“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं मशहूर पर्वतारोही बन जाऊंगा. ये सब अपने आप ही होता चला गया.”

ये वो अल्फाज हैं जो एडमंड हिलेरी को महान बनाते हैं.

ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो ये सोच पाते हैं कि उन्हें एक दिन विश्वविजेता बनना है.

कहते हैं जिसके मन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो उसके लिए हर मुश्किल आसान हो जाती है. ऐसी ही कहानी है दुनिया को अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाले एडमंड हिलेरी की!

आपमें से बहुत से लोग इनके नाम से परिचित होंगे, तो चलिये प्रेरक एडमंड हिलेरी के जीवन सफर पर नजर डालते हैं–

शर्मिला था स्वभाव!

अपनी जांबाजी के लिए दुनियाभर में ख्याति प्राप्त करने वाले एडमंड हिलेरी का जन्म 20 जुलाई 1919 को न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में हुआ था. हिलेरी भले ही न्यूजीलैंड में जन्मे पर यहां से उनका खानदानी रिश्ता नहीं था. इससे पहले उनके दादा इंग्लैंड में रहते थे.

हिलेरी ने अपनी शुरूआती पढ़ाई एक तुआकुन प्राथमिक विद्यालय से की फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे ऑकलैंड ग्रामर स्कूल चले गए. हिलेरी पढ़ने में कितने होशियार थे इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने तय वक्त से दो साल पहले ही प्राइमरी स्कूल की परीक्षा पास कर ली थी. उनके इस कारनामे से उनके स्कूल के साथी हैरान रह गए थे.

कई बार उन्हें अपने पिता के साथ मधुमक्खी पालन के काम में हाथ बंटाना पड़ता था. कुछ दिनों बाद उन्होंने पिता के साथ इस काम को करने के लिए अपनी पढ़ाई ही छोड़ दी… हालांकि बाद में वो फिर से पढ़ाई करने जाने लगे.

Tenzing Norgay and Edmund Hillary. (Pic: thoughtco)

छोटी उम्र में थी ‘बड़ी सोच’

एडमंड बचपन में बेहद शर्मिले स्वभाव के थे. वो किसी से भी ज्यादा घुलना मिलना पसंद नहीं करते थे और अपने आपमें ही खोए रहते थे, लेकिन किसे पता था कि इस खामोशी के पीछे छिपी उत्साह और साहस की लहरें उमड़ रही हैं जाे बाहर आने के लिए बेताब हैं.

ये जानकर आपको हैरानी होगी कि जब एडमंड सिर्फ 16 साल के थे, तभी से पर्वतारोहण करने का अभ्यास करने लगे थे. सन 1935 की बात है माउंट रुआपेह पर स्कूल ट्रिप के दौरान उन्हें पहाड़ों की ऊंचाइयों और उसके आनंद ने अपना दीवाना बना दिया.

इसके बाद एडमंड ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वह अक्सर स्कीइंग और हाइकिंग के लिए पहाड़ियों पर जाने लगे. इसके कुछ साल बाद ही इन्होंने अपनी पहली चढ़ाई 19 साल की उम्र में 7500 फीट ऊंची माउंट ओलिवर, न्यूजीलैंड पर की.

एडमंड ने अपने हाईस्कूल के दौरान ही न्यूजीलैंड के दक्षिण में स्थित एल्प्स पर्वत पर चढ़ने की शुरूआत कर दी थी.

हालांकि पिताजी के बाद ये अपने खानदानी व्यापार मधुमक्खी पालन से दूर नहीं हुए और अपने भाई के साथ इस काम को करते रहे.

सेना में किया काम और…

कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिलेरी ने न्यूजीलैंड एयर फोर्स के लिए आवदेन किया लेकिन बाद में उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से अपना नाम वापस ले लिया.

हालांकि 1943 में उन्होंने फिर से रॉयल न्यूजीलैंड एयरफोर्स में एक नेवीगेटर के तौर पर काम शुरू कर दिया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इनकी तैनाती दक्षिण प्रशांत महासागर में एक जहाज पर थी लेकिन युद्ध में घायल होने के बाद ये वहां से लौट आए.

इनकी खुशनसीबी रही कि इन्हें जीवन परिवर्तनीय चोट नहीं लगी इसलिए ये जल्द ही पर्वतारोहड़ के अपने पुराने पैशन की ओर लौट गए.

अब इनका लक्ष्य हिमालय को जीतना था, इसलिए अपनी मेहनत को और धार देने के लिए इन्होंने दो साल तक स्कॉटिश हाइलैंड्स में कड़ा प्रशिक्षण लिया.

Edmund Hillary during Second World War. (Pic: nzhistory)

असफलताओं से सीखा बहुत कुछ!

इस तरह इन्होंने एल्प्स पर चढ़ाई के कई प्रयासों के दौरान अपनी कमजोरियों को पहचाना और उन सभी मामलों में अपने आपको मजबूत किया. इसी के तहत 30 जनवरी 1948 को हिलेरी ने न्यूजीलैंड की सबसे ऊंची चोटी कही जाने वाली माउंट कुक पर अपने साथी माइक सुलीवन के साथ चढ़ाई की.

हिलेरी 1951 के एवरेस्ट अभियान का भी हिस्सा रहे, जिसका नेतृत्व एरिक शिफ़टन कर रहे थे. इसके एक साल बाद वो 1952 में भी ब्रिटिश एवरेस्ट अभियान का हिस्सा थे पर रास्ता भटकने की वजह से वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाए.

उस समय तिब्बत और नेपाल द्वारा जाने वाले एवरेस्ट के रास्ते को साल में एक अभियान के लिए ही खोला जाता था, इसलिए 1952 में एक स्विस दल, जिसमें तेनजिंग भी शामिल थे एवरेस्ट पर चढ़ा था लेकिन खराब मौसम की वजह से चोटी पर पहुचने से पहले ही वह लौट आया.

1953 का ‘एवरेस्ट अभियान’

सन 1953 में सर जॉन हंट के नेतृत्व में विश्व के बीस अन्य सबसे बेहतरीन पर्वतारोहियों के साथ एडमंड हिलेरी एवरेस्ट नापने चल दिए. ये चढ़ाई इतनी आसान नहीं थी, इससे पहले 63 देशों के 1200 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर चढ़ने की कोशिश की थी जो अंततः असफल रही.

एडमंड ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया था कि वो खुद भी पहले दो बार एवरेस्ट पर चढ़ाई करने में असफल रहे थे.

तब उन्होंने हिमालय की तरफ देखकर कहा था, ‘मैं फिर आऊंगा. तुम उस वक्त भी इतने ही ऊंचे रहोगे पर मेरा हौसला पहले से कुछ ज़्यादा ऊंचा हो जाएगा.’

जॉन हंट इससे पहले सात एवरेस्ट अभियानों का नेतृत्व कर चुके थे. एडमंड जिस टीम में थे इसमें उन का साथ दे रहे थे तेनजिंग. वो पर्वतारोहण के काम में माहिर थे. ये वो वक्त था जब एडमंड और तेनजिंग की दोस्ती में भी इजाफा हो रहा था.

कहा जाता है कि मार्च 1953 में 25,900 फीट की ऊंचाई पर बेस कैंप तैयार कर दिया गया.  26 मई को जॉन हंट ने मे बाउड्रीलन और इवन्स को पहले दल के रूप में चढ़ाई के लिए भेजा लेकिन इवन्स का ऑक्सीजन सिस्टम रास्ते में ही फेल हो गया जिस कारण दोनों को वापस लौटना पड़ा.

अब जॉन हंट ने दूसरी टीम के रूप में हिलेरी और तेनजिंग को भेजा. ठंडी बर्फीली हवाओं के कारण उन दोनों को दक्षिण हिस्से तक पहुंचने में दो दिन लग गए.

Climbing Everest. (Pic: adventuresportsnetwork)

जब बर्फ में जम गए हिलेरी के पैर!

28 मई की रात को एवरेस्ट की हांड कंपा देने वाली ठंड में 8000 मीटर ऊपर लगे टेंट के अंदर ही एडमंड और तेनजिंग को रात बितानी थी, लिहाजा दोनों यहीं सो गए.

रातभर ठंडी बर्फीली हवाएं चलती रहीं लेकिन इन दोनों के पास गर्माहट देने वाले ओवरकोट थे. बावजूद इसके हिलेरी के दोनों पैर जम गए. असल में सोते हुए गलती से हिलेरी के बूट टेंट के बाहर रह गए थे. इसके बाद उन्होंने अपने पैरों को गर्म किया और दोनों फिर से आगे बढ़े.

ऊंचाई बढ़ती जा रही थी और दोनों के पास 14 किलो सामान लदा हुआ था. फिर भी हर चुनौती का सामना करते हुए दोनों एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच ही गए. 29 मई 1953 का वो दिन था जब सुबह के करीब साढ़े 11 बजे इनकी मेहनत रंग लाई और दोनों अपनी जान जोखिम में डाल कर दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचने में कामयाब रहे. दोनों लगभग 15 मिनट शिखर पर रहे. उनमें से एक ने कैमरा निकाला और अपने साथी शेरपा तेनजिंग की तस्वीर उतार ली. जब तेनजिंग ने अपने साथी की तस्वीर उतारनी चाही तो उसने मना कर दिया.

तेनजिंग ने भारत, नेपाल और संयुक्त राष्ट्र के झंडे गाड़कर इस दुर्गम चोटी पर अपनी फतह का ऐलान कर दिया.

Sir Edmund Hillary and Tenzing Norgay. (Pic: nationalgeographic)

और मिली ‘सर’ की उपाधि

एवरेस्ट फतह करने के बाद मानो हिलेरी की जिंदगी ही बदल गई. इंग्लैंड ने हिलेरी को ‘सर’ के खिताब से नवाजा. वहीं हिलेरी ने इस उपाधि पर कहा कि “मैं शायद इस सम्मान के लिए सही व्यक्ति नहीं था. जब मुझे इसकी खबर दी गई तो मैं सोचने लगा कि इसके बाद मैं कैसे अपने शहर में आज़ादी से घूम पाऊंगा, मुझे अपने लिए अब नए कपड़े खरीदने होंगे!”

इसी दौरान 3 दिसंबर 1953 को वो लुइस मैरी रोज के साथ शादी के बंधन में बंध गए. शादी के बाद हिलेरी को तीन बच्चे हुए लेकिन एक विमान दुर्घटना में उनका पूरा परिवार खत्म हो गया. हालांकि 1989 में उन्होंने दोबारा शादी कर ली.

इस बीच उनका पहाड़ प्रेम कभी कम नहीं हुआ और वो आगे की रणनीति बनाने में जुट गए. इसके बाद एडमंड हिमालय की सबसे दुर्गम और कठिन 11 अलग अलग चोटियों पर चढ़ने में कामयाब रहे जिनकी कुल ऊंचाई 20 हजार फीट से ज्यादा थी.

वहीं एवरेस्ट के बाद एडमंड 1957 और 1958 में ट्रांस अंटार्कटिक अभियान का हिस्सा रहे और मैसी-फ़र्गुसन ट्रैक्टर लेकर दक्षिण ध्रुव पर जाने वाले पहले इंसान बने.

2003 issue of National Geographic. (Pic: achievement)

हिलेरी के ‘अंतिम दिन’

11 जनवरी 2008 को हार्ट फेल होने के कारण एडमंड हिलेरी का निधन हो गया. जब उनका निधन हुआ वो 88 साल के थे. हिलेरी की मृत्यु की घोषणा स्वयं प्रधानमंत्री हेलन क्लार्क ने दी जिसमे उन्होंने हिलेरी की मौत को न्यूजीलैंड के लिए एक भारी क्षति बताया.

हिलेरी की मृत्यु के बाद राष्ट्रीय सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली गई. इसमें भारी जन सैलाब अपने हीरो को उनकी आखिरी मंजिल तक विदा करने गया.

Web Title: Sir Edmund Hillary: First Ascent to Mount Everest, Hindi Article

Featured Image Credit: The Japan Times/achievement