कहते हैं सदियों पहले जब दुनिया भारत तक पहुँचने के रास्ते के बारे में नहीं जानती थी, तब पश्चिमी दुनिया से कई नाविक भारत की ओर निकले, लेकिन पहुंच केवल एक ही सका.

वह कोई और नहीं ‘वास्का दा गामा’ था!

17 मई 1498 को जब वह अपने चार जहाजों के साथ केरल के कालीकट के तट पर पहुंचा, तो उसे खुद भी नहीं पता था कि वह इतिहास का एक ऐसा अध्याय लिखने जा रहा है, जिसे दुनिया हमेशा याद रखेगी.

चूंकि उसके भारत पहुंचने का किस्सा बहुत आम है, इसलिए वह भारत कैसे पहुंचा यह जानना दिलचस्प रहेगा–

20 की उम्र में बना नौसेना का हिस्सा

‘वास्को दा गामा’ का जन्म 1460 के आसपास पुर्तगाल में हुआ था. उसके बचपन के बारे में बहुत कुछ पता नहीं चलता, लेकिन यह कहा जाता है कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी. उनके पिता ‘एस्टेवा’ पुर्तगाल के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित एक शाही किले के कमांडर थे. इस लिहाज से उसका पालन पोषण अच्छे से हुआ. परिणाम यह रहा कि 1480 के दशक में वह पुर्तगाली नौसेना का हिस्सा बन गया. इसी दौरान उसने ‘नेविगेट’ कला में खुद को माहिर करना शुरु कर दिया.

आगे उसकी मुलाकात उस समय के कुछ नामी नेविगेटरों से हुई, जिनका उसे भरपूर साथ मिला. इन नामचीन नामों में पुर्तगाल के हेनरी प्रमुख रहे. उन्हें उनकी उपलब्धियों के कारण ‘ड्यूक ऑफ वीज़ू’ के नाम से भी जाना जाता था. उनके नाम उत्तर और पश्चिम अफ्रीका में कई सफल यात्राओं को सफल बनाने का कीर्तिमान दर्ज था. उनकी यात्राएं इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण थीं, क्योंकि ये पुर्तगाल को एक औपनिवेशिक शक्ति बनाने में मददगार साबित हुईं.

Great Navigator Vasco Da Gama (Pic: Wikipedia)

अपने हुनर से जीता सभी का दिल और…

‘वास्को दा गामा’ ने लगातार इनका साथ बनाए रखा और जल्द ही एक कामयाब नेविगेटर बनकर उभरा. वह तेजी से सभी का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा. यहीं कारण रहा कि जब 1487 में, बरतोलोमेयू डायस ने भारतीय और अटलांटिक महासागर के जुड़े होने की बात कही और किसी नेविगेटर को इसका पता लगाने की चर्चा हुई तो ‘वास्को दा गामा’ का नाम सबकी जुबा पर था.

चूंकि ‘वास्को दा गामा’ नेविगेशन में बहुत दिलचस्पी रखता था, इसलिए उसके लिए यह बड़ा मौका था. दूसरा उसे पता था कि यदि बरतोलोमेयू डायस की बात सच है, तो वह भारत तक पहुंचने का रास्ता खोज सकता है. इसी सोच के साथ वह अपने मिशन के लिए आगे बढ़ा और जल्द ही उसे पूरा भी किया.

वह जब अफ्रीका के आखिरी बिंदु ‘केप ऑफ़ गुड होप’ के पास पहुंचा, तो उसने महसूस किया ‘बरतोलोमेयू डायस’ का अंदाजा एकदम सही था.

1497 में निकला भारत की यात्रा पर

इसी कड़ी में 8 जुलाई 1497 में वास्को ने पुर्तगाल से चार जहाजों के साथ अपनी यात्रा शुरू की. उसके साथ उसका छोटा भाई पाउलो भी था. अपनी प्रतिभा के चलते वह तेजी से छोटे-मोटे अवरोधों को दूर करते हुए कुछ मुख्य द्वीपों तक पहुंच गया. वह चाहता तो, तुरंत आगे बढ़ सकता था. किन्तु, वह जल्दबाजी न करते हुए पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ना चाहते थे, इसलिए कुछ वक्त उन्होंने वहीं रुकने का मन बनाया.

कहते हैं कि 3 अगस्त तक वह वहीं रहा. इस दौरान उसने पाया कि उसे आगे के रास्ते को सुलभ बनाने कि लिए अपने साथ पैड्राओ ले जाना चाहिए. जोकि, मार्ग को चिह्नित करने के लिए स्तंभ और कई महत्वपूर्ण हिस्सों पर मददगार थे.

कुल मिलाकर वह अपनी योजना के साथ आगे बढ़ रहा था, तभी उसने महसूस किया कि वह गिनिया की खाड़ी के आसपास है. वह जानता था कि यह खाड़ी उसके लिए अवरोध बन सकती है, इसलिए उसने दूसरा रास्ता चुना. हालांकि, इस कारण उसे अटलांटिक महासागर का एक लंबा चक्कर लगाना पड़ा.

किन्तु, उसका यह रिस्क कामयाब रहा और वह ‘केप ऑफ़ गुड होप’ तक पहुंच गया, जोकि भारत की खोज पर उसका पहला प्रमुख गंतव्य था. यहां उसने कुछ दिन रुककर अपनी आगे की रणनीति बनाई. बाद में 8 दिसंबर को अपनी टुकड़ी के साथ वह आगे बढ़ा.

Great Navigator Vasco Da Gama Journey (Pic: Wikimedia)

अंत तक नहीं हुआ ‘अतिउत्साह का शिकार’

क्रिसमस आते-आते उसके जहाज जवाब देने लगे थे , साथ ही उसके साथ आए लोग भी थकान महसूस करने लगे थे, इसलिए उसको किसी ऐसी जगह की तलाश थी, जहां वह कुछ दिन रुक सके. जल्द ही उसे अपनी समस्या का हल दिखाई देने लगा. उसने एक ऐसा तट देखा, जो उसकी जरूरत के एकदम अनुरुप था. यहां उसके साथियों ने लगभग एक महीने तक आराम किया. इस बीच, जहाजों की मरम्मत भी की गई.

वह यहां से आगे बढ़ा तो 2 मार्च 1998 को बेड़े मोजाम्बिक द्वीप पर पहुंचने में सफल रहा. यहां उसने देखा कि वहां के लोग अरबों के साथ कारोबार करते थे. उसने वहां सोने, गहने, रजत और मसाले के चार जहाजों को भी देखा. असल में यह एक तरह का बंदरगाह है, जहां से व्यापार होता है.

यह सब देखने के बाद ‘वास्को’ को एहसास हो चुका था कि वह एकदम सही दिशा में आगे बढ़ रहा है. फिर भी उसने अपनी तसल्ली के लिए वहां के स्थानीय लोगों से संवाद स्थापित करना ज्यादा जरूरी समझा. इससे उसे दो फायदे हुए, पहला तो यह कि उसे यकीन हो गया कि वह सही दिशा में बढ़ रहा है… दूसरा यह कि उसे आगे की दिशा को समझने में मदद मिली.

1498 में भारत पहुंचकर बनाया इतिहास

आगे के सफर में उसकी मुलाकात एक गुजराती पायलट से हुई, जिसकी मदद से वह किलिकट के मार्ग से दक्षिण- भारत के पश्चिमी तट पर पहुंचने में सफल रहा. यहां पहुँचने के बाद उसका आगे का सफर आसान हो गया. वह अब हिंद महासागर से भारत के घाट और पहाड़ों को आसानी से देख रहा था. अंतत: 17 मई 1498 को उसने कालीकट बंदरगाह पर पहुंच कर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा दिया.

यहां पहुंचकर ‘वास्को’ ने पाया कि लोगों का अनुमान एकदम सही थी, भारत एक ऐसी जगह थी, जो दुनिया के बाकी देशों की तुलना में बहुत ज्यादा संपन्न था. यह बात वह पुर्तगाल को बता सके, इसके लिए वह अपने साथ वापस जाते हुए कुछ मसालों व रेशम को साथ में ले गया, जिन्हें देखकर पुर्तगाल के राजा की आंखें खुली की खुली रह गईं.

उसने 1502-03 में ‘वास्को’ को पुन: भारत यात्रा पर लौटने को कहा. यह यात्रा भी सफल रही तो वह 1524 में वह तीसरी बार भारत आया. इस बार उसे भारत में पुर्तगाली वायसराय के रूप में नामित किया गया. उन्हें मुख्यत: पुर्तगाली अधिकारियों के बीच बढ़ते भ्रष्टाचार से निपटने के लिए भेजा गया. हालांकि, वह कोचीन पहुंचने पर बीमार पड़ गया और 24 दिसंबर 1524 को मृत्यु को प्यारा हो गया.

The tomb of Vasco da Gama (Pic: BBC.com)

इतिहास में ‘वास्को’ का अपना स्थान है.

इसमें दो राय नहीं कि वह एक महान यात्री था, जिसने अपनी नेविगेट करने की क्षमता से खुद को इतिहास के पन्नों में दर्ज किया.

Web Title: Great Navigator Vasco Da Gama, Hindi Article

Feature Image Credit: macauholiday