उत्तरी श्रीलंका की पक्की सड़कों से हम आगे बढ़ रहे थे. तभी ‘नंदीकला लगुन’ जो हमसे बिलकुल थोड़ी ही दूरी पर था. हमारे साथ-साथ चलने लगा. गाड़ी ड्राइवर शिवा ने इशारे से हमें वह स्थान दिखाया जहां एल.टी.टी.ई मुखिया प्रभाकरन मृत पाया गया था. मेरे बार-बार विनती करने के बावज़ूद भी उसने वाहन नहीं रोका. उसके चेहरे पर डर साफ़ झलक रहा था. तभी शिवा ने अचानक कुछ ऐसा कहा जिसकी उम्मीद हमें बिलकुल नहीं थी.

‘प्रभाकरन मरा नहीं है. कुछ लोग कहते हैं कि वह एक दिन वापस आएगा.’

शिवा ने नज़र बचाते हुए रास्ते की तरफ देखा और फिर चुपचाप वाहन चलाने लगा. तो कुछ ऐसा रहा ‘मुल्लैतिवु’ में मेरे पहले आधे घंटे का सफ़र…

A naval assault of the LTTE, at display in the war museum in Puthukkudiyiruppu

‘मुल्लैतिवु’ उत्तरी श्रीलंका की वो जगह है, जहां अधिकतम ट्रेवल गाइड्स को कोई दिलचस्पी नहीं होती. पर शायद किस्मत मेरे साथ थी. मेरे एक मित्र ने ‘शंकर’ (परिवर्तित नाम) से मिलाया, जो एक मिलनसार तमिल नौजवान था. वैसे तो वह उत्तरी श्रीलंका से था, पर काफी समय अनुराधापुर में रह चुका था. इस कारण वह तमिल और सिंहला दोनों ही भाषाएं बखूबी बोल लेता था. जाफना से तीन घंटे की बस यात्रा और बिना रुके तमिल संगीत से बोर होने के बाद मैं बस स्टेशन पहुचा. ‘पुथुककुदियिरुप्पु’ जहां शिवा पहले से ही स्टेशन पर मेरा इंतज़ार कर रहा था. फिर हम शिवा की गाड़ी पर बैठकर युद्ध संग्रहालय की ओर चल पड़े. श्रीलंका की विभिन्नता यहां के धर्म, संस्कृति और भाषा तक ही सीमित नहीं है बल्कि प्राकृतिक परिदृश्यों में भी दिखाई पड़ी. दक्षिण श्रीलंका हरा भरा है जबकि उत्तर सूखा हुआ है.

Victory monument dedicated to the Sri Lanka Army at Puthukkudiyiruppu.

युद्ध संग्रहालय में वाणी मानवीय ऑपरेशन की कुछ तस्वीरें थीं. जिनसे जानकारी मिली कि उस काल में श्रीलंकन आर्मी ने एक सिविलियंस सेफ जोन बनाया था, ताकि सेना और एल.टी.टी.ई के बीच होने वाली गोलीबारी से आम लोगों को परेशानी न हो सके. हालांकि, बावजूद इसके दोनों पक्षों पर आरोप लगे कि युद्ध के दौरान किसी ने भी समझदारी नहीं दिखाई, जिसके चलते ढ़ेरों लोग मारे गये थे.

मैंने शिवा से पूछा, ‘क्या तुम्हें यह लगता है कि सेना ने जानबूझ कर आम लोगों को युद्ध में मारा?’.

‘नहीं वो बस युद्ध को समाप्त करने के लिए अपना काम कर रहे थे’, शिवा ने जवाब दिया.

ओपन एयर म्यूजियम में समुद्री हमला करने वाले वाहन, बंदूक और कई अन्य अलग-अलग हथियार देखने को मिले, जोकि सेना ने एल.टी.टी.ई से हथियाये थे. एक बात जो यहां खास लगी कि अब कितना भी वक्त बीत गया हो, लेकिन आज भी यहां आने वाले एल.टी.टी.ई का भय अपने दिमाग से नहीं निकाल पाए हैं. इसे अजीब ही कहा जायेगा कि जब आप आएंगे तो आपको भी यह लगेगा कि यह म्यूजियम एल.टी.टी.ई की याद के तौर पर बनाया गया है, न कि उनके दर्दनाक गुनाहों के लिए.

युद्ध संग्रहालय के ठीक बाद एक विजय स्मारक है. यह यादगार स्मारक श्रीलंकाई सेना के उन सैनिकों के नाम है, जिन्होंने बहादुरी से लड़कर जंग जीती. हालांकि, कहा जाता है कि जीत के बाद यहां की सरकार ने युद्ध में जान गंवाने वाले लोगों को उतनी तवज्जो नहीं दी जितनी दी जानी चाहिए थी. इसके लिए सरकार को दुनिया भर के लोगों के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आलोचनाओं को भी झेलना पड़ा. इसी के चलते बाद में सरकार ने अपनी गलती को स्वीकारते हुए युद्ध के दौरान जान गंवाने वाले वीरों के नाम पर एक स्मारक बनावाया.

मैं क्रीम सोडा की चुस्की का आनंद ले रहा था कि तभी एक पर्यटक महिला ने यह संदेह जताते हुए पूछा कि शायद मैं भारतीय हूँ, ‘तुम इस तमिल लड़के के साथ क्या कर रहे हो?’

मैंने कहा कि ये मेरे मित्र हैं और अच्छे इंसान भी. हालांकि, महिला मेरे जवाब से बहुत ज्यादा संतुष्ट नजर नहीं आ रही थी. महिला मेरे पास आयी और तंज कसते हुए बोली कि ‘ये आतंकवादी क्षेत्र है फिर भी तुम यहां आये हो. मैं महिला का इशारा समझ गया था और शायद वो गलत भी नहीं थी, क्योंकि अतीत की काली कहानी उसके लिए आसान नहीं थी. जाहिर है, एल.टी.टी.ई का साम्राज्य भले ही नहीं रहा पर उनकी विरासत को समाप्त होने में वक़्त तो लगेगा.

The swimming pool that was used to train Sea Tigers, the naval arm of the LTTE.

आगे बढ़ने पर मुल्लैतिवु के पास के जंगल में एक और पर्यटन स्थल देखने को मिला. यह एक ओलंपिक के आकर का स्विमिंग पूल था. माना जाता है कि यहां एल.टी.टी.ई के ख़ूंखार आतंकवादी परीक्षण लेते थे. 83 फिट लम्बाई और 22 फिट की गहराई के आकार का बना यह स्विमिंग पूल, द्वीपों पर बने अन्य पूलों जैसा ही था.

जब हम पूल के करीब पहुंचे तो, वहां एक सैनिक तैनात दिखा, जो रेडियो पर संगीत का आनंद ले रहा था. शायद वह इस बात को लेकर आश्वस्त था कि अब कोई एल.टी.टी.ई नहीं आएगा.

Remnants of the Farah III, a Jordanian ship which was captured by the LTTE.

दिन के भोजन से पहले ही हमें एक और जगह के बारे में पता चल गया, जहां जोर्डनियन नाव को एल.टी.टी.ई के द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया था. हुआ यूं था कि फराह 3 खाने पीने के जरूरी सामान लेकर भारत से दक्षिणी अफ्रीका की ओर जा रहा था कि अचानक इंजन में खराबी के कारण मुल्लैतिवु के पास ही रोक दिया गया था. जहां एल.टी.टी.ई का दबदबा था. फिर बिलकुल वैसा ही हुआ, जिसकी एल.टी.टी.ई से उम्मीद थी. टाइगर्स ने जहाज पर कब्जा करते हुए सभी वस्तुओं को जब्त कर लिया. इसके बाद उसने इसे अपना परिचालन केंद्र बना दिया. बाद में श्रीलंका की सेना ने 14 मई 2001 को इसे अपने कब्जे में कर लिया था.

दर्दनाक युद्ध के बावजूद, सरकार और बाकी विभाग ने काफी बढ़िया सड़क और इमारत बनाकर मुल्लैतिवु में जीवन को पुर्नजीवित किया है. इससे यहां के लोग काफी खुश हैं.

A kawariya, or devotee of the goddess, outside the Kannaki Amman Kovil.

सौभाग्य से जिस दिन मैं मुल्लैतिवु पंहुचा वह दिन ‘वटप्पलाई कण्णकी अम्मान पोंगल’ का दिन था. यह साल में एक बार मनाया जाने वाला त्यौहार है. हिंदू, बौद्धिस्ट और तमिल बिना किसी भेदभाव के इस त्यौहार को पूरे उल्लास के साथ मनाते हैं.

त्यौहार के खत्म होने पर हम जब वापसी के लिए तैयार थे, तभी शिवा ने यह बताया कि, ‘कभी यहां एल.टी.टी.ई फूल चढ़ाने आया करते थे और अब श्रीलंकन वायु सेना चढ़ाती है.’

मैंने शिवा से दोबारा पूछा, ‘क्या तुम्हें सच में लगता है कि प्रभाकरन लौट के आएगा?’

इस बार उसने  तथ्यात्मक जवाब दिया.

‘मुझे पता है कि वो मर गया है, इसलिए हमें युद्ध को भुलाकर शांति के साथ रहना चाहिए.

यह एक बढ़िया सकारात्मक संकेत है कि एक ऐसी युद्ध भूमि जहां हजारों लोगों ने अपनी जान गवाई. वहां शिवा जैसे लोग शांति चाहते हैं, ताकि श्रीलंका की नई पहचान बन सके.

Original Article Source / Writer: Roar.lk / Sachin Bhandary

Translated by: Nitesh Kumar

Web Title: Mullaitivu ‒ An Unlikely Tourist Destination, Hindi Article

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All images courtesy Sachin Bhandary.