गामा पहलवानी की दुनिया का एक ऐसा नाम है, जिनके हुनर का लोहा सभी ने माना. पहलवानों के लिए वह हमेशा से प्रेरणास्रोत रहे हैं. कहते हैं अभी तक उनके जैसा कोई नाम नहीं हुआ. उनकी उपलब्धियों के इर्द-गिर्द दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आता. तो आइये जरा नजदीक से जानते हैं अमृतसर में जन्मे रियल लाइफ के इस ‘सुल्तान’ को:

पिता ने सिखाए पहलवानी के गुर

1880 में पंजाब के अमृतसर में ‘गामा’ ने जिस परिवार में जन्म लिया था, वहां पहलवानी को लोग ओढ़ते और बिछाते थे. अपने पिता को घंटों अखाडे़ में पसीना बहाते देखते हुए ‘गामा’ बड़े हुए. वह दंगल के दांव पेंच को बड़े गौर से देखा करते थे. पहलवानी के प्रति बेटे की रुचि को देखते हुए एक दिन पिता ने उन्हें अखाड़े में उतार दिया.

वह पिता के साथ घंटों लगे रहे. इसके बाद तो यह उनकी दिनचर्या में आ गया. वह छोटी सी उम्र में अपने पिता के साथ रोज कुछ वक्त पहलवानी को देने लगे. उनकी सीखने की स्पीड बहुत तेज थी. जल्द ही वह एक प्रोफेशनल पहलवान की तरह दंगल में दिखने लगे. पिता का रिटायरमेंट नजदीक था, इसलिए गामा के कंधों पर ही पिता की विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी.

5 साल के थे, जब पिता चल बसे…

पिता पहलवानी से जरुर रिटायर हुए थे, लेकिन पहलवानी के लिए उनकी दीवानगी कम नहीं हुई थी. वह गामा में खुद को देखते थे. वह चाहते थे कि गामा बुलंदियों की उन चोटियों पर पहुंचे, जहां कभी वह पहुंचना चाहते थे. वह गामा को दुनिया का सबसे बड़ा पहलवान बनते हुए देखना चाहते थे. बाद में गामा ने पिता का यह सपना पूरा तो किया, लेकिन अफसोस जब उन्हें खिताब मिला तो पिता उनके साथ न थे.

वह महज 5 साल के थे, जब उनके गुरु और पिता की मृत्यु हुई. ‘गामा’ के ऊपर दुखों का एक ऐसा पहाड़ टूट पड़ा था, जिसका बोझ वह नहीं उठा सकते थे. ऐसे में चाचा ने आगे बढ़कर ‘गामा’ का हाथ थामा. पिता की तरह चाचा भी पहलवानी का हुनर रखते थे. वह गामा के नए गुरु बन गए थे. इस तरह ‘गामा’ लग गये पिता के सपने को पूरा करने के लिए.

Story Of The Great Gama Pahalwan (Pic: reddit.com)

पहले ही मुकाबले में दिखा दिया ‘हुनर’

महज दस साल के रहे होंगे गामा, जब वह जोधपुर के अखाड़े में दुश्मन के सामने ताल ठोक रहे थे. प्रोफेशनली यह उनका पहला मुकाबला था, लेकिन उनके चेहरे में किसी प्रक्रार का कोई डर नहीं था. वह आत्मविश्वास से पूरी तरह लबरेज थे. आंखों में सिर्फ दुश्मन को चित्त करने का सपना दिख रहा था.

रेफरी की हरी झंड़ी से जैसे ही मुकाबला शुरु हुआ, वह अपने प्रतिद्वंदी पर टूट पड़े. लगभग घंटे भर चले इस मुकाबले में उन्होंने अपने कई दांव दिखाए. भीड़ में सिर्फ एक ही आवाज गूंज रही थी. गामा…गामा…अचानक गामा ने अपना दांव खेला और प्रतिद्वंदी को चित्त कर दिया. वह यह मुकाबला जीत चुके थे. सभी की जुबान पर उनके लिए सम्मानसूचक शब्द थे. जोधपुर के महाराजा तक खड़े होकर उनके सम्मान में तालियां बजाने को मजबूर हो गये थे. इस जीत ने ‘गामा’ को  पहलवानी का स्टार बना दिया.

जोधपुर में मिली अपनी पहली जीत के बाद गामा ने कभी पलटकर नहीं देखा. गामा आगे-आगे और उपलब्धियां उनके पीछे-पीछे चलती रहीं. आलम यह था कि उनके सामने जो भी पहलवान आता वह उसे मिनटों में धूल चटा देते. दूर-सुदूर की चुनौतियां वह स्वीकार करते गये और जीत के साथ आगे बढ़ते गए. इसी सफर में उन्हें  ‘शेर-ए-पंजाब‘ के ताज से नवाजा गया. वह पंजाब की पहलवानी के राजा बन चुके थे.

भारत के नामी पहलवान से टक्कर

जल्दी ही ‘गामा’ की ख्याति पंजाब से बाहर निकलते हुए भारत भर में फैल गई. अभी तक के करियर में वह एक भी मैच नहीं हारे थे. ऐसे में उनकी काबिलियत के आंकलन के लिए उनको भारत के नामी पहलवान ‘रहीम बक्श सुल्तानिवाला’ के सामने उतार दिया गया. यह एक बहुत बड़ा मुकाबला था. गामा जानते थे कि यह एक ऐसा मुकाबला है, जो उन्हें तुरंत शीर्ष पर पहुंचा देगा.

इसके लिए उन्होंने खुद को तैयार किया और आ गये अखाड़े में दो-दो हाथ करने के लिए. इसके दो बड़े कारण थे. पहला तो यह कि रहीम सात फुट लम्बा, सुडौल शरीर वाला था. जबकि, गामा पांच फुट सात इंच के किसी आम इंसान जैसे थे. दूसरा यह कि रहीम ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ यानी राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी था.

खैर इन सबके बीच मुकाबला शुरु हुआ. दोनों पहलवान अखाड़े की मिट्टी को चूमते हुए आगे बढ़ते हैं. पहले ही दांव में रहीम गामा को चकमा देने में सफल रहता है, पर ‘गामा’ खुद को संभालते हुए जवाबी दांव चलते हैं. मुकाबला एक जंग की तरह लड़ा जा रहा था. लोग अपनी अंगुली दबाए हुए बैठे थे. लड़ाई टक्कर की रही पर जीता कोई नहीं.

असल में काफी समय बाद भी जब कोई हार मानने को तैयार नहीं दिखा, तो मुकाबला बराबरी पर ही बंद कर दिया गया. हालांकि, कुछ सालों बाद 1911 में गामा का सामना फिर रहीम बक्श से हुआ था. इस बार रहीम को गामा ने चित कर दिया.

Story Of The Great Gama Pahalwan (Pic: howstuffworks.com)

विदेशों में भारत का नाम रोशन किया

‘रुस्तम-ए-हिन्द’ से लड़ने के बाद ‘गामा’ का विजय रथ चलता रहा. वह लाइम लाईट में आये तो देश के बाहर विदेशों से भी उनको चुनौतियां मिलीं. चूंकि, वह आत्मविश्वास से हमेशा से लबरेज रहते थे, वह वहां भी हिट रहे. उन्होंने जैविस्को, बेंजामिन रोलर, फ्रेंक गोच और स्टानिस्लौस जैसे विश्व स्तरीय पहलवानों को शिकस्त दी. ज्यादातर मैचों में गामा ने अपने विरोधियों को कुछ मिनटों में ही मात दे दी थी.

गामा ने अपने जीवन में देश के साथ विदेशों के 50 नामी पहलवानों से कुश्ती लड़ी और सभी जीतीं. पूरी दुनिया में गामा को कोई हरा नहीं सका, इसलिए उन्हें वर्ल्ड चैम्पियन का खिताब मिला था.

1947 में बंटवारे के बाद गामा को पाकिस्तान जाना पड़ा था. पर कहते हैं कि उनका दिल भारत में ही बसता था. 1952 तक उन्होंने पहलवानी को अपना मिशन बनाए रखा. वह आगे भी लड़ना चाहते थे, लेकिन अस्थमा और दिल की बीमारी के चलते उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था. 1960 में उन्होंने हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और अपने चाहने वालों की आंखें नम कर गये.

Story Of The Great Gama Pahalwan (Pic: drk zany)

अखाड़े में आक्रामक रहने वाले गामा असल जिदंगी में बहुत शांत थे. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश का मान बढ़ाने में लगा दी. यहीं कारण था कि ‘ब्रूस ली’ जैसे लोगों का वह प्रेरणास्रोत बने. ‘गामा’ पहलवान की उपलब्धियों को वक्त की धूल ने भले ही धुंधला कर दिया हो, पर सच तो यही है कि पहलवानी की दुनिया में आज भी वह अदब से याद किए जाते हैं.

Web Title: Story Of The Great Gama Pahalwan, Hindi Article

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