बुद्ध धर्म के बारे में कहा जाता है कि यह सिर्फ एक धर्म नहीं बल्कि जीने का एक तरीका है. बात अगर बौध स्तूपों की करें तो आपके जहन में साँची स्तूप का ही नाम सबसे पहले आएगा.

आना भी स्वाभाविक है, क्योंकि इससे पहले ‘केसरिया स्तूप’ की खोज ही नहीं हुई थी. साल 2001 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, पुरातत्ववेत्ता मो के के साहब ने केसरिया स्तूप को विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप घोषित किया.

इस बार बिहार में मौजूद इस स्तूप को देखने का प्लान जरुर बनाए. अपना बैग पैक करें, और भगवान बुद्ध से जुड़े इस स्थान को देखने आये.

यह भारत की उन महत्वपूर्ण जगहों में से एक है, जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी प्राप्त है. लेकिन, इस जगह से जुड़ा हुआ इतिहास बहुत समृद्ध और पुराना है.

इसकी हर सीढ़ी पर कदम रखते हुए आपको इतिहास का अहसास जरुर होगा. ऐसे में इस जगह पर आना तो बनता ही है. यहाँ आकर आपको ज्ञात होगा कि समय के साथ कैसे धार्मिक स्थलों का महत्व बढ़ता और घटता रहा.

आइए चलते हैं केसरिया स्तूप के सफ़र पर, शब्दों के इस सफ़र को तय करने के बाद अपनी गाड़ी का अगला स्टेशन बिहार ही बनाए-

विश्व का सबसे ऊँचा ‘104 फीट’ स्तूप

केसरिया बिहार के वैशाली में स्तिथ है. बुद्ध काल में यह केस्सापुट्टा नाम से जाना जाता था. इस स्तूप के साथ एक बहुत रोचक इतिहास जुड़ा हुआ है.

गंडक नदी के किनारे स्थित यह स्तूप एक अहम बौद्ध स्थल है. इसका इतिहास बेहद अहम और पुराना है. बौध आख्यानों के अनुसार महापरिनिर्वाण की ओर अग्रसर भगवान बुद्ध ने कुछ समय केसरिया में ही बिताया था.

केसरिया स्तूप भगवान बुद्ध को समर्पित है. इस स्तूप का निर्माण 200 AD और 750 AD के बीच में हुआ था. यह बेहतरीन ढाँचा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा साल 1998 में खोजा गया था.

इसके बारे में कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने ‘महापरिनिर्वाण’ प्राप्त करने से पहले कुसिनारा (आज का कुशीनगर) में अपने आखिरी समय वहीं बिताया था.     

Kesariya Stupa Is The World's Largest Stupa (Pic: thinkingparticle)

...और जब भगवान ने नदी में कृत्रिम बाढ़ से रास्ता रोका                                                         

कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने कुशीनगर में अपने अंतिम समय बिताने के लिए वैशाली छोड़ दिया था. जब वह अपनी इस यात्रा पर थे, लिच्छवी लोगों के समूह ने भी उनके साथ चलने को कहा. भगवान बुद्ध के मना करने के बावजूद उन लोगों ने उनका साथ नहीं छोड़ा.

लिच्छवी जब बहुत प्रयास करने के बावजूद भी नहीं माने तो, भगवान बुद्ध ने नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्पन्न कर दी. इस तरह उन्होंने उन लोगों का रास्ता रोक दिया. केसरिया स्तूप के निर्माण को लेकर कई सारे मत हैं. एक मत के अनुसार इसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था. जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह गुप्तकाल से ही यहाँ मौजूद है.

लिच्छवी लोगों का समूह इससे बहुत निराश था. उन लोगों के निराश चेहरे को देखते हुए भगवान ने उन्हें अपना भिक्षा मांगने वाला कटोरा दे दिया.

इस किवदंती के अनुसार ही यह कहा जाता है कि लिच्छवी लोगों ने बुद्ध के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए इस स्तूप का निर्माण किया. इस जगह पर उनके अंतिम दिनों में यहाँ कदम पड़े थे.

It Is Said That Lord Buddha had Spent Some Time Here (Pic: gounesco)

फाह्यान और ह्यून त्सांग ने भी यहाँ की है यात्रा

जब शुरुआत में इसे बनाया गया तब यह मिट्टी या कच्चा था. जो समय के साथ बनता गया और आज के स्तूप के रूप में मौजूद है. यह अद्भुत स्तूप 30 एकड़ में फैला हुआ है. इस स्तूप के आसपास रानीवास, केसर बाबा का मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल भी मौजूद हैं.

इस जगह का महत्व इतना ज्यादा है कि फाह्यान और ह्यून त्सांग भी इस जगह पर आकर बुद्ध भगवान के दर्शन कर चुके हैं. उन्होंने यहाँ आने के बाद इस स्तूप के बारे में एक नोट भी छोड़ा था.

पांचवी शताब्दी में एक बौध भिक्षु फाह्यान ने भगवान बुद्ध के कटोरे के ऊपर बने इस जगह के बारे में जिक्र किया था. माना जाता है कि यह कोई और नहीं बल्कि केसरिया स्तूप ही था, जिसका जिक्र उन्होंने किया था.

Portrayal Of Lord Buddha During His Kushinagar Journey (Pic: singhsdm)

खंडित प्रतिमाओं के मिले हैं अवशेष

केसरिया स्तूप की ऊंचाई 104 फीट है. यह दुनिया के सबसे बड़ा बौध स्तूप है. इसकी खुदाई आज भी जारी ही है. ऐसा माना जाता है कि अभी वहां कई सड़कें और स्थल जमींदोज हैं.

यहाँ खुदाई के दौरान दीवारों पर खंडित मूर्तियों के अवशेष मिले. मूर्तियों की हालत कुछ ऐसी बुरी हो गयी है, जिसे देखकर लगता है कि इनका जानबूझ कर विध्वंस किया गया हो.

माना जाता है कि आक्रांताओं से बचाने के लिए इस स्तूप को छिपाने की कोशिश की गयी थी, जिसकी वजह से लोगों को इसके विषय में कम पता चल पाया. इसी प्रकार कई स्थलों को उनसे छिपाने की कोशिश की गयी थी. इतिहासकारों का मानना है कि दिलवाड़े के जैन मंदिर को भी इसी तरह छिपाया गया था.

इसके बाद 1998 में इस ऐतिहासिक स्थल की खुदाई के बाद में यह स्तूप दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप माना गया और सांची स्तूप ऊंचाई के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया.

इसमें सीढ़ी नुमा कई परत में दीवारें मिली हुई हैं. इसके अलावा, इन दीवारों में सेल भी मिले, जिनमें भगवन बुद्ध की क्षतिग्रस्त मूर्तियाँ मिलीं. माना जाता है काले पत्थर से निर्मित स्तंभ और उनपर बनी कलाकृतियाँ लगभग 2000-5000 ई. पूर्व की हैं.

Lord Buddha Statue (Representative Pic: pexels)

देखा आपने कितना रोचक इतिहास जुड़ा इस जगह से. इसके बावजूद इस जगह को इतनी मान्यता नहीं मिल पायी है, जितनी मिलनी चाहिए. बहरहाल, पहले की अपेक्षा अब यहाँ पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी है. अब यह विदेशी लोगों के टूरिस्ट स्पॉट में देखा जा सकता है.

ऐसे में, आप भी इन छुट्टियों यहाँ जाने का प्लान बना सकते हैं. क्यूंक, इतिहास से जुड़े स्थानों पर जाकर हमेशा कुछ नया सिखने को मिलता है. साथ ही मानव सभ्यता के निरंतर विकास की कहानी को भी दर्शाता है.

Web Title: Kesariya Stupa: A Place Where Lord Buddha Spent His Days Before Mahaparinirvana, Hindi Article

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