न केवल भारत में, बल्कि समूचे विश्व में ‘इसरो’ का गुणगान हो रहा है. 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करके इस महान संस्था ने प्रमाणित कर दिया है कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता! आपको याद होगा वो दौर जब अमेरिका ने हमारे रॉकेट रोहिणी-75 के प्रक्षेपण को खिलौना करार देकर हमारा मजाक उड़ाया था. अमेरिका जैसे देश ने कभी कहा था कि “भारत कभी रॉकेट नहीं बना सकता”. इतना ही नहीं…

अमेरिका ने भारतीय जमीन से अपने किसी भी उपग्रह का प्रक्षेपण कराने तक से इंकार कर दिया था. मगर समय बलवान होता है. अमेरिका को अपने पुराने रुख से पलटना पड़ा और आज स्थिति यह है कि अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देश इसरो से अपने उपग्रह प्रक्षेपित कराने के लिए लालायित हैं.

निश्चित रूप से इसरो ने अपनी बेजोड़ क्षमता का जैसा प्रदर्शन किया है, वह हर भारतीय को गर्व से भर देने वाली उपलब्धि है. आइये चर्चा करते हैं, ऐसी कई और उपलब्धियों की जब इसरो ने देश का मान बढ़ाया.

104 सैटेलाईट भेजकर रचा इतिहास

इसरो ने पीएसएलवी-सी37 से एक साथ 104  सैटेलाइट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करके एक ऐसा इतिहास रच दिया, जिसकी चर्चा सिर्फ़ देश में नहीं अपितु पूरे विश्व में है. बताते चलें कि इसरो ने जिन देशों के एक सौ चार उपग्रह एक साथ अंतरिक्ष में भेजे उनमें अमेरिका, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड के सैटेलाईट भी हैं. यही वजह है कि आज हम अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के समाने सीना तानकर खड़े हो सके हैं.

यहां अमेरिका और रूस का जिक्र करना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि ये दोनों ही देश विज्ञान के मामले में दुनिया की दिशा तय करते रहे हैं. लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान में इसरो की सफलता ने यह साबित कर दिया है, कि दुनिया की ये महाशक्तियां भी इस क्षेत्र में कार्यकुशलता और लागत के मामले में भारत से पीछे हो रही हैं और मदद भी ले रही हैं.

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस अभियान के आधे खर्च की भरपाई विदेशी ग्राहकों के भुगतान से की गई. यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि इस मिशन से इसरो को करीब 100 करोड़ रुपये की कमाई हुई है.

Inspirational Story of ISRO (Pic: scoopwhoop)

‘देशी प्रौद्योगिकी’ का विकास

इसरो की सफलता को कई माइनों में महत्वपूर्ण माना जाना जा रहा है. आज के दौर में जब दूरसंचार प्रौद्योगिकी के विकास के लिए सारी दुनिया की आंखें इस प्रौद्योगिकी की ओर टिकी हुईं हैं. तब हमारे इसरो ने अपने काम से दुनिया को बेहतर और सस्ती सेवा देने का भरोसा दिया है. दशकों से जो काम वैश्विक महाशक्तियां करती आई हैं, आज वही काम हमारा देश कर रहा है, वह भी देशी प्रौद्योगिकी का विकास करके.

आपको जानकार हैरानी होगी कि नासा ने जो रॉकेट 67 करोड़ डॉलर में भेजा था उसे इसरो ने सिर्फ 7.3 करोड़ डॉलर में प्रक्षेपित कर दिया (तकरीबन 66 गुना सस्ता). इसरो ने यह उपलब्धि रूस, अमेरिका, फ्रांस, चीन और दुनिया के अन्य विकसित देशों के मुकाबले सस्ती और अच्छी सेवा देकर अगर हासिल की है. यह राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात है और इस पर हर एक भारतीय को फख्र होना चाहिए.

सस्ता और भरोसेमंद होने के कारण भारत सैटेलाइट लॉन्चिंग के बाजार में तेजी से लीडर की तरह उभर रहा है. हालांकि चीन भी सस्ती सैटेलाइट लॉन्च करता है, लेकिन सस्ता श्रम और कम लागत के कारण इसरो से उसे कड़ी टक्कर मिल रही है. ऊपर से भारत को वैश्विक बाज़ार में चीन से कहीं ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है.

केंद्र सरकार द्वारा ‘फ्री हैण्ड’

इसरो की विश्व पटल पर धमाकेदार बढ़त में केंद्र सरकार द्वारा दिए गए ‘फ्रीहैण्ड’ का जबरदस्त योगदान रहा है. बजट से लेकर तमाम निर्णय में इसरो को पूरी आज़ादी रही है, हमेशा से! इस बार बजट में इसरो के लिए 23 प्रतिशत राशि ज्यादा आवंटित की गयी थी.

1969 में जब इसरो ने अपना पहला सैटेलाइट आर्यभट्ट बनाया था, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही इसरो आगे चलकर दुनिया भर में भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर देगा. पिछले कुछ सालों पर नजर डाले तो हम पाएंगे कि भारत सैटेलाइट लॉन्चिंग के बाजार में भरोसेमंद देश बनकर सामने उभरा है. गूगल और एयरबस जैसी बड़ी कंपनियों का इसरो पर भरोसा करना इस बात को प्रमाणित करता है. भारत सरकार इसरो के विकास कार्यक्रम में पूरी तरह से आस्थावान रही है, जिसका परिणाम हमारे सामने है.

Inspirational Story of ISRO, Information in Hindi (Pic: ISRO)

विदेशी ‘मीडिया’ में बजा ‘इसरो’ का डंका

  • वॉशिंगटन पोस्ट ने हालिया सफ़लत पर लिखा है कि यह प्रक्षेपण ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लिए यह एक बड़ी सफलता है. कम खर्च में सफल मिशन को लेकर ‘इसरो’ की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ रही है.’
  • द न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि एक दिन में उपग्रहों के प्रक्षेपण के पिछले रिकॉर्ड के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा है. इसने अंतरिक्ष आधारित सर्विलांस और संचार के बढ़ते व्यावसायिक बाजार में भारत को ‘महत्वपूर्ण पक्ष’ के रूप में स्थापित कर दिया है.
  • सीएनएन का कहना है, ‘अमेरिका और रूस की प्रतिद्वंद्विता को भूल जाएं. अंतरिक्ष के क्षेत्र में वास्तविक दौड़ तो एशिया में हो रही है.
  • लंदन के टाइम्स अखबार का कहना है कि आज के कारनामे के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रभावशाली देशों के समूह में शामिल होने के लक्ष्य को स्पष्ट कर दिया है.
  • ब्रिटेन के ही गार्जियन अखबार का कहना है कि नया रिकॉर्ड बनाने वाला यह प्रक्षेपण तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष बाजार में एक गंभीर पक्ष के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत बनाएगा.
  • बीबीसी का कहना है कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में आज की सफलता ‘इसका प्रतीक है कि भारत अरबों डॉलर के इस अंतरिक्ष बाजार में बड़ा खिलाड़ी बनकर उभर रहा है.
  • शिन्हुआ के अनुसार, एक अंतरिक्ष मिशन में 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने वर्ष 2014 में रूस द्वारा एक साथ 37 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किए जाने का रिकॉर्ड तोड़ा है.

जहां एक तरफ देश और दुनिया का मीडिया इसरो के तारीफों के पुल बांध रहा है, वहीं चीन कुछ चिढा-चिढ़ा नज़र आ रहा है, जिसकी झलक चीनी अखबार में देखने को मिली है. उसने अपने लेख में लिखा है कि 104 सैटेलाइट लांच करना भारत के लिए उपलब्धि तो है लेकिन भारत अभी भी स्पेस के क्षेत्र में अमेरिका और चीन से बहुत पीछे है. जाहिर है, पड़ोसी को आग लगनी स्वाभाविक ही है.

सुनहरे अतीत की झलकियां

हर एक सफलता आपको पहले से बड़े लक्ष्य हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी देती है. इसरो के साथ भी यही हुआ है. इस संगठन की परियोजनाएं भी बीते कुछ दशक में लगातार बड़ी और महत्वाकांक्षी होती जा रही हैं. इसरो साल-दर-साल अपने कीर्तिमानों से देश का मस्तक ऊंचा करता रहा

  • पीएसएलवी: इसरो ने 1990 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) को विकसित किया था. 1993 में इस यान से पहला उपग्रह ऑर्बिट में भेजा गया, जो भारत के लिए गर्व की बात थी. इससे पहले यह सुविधा केवल रूस के पास थी.
  • चंद्रयान: 2008 में इसरो ने चंद्रयान बनाकर इतिहास रचा था. 22 अक्टूबर 2008 को स्वदेश निर्मित इस मानव रहित अंतरिक्ष यान को चांद पर भेजा गया था. इससे पहले ऐसा सिर्फ़ छह देश ही कर पाए थे.
  • मंगलयान: 2014 में भारतीय मंगलयान ने इसरो को दुनिया के नक्शे पर चमका दिया. मंगल तक पहुंचने में पहले प्रयास में सफल रहने वाला भारत दुनिया का पहला देश बना. यहाँ तक कि अमेरिका, रूस और यूरोपीय स्पेस एजेंसियों को कई प्रयासों के बाद मंगल ग्रह पहुंचने में सफलता मिली थी. चंद्रयान की सफलता के बाद यह वह कामयाबी थी जिसके बाद भारत और इसरो की चर्चा अंतराष्ट्रीय स्तर पर होने लगी.
  • जीएसएलवी मार्क 2: जीएसएलवी मार्क 2 का सफल प्रक्षेपण भी भारत के लिए बड़ी कामयाबी थी, क्योंकि इसमें भारत ने अपने ही देश में बनाया हुआ क्रायोजेनिक इंजन लगाया था. इसके बाद भारत को सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा.
  • नेविगेशन सिस्टम: नेविगेशन सिस्टम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन उपग्रह (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लॉन्च किया. इसके साथ ही भारत को अमेरिका के जीपीएस सिस्टम के समान अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम मिल गया. इससे पहले अमेरिका और रूस ने ही ये उपलब्धि हासिल की थी.
  • ध्रुवीय रॉकेट: ध्रुवीय रॉकेट के रूप में इसरो की कामयाबी भी इतिहास का हिस्सा है. जिसमें उसने एक्स-एल यानी एक्सट्रा लार्ज संस्करण का इस्तेमाल किया. ध्रुवीय रॉकेट चार चरणीय रॉकेट है. जिसके पहले और तीसरे चरण में ठोस और दूसरे और चौथे चरण में प्रपेलेंट यानी द्रव ईंधन का उपयोग होता है.

Inspirational Story of ISRO, Science Development (Pic: ibgnews )

1969 में इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना की गई, जिसमें जाने-माने वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा. वे अंतरिक्ष तकनीक को सीधे विकास परियोजनाओं से जोड़ने की मंशा रखते थे.

इसरो की इस कामयाबी ने भले ही इतिहास रच दिया हो, लोकिन इसके बावजूद हमें कई मायनों में गंभीरता से विचार करने की भी जरूरत है. सवाल यह है कि सफलता की जैसी गाथा इसरो लिख रहा है, वैसी ही अन्य संस्थान क्यों नहीं लिख पा रहे हैं? अन्य संस्थाएं उससे सीख क्यों नहीं लेतीं?

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हमारे ज्यादातर शोध संस्थान उतने सक्षम नहीं हैं जितने होने चाहिए. फिर भी हमें इसरो की कामयाबी से सीखना ही चाहिए और इसी तरह नए आयाम गढ़ने की ओर बढ़ना चाहिए, ताकि देश का सिर गर्व से हमेशा ऊंचा रह सके, न केवल अन्तरिक्ष में वरन देश सेवा के प्रत्येक क्षेत्र में.

Web Title: Inspirational Story of ISRO, Information in Hindi

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