1963 में भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए.पी.जे. अब्दुल कलाम नासा के लैंगली रिसर्च सेंटर में निरीक्षण के लिए गए थे. वहां प्रवेश कक्ष में लगे पेन्टिंग को देख उनके कदम अचानक रुक गए. तस्वीर युद्धभूमि की थी, जिसमें ऐसा प्रतीत हो रहा था कि पीछे से कोई रॉकेट मिसाइल आ रही हो और दूसरी तरफ फ़ौज की टुकड़ी रॉकेट हमले से बिखर गयी हो.

नासा के केंद्र में रॉकेट की पेंटिंग कोई खास बात नहीं है. पर आखिर ऐसा क्या था, जिसने कलाम के कदमों को आगे बढ़ने से रोक दिया. अब्दुल कलाम बड़े आश्चर्य से पेंटिंग को देख रहे थे. आश्चर्य की बात यह थी कि मिसाइल चलाने वाला कोई यूरोपीय या गोरा आदमी नहीं बल्कि, उनकी तरह ही दिखने वाला इंसान था. कलाम अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पाए और सीधे पेंटिंग के करीब जा पहुंचे. ये तस्वीर अंग्रेजी हुकूमत और मैसूर के वीर टीपू सुल्तान की सेना के बीच हुये युद्ध की थी. पेंटिंग में मैसूर की मिसाइल हमले से हताहत हुई अंग्रेजी सेना के चित्रों को बखूबी दर्शाया गया था. अब्दुल कलाम को इस पेंटिंग को देखकर काफी गर्व हुआ था.

British army abducted by Mysore army; Photo source: Daily Star

दुर्भाग्य से रॉकेट मिसाइल की दुनिया में वीर टीपू सुल्तान के उल्लेखनीय योगदान को उनके ही देश भारत ने भुला दिया. वहीं बाकि दुनिया ने रॉकेट में उनके योगदान को काफी सराहा है. यहां तक कि, टीपू सुल्तान को रॉकेट मिसाइल का मॉडर्न आर्किटेक्ट भी माना जाता है. तब के समय में रॉकेट मिसाइल दुनिया का सबसे ज्यादा विकसित और खतरनाक हथियार माना जाता था. खास बात तो यह थी कि यह हथियार कहीं और नहीं अपने मैसूर, भारत में था.

यह माना जाता है कि चीनी लोगों ने रॉकेट लॉन्चिंग की खोज सबसे पहले की थी. उन्होंने बारूद की खोज भी की थी, जिसे वो ‘गोथा ऑफ़ लाइफ’ भी कहते हैं. बाद में उन्होंने इसका उपयोग खुशी के मौकों पर शुरु कर दिया. वो बांस के अन्दर बारूद भरकर विस्फोट करते थे और जश्न का आनंद उठाते थे.

ऐसा माना जाता है कि संयोग से लोगों ने उत्सव के जरिये रॉकेट की खोज की. एक बार बारूद से भरी फिलिंग ट्यूब बिना विस्फोट हुए हीं बाहर आ गयी. इसके कारण आसमान में धुआं सा छा गया और जिसके पश्चात एक चमकती हुई चिंगारी निकली. यही से चीनी वैज्ञानिकों ने परीक्षण करना प्रारंभ कर दिया और फिर बारूद से बनी रॉकेट का आविष्कार किया.

13वीं शताब्दी में चीन ने रॉकेट का इस्तेमाल सबसे पहले मोंगल्स के साथ हुए युद्ध के दौरान किया था. हालांकि रॉकेट से बहुत ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था. बावजूद इसके रॉकेट की तकनीक ने मोंगल्स को काफी अचम्भित कर दिया था. इसके बाद मंगोलिया ने अपनी खुद की रॉकेट मिसाइल बनाई और फिर पूरे यूरोप में प्रचारित कर दिया.

इस बात का कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है कि मैसूर में रॉकेट कैसे और कहां से आया, लेकिन हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान की मदद से भारत को रॉकेट टेक्नोलॉजी में नया पैमाना मिला. 1780 में हुए बैटल ऑफ़ पल्लिलुर में रॉकेट का काफी ज्यादा इस्तेमाल हुआ था, जिसकी वजह से अंग्रजी फ़ौज को मुंह की खानी पड़ी थी. इस युद्ध में हैदर अली की पराक्रमी सेना की जीत हुई थी.

Tipu Sultan; Pictures: christies.net

टीपू सुल्तान के राज में, मैसूर का सामना सबसे ताकतवर ईस्ट इंडिया कंपनी से हुआ. सुल्तान को ये आभास हो गया था कि बिना किसी नये हथियार और तकनीक के अंग्रेजों को हराना बहुत ही कठिन होगा. सुल्तान ने अपने रॉकेट मिसाइल पर शोध करना शुरु कर दिया. लोहे से बने बॉक्स का इस्तेमाल ईंधन बॉक्स के रूप में किया जाने लगा. जबकि इससे पहले बांस और बाकी कमजोर वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था.

माना जाता है कि टीपू सुल्तान ने रॉकेट में नुकीला हथियार जैसे तलवार, चाकू का इस्तेमाल करने का विचार भी दिया था. इससे रॉकेट हवा में काफी दूर तक उड़कर दुश्मनों पर नुकीले हथियार से वार कर सकता था. ईंधन बॉक्स का आकार तकरीबन 8 इंच लम्बा और 3 इंच चौड़ा रहता था. इस काम के लिए सैनिकों को बखूबी ट्रेनिंग दी जाती थी. अंग्रेजों से दो दो हाथ करने के लिए सुल्तान ने ख़ास मिसाइल लांचर बनाई जिससे एक बार में 5 रॉकेट एक साथ दुश्मनों पर दागे जा सकते थे.

Mystic rocket in artwork Pictures: cloudfront.net

ब्रिटिश-मैसूर युद्ध में, सुल्तान की रॉकेट सेना अंग्रेजों के लिए सबसे ज्यादा डर का विषय बन गयी थी. आसमान में नीला धुआं होते ही अंग्रेज़ ये समझ जाते थे कि रॉकेट से हमला किया गया है. अब तक का सबसे महत्वपूर्ण रॉकेट हमला तीसरी एंग्लो-मैसूर युद्ध में कर्नल नोक्स पर हुआ था. 6 फरवरी 1792 को कर्नल नोक्स अपनी टीम के साथ उत्तर की दिशा में कावेरी की तरफ आगे बढ़ रहे थे. तभी सेरिन्गापतम में उनपर रॉकेट मिसाइल से हमला किया गया था. तब सुल्तान के पास बस दो समूह ही थे. एक में 120 और दूसरे में 131 सैनिक थे, लेकिन युद्ध के समय लगभग 5000 रॉकेट सैनिक तैयार हो गए थे.

इस युद्ध के बाद, टीपू सुल्तान ने अपनी युद्ध कौशलता का एक अद्भुत उदाहरण पेश करते हुए अपनी दोस्ती फ्रांस के साथ और भी मजबूत कर ली थी, ताकि अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा सके. टीपू सुल्तान के समर्थन में रिपब्लिक ऑफ़ फ्रांस ने मैसूर में जकोबियन क्लब स्थापित किया. इस गठजोड़ को और भी ख़ास और यादगार बनाने के लिए सुल्तान ने करीब 500 रॉकेट मिसाइल से सलामी दी थी.

Mysore-France friendship Photo: readoo.in

चौथे एंग्लो-मैसूर युद्ध में रॉकेट मिसाइल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ और अंग्रेजी शासकों का सबसे ज्यादा नुकसान भी. 5 अप्रैल 1799 को रात के अंधेरे में छुप छुपकर कर्नल वेजली अपनी सेना के साथ तिला की तरफ बढ़ रहे थे. तभी अचानक रात की गुमनामी खौफनाक मंजर में बदल जाती है. असल में चारों दिशाओं से सुल्तान की रॉकेट सेना मिसाइलों ने हमला कर दिया था. अंग्रेजी सेना के पास सुल्तान के रॉकेट हमले का कोई तोड़ नहीं था, इस कारण उनकी सेना इधर उधर बिखर गयी. बहुत सारे सैनिक मार दिए गए और फिर कर्नल वेजली को मजबूरन पीछे हटना पड़ा. इस घटना का वेजली पर बहुत ज्यादा असर हुआ और वह अपने जीवन में कई बार सेरिन्गापतन की घटना को याद करते थे.

एंग्लो-मैसूर युद्ध में बहुत से हीरो रहे, लेकिन दुर्भाग्यवश पड़ोसी देशों से असहयोग मिलने के कारण अंततः सुल्तान जंग हार गए. 1799 की टूरिंग खानाली युद्ध में टीपू सुल्तान ने वीर गति को प्राप्त किया. सुल्तान अपनी आखिरी सांस तक बहादुरी से लड़ते रहे, बिल्कुल किसी हीरो की तरह. आत्मसमर्पण करने के बजाय सुल्तान ने युद्धभूमि पर शहीद होना बेहतर समझा. सुल्तान बस युद्ध में ही माहिर नहीं थे, बल्कि उनकी बहुत सी पंक्तियां लोग आज भी याद करते हैं.

‘100 दिन गीदड़ की ज़िन्दगी जीने से बेहतर है 1 दिन शेर की तरह जीना’

Photo source: Quotefancy

मैसूर की हार के बाद तकरीबन 700 रॉकेट्स और 900 रॉकेट्स के आतंरिक भाग अंग्रेजी सेना अपने साथ ले गयी. विलियम कांग्रो अपने साथ रॉकेट्स को इंग्लैंड लेकर गए और वहां जाकर रिवर्स इंजीनियरिंग का काम करना शुरु किया. फिर इसके बाद सारे मॉडर्न रॉकेट्स और आर्टिफीशियल सैटेलाइट इसके बिनाह पर बनने लगे.

अजीब विडम्बना है कि जिस रॉकेट को टीपू सुल्तान ने सबसे पहले बनाया और फिर फ्रांसिसियों ने उसका इस्तेमाल किया. यहां तक कि यूरोप ने अपनी खुद की मिसाइल टेक्नोलॉजी बना ली. बावजूद इसके आज से 150 साल पहले तक हमारे यानी भारत के पास रॉकेट मिसाइल जैसा कुछ भी नहीं था. हालांकि, यह संतोषजनक है कि वर्तमान समय में हम इस दिशा में काफी आगे बढ़े हैं.

Original Article Source / Writer: Roar BanglaMonem Ahmed

Translated by: Nitesh Kumar

Web Title: Tipu Sultan and His Unique Rocket Missiles, Hindi Article

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