1983 के बाद भारत ने पहली बार वर्ल्ड कप 2011 में जीता था.

इस वर्ल्ड कप की यादों में अगर हम कुछ याद करते हैं, तो हमें सचिन का वर्ल्ड कप की ट्राफी उठाना… युवराज सिंह का मैदान पर रोना और भज्जी का तिरंगे से लिपट जाना.

इस सबके बीच एक ऐसा खिलाड़ी उभरकर सामने आया, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे क्रिकेट के सिवा कुछ और नहीं आता.

जी हां! हम बात करते हैं मुनाफ पटेल की, जो अपनी रफ्तार की वज से भी मशहूर रहे हैं. भले ही वह मौजूदा क्रिकेट टीम का हिस्सा नहीं हैं, किन्तु उन्होंने जिस तरह से एक आम मजदूर से लेकर टीम इंडिया के स्टार खिलाड़ी तक का सफर तय किया वह युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है!

ऐसे में उनके पूरे सफर पर नज़र डालना दिलचस्प होगा–

‘गरीबी’ बनी सबसे ‘पहली दोस्त’

मूसा पटेल और सईदा पटेल के घर में 12 जुलाई 1983 को एक लड़के ने जन्म लिया. नाम रखा गया मुनाफ पटेल. जन्म लेते ही इस लड़के की पहली दोस्ती गरीबी से हुई.

वह कहावत है न कि ‘पूत के पांव पालने में ही दिखाई पड़ जाते हैं. कुछ ऐसा ही मुनाफ पटेल के साथ हुआ. बचपन से निकलकर वह 7वीं क्लास तक पहुंचते-पहुंचते अपने नाम के अलावा अपनी रफ्तार के लिए मशहूर होने लगे थे.

बावजूद इसके जानकर हैरानी होती है कि वह क्रिकेट नहीं खेलना चाहते थे. असल में वह गरीबी उनके सामने सीना तानकर खड़ी थी. वह किसी भी कीमत पर इससे निजात पाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक टाइल फैक्टरी में काम करना शुरू कर दिया, जहां उन्हें 8 घंटे काम करने पर प्रतिदिन के हिसाब से 35 रुपए मिलते थे.

इस दौर का जिक्र करते हुए मुनाफ खुद बताते हैं कि उनके लिए यह कठिन दौर था, लेकिन उन्हें दुख झेलने की आदत हो गयी थी.

इस सबके बीच एक दिन उनके स्कूल टीचर को इसकी जानकारी हुई, तो उन्होंने मुनाफ को समझाते हुए कहा कि ‘तुम्हारी अभी उम्र ही क्या हुई है? जब तुम अपना स्कूल पूरा कर लोगे तब तुम काम कर सकते हो. अभी सिर्फ खेल पर ध्यान दो’

MM Patel (Pic: theindianexpress)

गांव के ‘करीबी’ से मिला बल

बहरहाल, गरीबी के चलते वह मजदूरी करते रहे. कुछ सालों के बाद मुनाफ की मुलाकात उनके गांव के ही युसुफ भाई से हुई, जोकि विदेश में रहते थे और इंडिया छुट्टी बिताने के लिए आए थे. मुनाफ की मेहनत से प्रभावित होकर उन्होंने उन्हें बड़ौदा आकर रहने के लिए कहा और अआथ ही उन्हें क्रिकेट क्लब ज्वाइन करने को भी कहा.

इस तरह उनकी मदद से मुनाफ बड़ौदा क्लब का हिस्सा बन गए, जहां वह एक हाफ मैट पर गेंदबाज़ी करते थे. क्रिकेट कोचिंग में मुनाफ की प्रतिभा को कई लोगों ने सराहा और उन्हें लगातार मौके मिलने लगे.

इसी कड़ी में एक दिन किरन मोरे की उन पर नज़र पड़ी. उन्हें मुनाफ की गेंदबाजी में धार दिखी, तो उन्होंने मुनाफ की मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया.

आपको जानकर हैरानी होगी… यह उस दौर की बात है, जब मुनाफ के पास जूते तक नहीं हुआ करते थे. ऐसे में मोरे ने ही उन्हें जूते लाकर दिए थे. साथ ही बड़ौदा क्रिकेट अकादमी में उनको प्रशिक्षित किया. आगे वह एमआरएफ स्कूल चेन्नई गए, जहां उन्होंने दुनिया के कायदों को सीखा.

हुनर को सभी ने सराहा, लेकिन…

जूते मिलते ही जैसे उनकी गेंदबाजी को एक नई रफ्तार मिल गई. ऐसी रफ्तार कि ‘डेनिस लिली’ ने उन्हें भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ तक बता दिया. यही नहीं उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर ‘स्टीव वॉ’ जैसे बड़े खिलाड़ी ने उन्हें भारतीट क्रिकेट टीम का हिस्सा बनाए जाने की वकालत कर डाली थी.

नतीजा यह रहा कि 2005 में मुनाफ भारतीय टीम का हिस्सा बनाए गए.

इंग्लैण्ड के खिलाफ उन्होंने मोहाली टेस्ट से अपना डेब्यू किया और अपने पहले ही मैच में 97 रन देकर सात विकेट लिए. उनके इस प्रदर्शन ने उन्हें एक पल में लोगों के दिलों का स्टार बना दिया.

उस समय मुनाफ 145 से अधिक की रफ्तार से गेंद डालते थे. इस कारण उन्हें ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाजों का जवाब माना गया. हालांकि, एक साल के भीतर ही उन्हें चोटों के चलते अपनी रफ्तार कम करनी पड़ी.

Munaf Patel with Trophy (Pic: thesportsrush)

2011 विश्वकप के ‘गुमनाम हीरो’

बावजूद इसके मुनाफ 2007 के वर्ल्ड कप का हिस्सा रहे. पर चूंकि, इस वर्ल्ड कप में भारत पहले ही दौरे से बाहर हो गया था, इसलिए वह लाइम लाइट में नहीं आ सके.

बाद में उनकी फिटनेस खराब हुई तो वह टीम से ड्रॉप कर दिए गए. यहां तक कि 2011 के वर्ल्ड कप में उनके हिस्सा लेने पर सवाल उठ रहे थे. बहरहाल, किस्मत ने इस बार मुनाफ का साथ दिया और उन्हें टीम में शामिल किया गया.

असल में पहले प्रवीण कुमार को चयनित किया जाना था, किन्तु वह आखिरी मौके पर चोटिल हो गए. ऐसे में चयनकर्ताओं ने उनकी जगह मुनाफ पटेल को टीम में जगह दी, जहां पर उनका प्रदर्शन शानदार रहा. इस टूर्नामेंट में वह भारतीय टीम की ओर से सर्वाधिक विकेट लेने वाले तीसरे गेंदबाज थे.

एक रेगुलर गेंदबाज के तौर पर टीम इंडिया के दूसरे बालर्स को बेहतर रास्ता मुनाफ पटेल ने ही प्रदान किया. जाहिर तौर पर जब मुनाफ के ओवर खाली जाते थे तो युवराज सिंह जैसे पार्ट टाइम बालर्स को हिट करने के चक्कर में विपक्षी बल्लेबाजों से गलती हो ही जाती थी.
ऐसे में कहा जा सकता है कि मुनाफ ने 2011 वर्ल्ड कप में साइलेंट रहकर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई.

हालांकि, आगे वह फिर से चोटिल हुए और इस तरह टीम से बाहर हुए कि फिर वापसी नहीं कर पाए. साल 2013 में उन्हें आईपीएल में मुंबई इंडियंस की ओर से खेलते देखा गया था, लेकिन बाद के सालों में मुनाफ की बोली नहीं लगी और वह धीरे-धीरे गायब होते चले गए.

…कुछ ऐसे हैं मुनाफ के आंकड़े!

आकड़ों की बात करें तो मुनाफ पटेल ने अपने करियर में 13 टेस्ट मैच खेले, जिनमें उन्होंने 3.05 की इकॉनमी से कुल 35 विकेट लिए.

वहीं एकदिवसीय की बात करें तो उन्होंने 70 मैच खेलते हुए, 4.95 की इकॉनमी से 86 विकेट चटकाए. इसी कड़ी में आईपीएल में उनके प्रदर्शन की बात करें तो उन्होंने 63 मैच खेले, जिनमें 7.52 की इकॉनमी से उनके नाम 74 विकेट दर्ज हैं.

अंतर्राष्ट्रीय टी-20 में मुनाफ को केवल 3 मैच खेलने का मौका मिला, इनमें उन्होंने 8.6 की इकॉनमी से 4 विकेट अपने नाम किए.

MM Patel in His Village (Pic: theindianexpress)

मौजूदा समय में मुनाफ अपने परिवार के साथ गुजरात स्थित इखार गांव में नज़र आते हैं. वहां उन्होंने अपना स्थाई घर बना रखा है. इस तरह भले ही विश्व क्रिकेट उन्हें करीब-करीब भुला चुका हो, लेकिन वह आज भी अपने गांव के हीरो हैं.

आप क्या कहेंगे 2011 वर्ल्ड कप विजेता टीम के इस ‘गुमनाम’ हीरो के बारे में?

Web Title: Struggle Story of Munaf Patel, Hindi Article

Featured Image Credit: ESPNcricinfo