स्मार्टफोन आजकल हमारी जरूरतों में शुमार है. इसके बिना दिन निकालना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा हो गया है. लिहाजा ये हर हाथ, हर अंगुली को इंगेज किए हुए है. कह सकते हैं कि स्मार्टफोन रोजमर्रा की जान है और स्मार्टफोन की जान हैं एप्लीकेशन्स!

साल 1983 की घटना है, जब एप्पल के सहायक संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टीव जॉब्स ने सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी के भविष्य के बारे में घोषणा करते हुए कहा था कि आने वाले दिनों में सॉफ्टवेयर ऑनलाइन स्टोर पर डाउनलोड हेतु उपलब्ध होगा और ये मोबाइल के माध्यम से संभव हो सकेगा. आज उसे ही ‘ऐप स्टोर’ के नाम से जाना जाता है.

आजकल इन स्टोरों के माध्यम से सुबह के अलार्म से लेकर रेल-कार-हवाई जहाज टिकट, होटल- रेस्तरां बुकिंग, जीवनोपयोगी जानकारियां, समाचार, मनोरंजन, स्वास्थ्य आदि से सम्बंधित ऐप डाउनलोड कर उपयोग किया जाता है. ये जीवन को बेहतर और बेहतर बनाने में मददगार साबित हो रहा है.

यह तकनीक दिनानुदिन विकसित हो रही है. आए दिन ऐसे-ऐसे ऐप्स बनाए जा रहे हैं, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. ये जानना काफी दिलचस्प है कि आखिर एप्लीकेशन्स आए कहां से? आइये एप्लीकेशन के प्रादुर्भाव व विकास पर प्रकाश डालते हैं.

यहां से हुई शुरुआत

1983 में मोटोरोला ने ‘डायनाटेक 8000 एक्स’ के रूप में पहला मोबाइल फोन निकला और फोन की दुनिया में क्रांति आ गई. देखते ही देखते कंपनियों ने फोन पर अपने अनुसंधान को बढ़ाया. हालांकि इसे लाने में अच्छा-खासा समय लगा था लेकिन बाद के दिनों में विकास को जैसे पर लग गए. नित नूतन खोज हुए और ये लोकप्रिय होता गया.

पहला स्मार्टफोन

मोबाइल प्रयोग करते हुए स्मार्ट मोबाइल की जरूरत महसूस होने लगी. दुनिया को मुट्ठी में भर लेने की मानवीय चाहत ने इसे वाकई स्मार्ट बना डाला. 23 नवंबर 1992 को इंटरनेशनल बिजनेस मशीन कॉरपोरेशन (आईबीएम) ने विश्व का प्रथम स्मार्टफोन (http://www.mobileindustryreview.com/2016/10/the-history-of-the-smartphone.html) लाकर सबको हैरत में डाल दिया. हालांकि ये तब तक जरूरत बन चुकी थी. पहले इसका नाम ‘एंगलर’ रखा गया था.

साल 1994 में आईबीएम ने ही पहला कॉमर्शियल फोन ‘साइमन पर्सनल कम्प्यूनिकेटर’ निकला. इससे कॉल के अतिरिक्त कैलकुलेटर, नोटपैड , टचस्क्रीन का इस्तेमाल हो सकता था. महंगे होने के बावजूद कंपनी ने 50 हजार यूनिट बेचने में सफलता हासिल की.

ये स्मरण रखने योग्य बात है कि मोबाइल मोटोरोला लेकर आया तो आईबीएम ने स्मार्टफोन की शुरुआत की थी.

Psion EPOC: सिम्बियन ओएस की उत्पत्ति

Psion के द्वारा इस ऑपरेटिंग सिस्टम को विकसित किया गया, जो कि 90 के दशक की शुरुआत में एक व्यक्तिगत डिजिटल सहयोगी (पीडीए) डिवाइस के रूप में जाना जाता था. इसे एक 16 बिट मशीन के रूप में निकला गया था जिसमें वर्ड प्रोसेसर, डाटाबेस, स्प्रैडशीट और डायरी जैसी कई उपयोगी ऐप्स थीं. बाद में इसमें जरूरी सुधार कर बैटरी और स्टोरेज क्षमता को बढ़ाया गया. इसमें अलग-अलग ऐप को डाउनलोड करने की सुविधा दी गई.

ईपीओसी ऑपरेटिंग सिस्टम मूल रूप से ओपन प्रोग्रामिंग भाषा (ओपीएल) के साथ प्रोग्राम किया गया था, जो उपयोगकर्ताओं को खुद ऐप बनाने की अनुमति देता है.

वायरलेस एप्लिकेशन प्रोटोकॉल

साल 1996 में  पीओआईएन ईपीओसी से अलग ‘पाम पायलट’ बाजार में उपस्थित हुआ जो कि पाम ऑपरेटिंग सिस्टम से बना हुआ था. यह सस्ता होने के साथ-साथ अधिक आधुनिक और क्षमतावान था. टचस्क्रीन ग्राफ़िकल यूजर इंटरफेस (जीयूआई) से युक्त पीडीए सामान्य सुविधा ऐप के अलावा सी/सी++ भाषा के साथ प्रोग्राम किए गए थर्ड पार्टी एप्लिकेशन को भी जोड़ सकता था.

जावा माइक्रो संस्करण

जावा माइक्रो संस्करण के विकास ने जैसे ऐप को नया जीवन दे दिया. इससे अनेक तरह के डिवाइसों से जुड़े ऐप बनाना बेहद आसान हो गया. मोबाइल-फोन, पीडीए, सेट टॉप बॉक्स जैसी एप्लिकेशन आधारित डिवाइसों में जैसे जान ही आ गई. वर्तमान में जावा के मानक संस्करण से इंटरनेट एप्लिकेशन, माइक्रो नियंत्रक और एंड्रॉइड अनुप्रयोग बनाया जाता है, इसे जावा माइक्रो संस्करण के रूप में जाना जाता है.

सिम्बियन व अन्य ऑपरेटिंग सिस्टम

साल 2009 तक दुनिया भर में लगभग 250 मिलियन डिवाइस में सिम्बियन ऑपरेटिंग सिस्टम (https://tech.co/mobile-app-history-evolution-2015-11) का इस्तेमाल होता था. दरअसल, शीर्ष चार मोबाइल फोन कंपनियां पीजन, एरिक्सन, मोटोरोला और नोकिया इसका ही उपयोग करती थी. इतना ही नहीं, जापान के प्रभावशाली ब्रांड मित्सुबिशी, शार्प और फुजीत्सू जैसी कंपनियां भी इस ऑपरेटिंग सिस्टम के नियमित ग्राहक थे. आलम यह था कि उन दिनों कुल स्मार्टफोन का एक तिहाई संख्या इसी ओएस पर निर्भर थे.

नोकिया ने इसका उल्लेखनीय उपयोग किया और बाजार पर कब्जा जमाए रखा. हालांकि बाद के दिनों में इस ओएस पर निर्भरता ने ही उसे बाजार से बाहर का रास्ता दिखा दिया. कारण, ओएस की अपनी सीमाएं थीं और डेवलपर इससे तंग आ चुके थे. लिहाजा नए आविष्कार की जरूरत महसूस की जाने लगी.

यही कारण है कि आगे चलकर एंड्रॉइड और आईफ़ोन (https://www.thoughtco.com/history-of-smartphones-4096585) ऑपरेटिंग सिस्टम शीर्ष पर रहे. इन दो ऑपरेटिंग सिस्टम का केंद्रीय अवसंरचना थर्ड पार्टी ऐप के विकास के लिए अनुकूल है.

और अभी जो स्थिति है…

आज ऐप की उपयोगिता इतनी है कि लोग सोशल नेटवर्क, यात्रा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, समाचार सहित हजारों अलग-अलग काम के लिए हम इस पर निर्भर हैं. जानकर हैरानी हो सकती है कि केवल ऐप स्टोर में हर महीने 20 हजार से ज्यादा नए ऐप जोड़े जाते हैं. 2015 में एप्पल और एंड्रॉइड ऐप स्टोर से लगभग 45 बिलियन बार विभिन्न ऐप डाउनलोड किए गए. ये दिनानुदिन विकास की ओर अग्रसर है और इसके स्वर्णिम भविष्य का इंतज़ार अब भी बाकी है.

इसका भविष्य कैसा है!

जिस तरह से स्मार्टफोन और ऐप का विकास हो रहा है, वह दिन दूर नहीं जब ये मैजिकल डिवाइस बन जाएगा. कंपनियों द्वारा बाजार पर कब्जा जमाने की होड़ में लोगों को नित नूतन तकनीक और भी आकर्षक और सस्ते उपलब्ध हो रहे हैं. इतना ही नहीं, सरकारी संस्थाएं भी इसको भरपूर बढ़ावा दे रही हैं. लिहाजा भारत में स्मार्टफोन और ऐप का बाजार और भी गर्म होने के आसार हैं.

चूंकि यूजर के हिसाब से भारत एक बेहद धनी देश है और विश्वभर की तकनीकी कंपनियां यहां ग्राहकों को रिझाने में लगी हैं. फलतः नए आविष्कार और सुविधाओं को बल मिल रहा है.

एप्पल और एंड्रॉइड ऐप स्टोर बाजार पर पकड़ बनाए हुए है, तो कई और कंपनियों ने कमर कसने की तैयारी कर ली है. उपभोक्ता जागरुकता तथा बाजार प्रतियोगिता इस क्षेत्र को आनेवाले समय में भी पल्लवित करता रहेगा.

ये कहने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि ऐप ने लोगों के हाथ में दुनिया को लाकर रख दिया है.

क्यों, सही कहा न!

Web Title: Mobile Application, Hindi Article

Feature Image Credit: