कहते हैं, जब 4 खाली दिमाग एक साथ बैठते हैं, तो कुछ न कुछ तूफानी होने की संभावना बढ़ जाती है. कुछ ऐसा ही हमारे साथ हुआ. देर रात 12 बजे के आसपास का वक्त रहा होगा. हम रात का खाना खत्म करके एकसाथ बैठे थे. अमूमन तौर पर तो डिनर में इतनी देरी नहीं होती, पर चूंकि शुक्रवार की रात थी और अगले दिन किसी को दफ्तर नहीं जाना था, इसलिए गपशप का मस्तमौला माहौल था, तभी अचानक एक साथी ने कहा कि चलो यार आगरा चलते हैं.

इस पर हम एक साथ बोले आगरा और इस वक्त, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है न भाई… करीब घंटे पर चली इस चक्कलस के बाद आखिर में तय किया गया कि हम आगरा जायेंगे. बस प्लान में थोड़ा चेंज करते हुए रात में न निकलकर सुबह-सवेरे ताज एक्सप्रेस से जाना तय किया गया. इसके बाद सब सोने चले गये और सुबह जैसे-तैसे तैयार होकर पहुंच गये निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन.

ताज एक्सप्रेस से पहुंचे

हमारे पास टिकट नहीं थे और ट्रेन हार्न दे रही थी. ऐसे में हमारे पास बिना टिकट ट्रेन में चढ़ने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था. हमने देर न करते हुए दौड़ते हुए ट्रेन को पकड़ा. हमारी सांसे अभी नार्मल नहीं हुई थी कि टीटी अंकल ने पास आते हुए कहा, टिकट प्लीज… अब टिकट होती तब न दिखाते.. खैर, जुर्माना लेकर टीटी अंकल ने हमें सीट भी दे दी. दिल्ली से आगरा की दूरी 200 किमी के आसपास थी, और ट्रेन भी लेट नहीं हुई इसलिए हम सुबह 10:30 बजे आगरा पहुंचने में कामयाब रहे.

Taj Express (Pic: indiarailinfo.com)

सफर का होमवर्क आया काम

आगरा कैंट रेलवे स्टेशन के बाहर हमारा इतंजार कर रहे गाड़ी चालक ने बढ़कर हमारा स्वागत किया और हमें होटल की ओर ले चला. असल में हम आगरा पहुंचने पर अपना थोड़ा सा भी टाईम खराब नहीं करना चाहते थे, इसलिए हमने अपना सारा होमवर्क सफर के दौरान ही कर लिया था. यही कारण था कि पहुंचने पर हमें गाड़ी तैयार मिली, यह गाड़ी उस होटल मालिक ने भेजी थी, जिसके यहां हमने 800 /- रू. प्रति रात की दर से दो कमरे बुक किए थे.

पहले हमें इनका चार्ज ज्यादा लग रहा था, पर होटल पहुंचने पर हमें एहसास हो चुका था कि हमने गलत जगह पैसे नहीं लगाये हैं. होटल की टैरिस पर शानदार रेस्तरां, नि:शुल्क वाईफ़ाई जैसी सभी जरुरी सुविधाएं थी.

खैर, हमने देरी न करते हुए अपना सामान अपने-अपने कमरों में रखा और जल्द ही तैयार होकर 12 बजे तक तैयार हो गये. दोपहर का खाना हमारा होटल में ही था. खाना-खाते ही हम होटल के गेट पर पहुंचे, जहां ऑटो चालक रमाकांत दादा हमारा इंतजार कर रहे थे.

ऑटो की सवारी और फर्राटेदार अंग्रेजी

वैसे तो हम गाड़ी भी ले सकते थे, लेकिन हमने ऑटो का चयन किया, इसके पीछे दो बड़े कारण थे. पहला तो यह कि हम पैसे बचाना चाहते थे, दूसरा यह कि हम आगरा के कल्चर को नजदीक से देखना चाहते थे. अच्छा ही रहा जो हमने ऑटो का चयन किया, नहीं तो हम अपने 40 वर्षीय ऑटो चालक रमाकांत दादा की फर्राटेदार अंग्रेजी को कैसे सुन पाते.

यकीन मानिए हम पढ़े-लिखे बेकार थे उनके आगे. सही मायने में यही है इंडिया, जिस पर हमें गुमान करना चाहिए.

रमाकांत दादा की अंग्रेजी सुनकर हम उनके बारे में और ज्यादा जानना चाहते थे, हम कुछ पूछते इससे पहले उन्होंने ब्रेक मारते हुए कहा, भईया हम पहुंच गये आगरा फोर्ट. रमाकांत दादा के साथ पूरा दिन रहना था, इसलिए हमने अपने सवालों को साइड में रखते गुए किला देखना ज्यादा मुनासिब समझा.

आगरा फोर्ट में बीती दोपहर

आगरा फोर्ट के बारे में दोस्तों के मुंह से जितना सुना था, यह उससे कही ज्यादा बड़ा था. इसके अंदर इतने सारे महल हैं कि एक बार अपनी गिनती पर भी हमें शक होने लगा था. यहां शाहजहां महल, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, नगीना मस्जिद, मुसम्मन बुर्ज सबसे खास जगहें लगी. यह इतना बड़ा था कि कब इसे घूमते-घूमते 2 बजे गये, हमें पता ही नहीं चला. आगरा फोर्ट के बाद हम इतिमाद-उ-दौला मकबरे पर गये, जहां वास्तुकला के कई सारे उदाहरण देखने को मिले. इससे भी ज्यादा यहां

सबसे अच्छी चीज यह लगी कि यहां मौजूद किसी भी हिस्से में जाकर हम सेल्फी का मजा ले सकते थे. अच्छा हुआ जो, हमारे साथ लड़कियां नहीं थीं, अन्यथा हमें यहां से निकलने में शाम होना तय था.

Diwan Inner View (Pic: mapsofindia.com)

मेहताब बाग में शानदार शाम

अगली कड़ी में हमने मेहताब बाग का रुख किया. हम जैसे ही अंदर घुसे तो देखते ही रह गये. जहां-जहां तक हमारी नजर जा रही थी, वहां तक यह बगीचा हमें दिखाई दे रहा था. हम इस बगीचे के हर छोर को छू लेना चाहते थे, इस चक्कर में यहां हमें शाम हो गई. एक प्रकार से अच्छा ही हुआ कि शाम हो गई थी, क्योंकि अगर हम समय से लौट जाते तो शायद यहां सूरज को डूबते हुए नहीं देख पाते.

वैसे तो सूरज को डूबते हुए देखना कोई बहादुरी का काम नहीं था, लेकिन बगीचा इस वक्त इतना शानदार दिख रहा था कि लखनऊ के हजरतगंज की शाम भी शरमा जाए.

मध्यम पड़ती सूरज की रोशनी मानो कह रही हो, यहां आने के लिए शुक्रिया, मुस्कुराईये कि आप मेहताब बाग में है. लौटने का मन नहीं था, लेकिन सबकुछ मन से नहीं होता, इसलिए हम बेमन लौटे.

रमाकांत दादा के साथ सवालों का सिलसिला

होटल लौटते वक्त हमने रमाकांत दादा से सवालों का सिलसिला चालू किया, हमारा सबसे पहला सवाल था, दादा आप इतनी बढ़ियां अग्रेजी बोलना कैसे सीखे. दादा मुस्कुरा के बोले भईया हम तो पांचवी तक पढ़े हैं, वह तो आप जैसे लोग मिल जाते हैं. इसलिए सुन-सुनकर सीख गये. दादा ने बताया कि उनके दो बेटे हैं, एक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा और दूसरा अभी दसवीं में है. उनकी एक पत्नी भी है जो, घर देर से पहुंचने पर नाराज हो जाती है. यह कहते हुए दादा ने अपने आटो को मर्सडीज बना दिया और पलक झपकते ही पहुंच गये अपने गंतव्य पर..दादा को देर हो रही थी, इसलिए कल फिर मिलेंगे के वादे के साथ उनको गुड नाइट बोलकर हम होटल के अंदर आ गए.

दिन भर की थकावट के बाद हमने बाथ लेकर थोड़ा सा आराम किया और फिर एक साथ डिनर पर निकल गये, जोकि होटल की टैरिस पर था. डिनर के बाद हम अपना वक्त खराब नहीं करना चाहते थे, इसलिए जल्दी ही अपने-अपने कमरों में जाकर सो गये.

आनन-फानन में होटल से निकले

अगले दिन हमारी आंख रमाकांत दादा के फोन से खुली वह वादें के मुताबिक ठीक 9 बजे होटल पहुंच चुके थे. आनन-फानन में हम जैसे-तैसे तैयार हुए और अपना सामान बांधकर होटल के रिसेप्शन काउंटर पर जा पहुंचे ताकि चेक आउट की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके. इसके बाद हम एक बार फिर से तैयार हो गए रमाकांत दादा के साथ आटो में आगरा की सैर के लिए. चूंकि सुबह नाश्ता नहीं किया था, इसलिए हम सबके पेट में चूहे कूद रहे थे, हमने रमाकांत दादा से अनुरोध किया कि कहीं नाश्ते के लिए रुके. उन्होंने जल्द ही

सदर बाजार के पास राजेश टी स्टाल के पास ब्रेक मारा और हमसे बोला भईया यहां कर लीजिए नाश्ता. यह यहां की बहुत नामी दुकान है .

Sadar Bazar (Pic: informatik)

कचौड़ियों के साथ चाय की चुसकियां

रमाकांत दादा जिस दुकान को नामी कह रहे उसकी हालत कुछ खास न थी, रोड साइड में एकदम छोटी सी थी. जुगाड़ से बनी हुई एक बेंच रखी हुई थी, जिस पर कुछ लोग बीड़ी पी रहे थे. एक बात और कहने के लिए तो यह एक टी स्टाल था, लेकिन यहां मैगी, आलू के पराठे, समोसे और खस्ते जैसे ढ़ेर सारे ऑप्शन थे हमारे पास.

थोड़ी सी हिचक के साथ हमने कचौड़ी ऑडर कर दी. गर्मागरम कचौड़ी जैसे ही हमारी प्लेट पर आई हम एक साथ इस तरह कूद पड़े, जैसे सालों से भूखे हों, एक के बाद एक हम कचौड़ियां खाते चले गये.

अपनी पेट पूजा के बाद जब हमने पूछा राजेश भईया कितना हुआ तो वह बोले साहब 55 रुपया. हम दाम सुनकर दंग रह गये, हमने फिर से पूछा भईया ढंग से जोड़ लिया है न, वह बोले हां भईया सिर्फ 55 रुपया हुआ है. हमने एक पानी की बोतल लेते हुए उनको सौ का एक नोट दिया और जैसे ही वह बचे पैसे देने के लिए आगे बढ़े, हमने कहा भईया इन्हें अपने पास ही रखिये आप बस कचौड़ियों का स्वाद कम मत होने दीजिएगा.

ताजमहल का दीदार

नाश्ते के बाद हम निकल पड़े ताज महल की ओर.. जल्दी ही रमाकांत दादा ने हमें ताज पहुंचा दिया, खिड़की से हमने अपने लिए टिकट ली और लग गये इंट्री के लिए लाइन में. बहुत दिनों बाद हम सब किसी लाइन में लगे थे, इसलिए यह हमारे लिए थोड़े से मुश्किल के पल थे. खैर, हमने इन्हें भी पार कर लिया और पहुंच गए ताजमहज के सामने. दूधिया पत्थरों से ताजमहल हमारी आंखों के सामने था, जिसे हम अपनी आंखों में कैद कर लेना चाहते थे. धीरे-धीरे हम आगे बढ़े, ताकि हम इसे नजदीक से देख सकें. हमने यहां एक अच्छा वक्त बिताया.

Line for Enter in the Taj Mahal (Pic: trover.com)

सदर बाजार में खरीदारी

ताज से निकलकर हमने दोपहर का खाना किया और फिर हम सेंट पीटर चर्च के लिए गए, जो दुर्भाग्य से बंद था. वैसे तो अभी बहुत कुछ बचा हुआ था घूमने को, लेकिन हमारे पास टाइम कम था, दूसरा हमारा मन भी भर गया था, इसलिए हमने रमाकांत दादा से कहा हमें किसी अच्छे बाजार की तरफ ले चलो, जहां हम कुछ खरीदारी कर सकें. इसी के साथ हम पहुंच गये सदर बाजार जहां हमने थोड़ी सी खरीदारी की, विशेषकर आगरे का मशहूर पेठा, क्योंकि सुना था कि आगरा गये और वहां का पेठा नहीं खाया तो क्या आगरा गये.

भावुक विदाई…

सदर बाजार से रमाकांत दादा ने हमें सीधे आगरा रेलवे स्टेशन छोड़ दिया, वहां हमने उनका धन्यवाद करते हुए, उनके दो दिन का मेहनताना 1500 रुपये पे किया और यह कहते हुए उनसे अलविदा ली कि, घर टाइम घर से पहुंचियेगा वरना आपकी वो.. रूठ जायेंगी. वह खिल-खिलाकर हंसे और बोले भईया चलते हैं..अपना ख्याल रखना. महज दो दिन पहले ही मिले थे हमें रमाकांत दादा, लेकिन उनको छोड़ते हुए हमें अच्छा नहीं लग रहा था. उनसे अजीब तरह का लगाव सा हो गया था. खैर हमें आगे तो बढ़ना ही था, इसलिए हम ताज एक्सप्रेस से दिल्ली वापस आने के लिए रवाना हो गये, इस बार हमे दौड़कर ट्रेन पकड़ने की जरुरत नहीं पड़ी, क्योंकि हम समय से पहुंचे थे और हमारे पास टिकट भी थे.

ट्रिप की कुल लागत

  • ठहरने का खर्च (प्रति व्यक्ति): 800 रुपये
  • दिल्ली से आने-जाने में खर्च: 200 रुपये
  • आगरा घूमने के लिए ऑटो खर्च: 1500 रुपये
  • विविध खर्च: 600 रुपये
    ———————–
    कुल खर्च: लगभग 3,100 रुपए
    (*यह खर्च अलग-अलग जगहों और सुविधाओं के हिसाब से बदल सकता है)

Taj Mahal (Pic: indovacations.net)

कुल मिलाकर, यह एक शानदार यात्रा थी, आज भी जब हम साथी साथ बैठते हैं तो इस यात्रा की यादें ताजा हो जाती है, खासकर रमाकांत दादा और राजेश टी वाले का जिक्र तो छिड़ ही जाता है. सोच रहे हैं एक बार फिर से घूम के आये, ताकि पता चले कि राजेश की कचौड़ियों का स्वाद तो नहीं बदला और जो जगहें बच गई हैं देखने को वह भी घूम लेंगे.

Web Title: Weekend in Agra With 3100 Rs, Hindi Article

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