथ यह नाम जुड़ा हुआ है.

मिलखा सिंह के ज़िंदगी से जुड़े यह दिलचस्प किस्से आपको कैसे लगे कमेंट बॉक्स में ज़रुर बतायें. साथ में यह भी बतायें कि वर्तमान समय पर भारत में मिलखा सिंह की तर्ज पर कौन सबसे सफल धावक है.

Web Title: Milkha Singh: A Journey To Become A ‘Flying Sikh’, Hindi Article

Featured Image Credit: desimartini/BBC