अभी विजय माल्या स्कैम-एपिसोड की चोट से भारतीय बैंकिंग बाजार ठीक से उबर भी नहीं पाए थे कि एक और बैंकिंग घोटाला सामने आ गया. हम बात कर रहे हैं नीरव मोदी द्वारा की गई अब तक की सबसे बड़ी बैंक धोखाधड़ी की!

आज फिर से ये सवाल खड़ा होता है कि आखिर बैंकों ने पिछले घोटालों से क्या सीखा… ?

आखिर बड़े ऋण देते समय बैंक किस चश्मे का इस्तेमाल करता है, यह यक्ष-प्रश्न बन गया है.

कुछ ऐसे ही सवालों के साथ आज हम बात करेंगे बैंकों में घोटालों के कारणों की. हम आपको बताएंगे कि कैसे भारत के बैंकों को बड़े क़र्ज़ लेकर चूना लगाया जा रहा है–

बैंकों की बैलेंस शीट की अनदेखी?

इन दिनों पंजाब नेशनल बैंक की बैलेंस शीट का कुछ इस तरह से वर्णन किया जा सकता है: बाईं ओर, कुछ भी ठीक नहीं है और दाईं ओर… कुछ भी शेष नहीं है.

(On the left side, nothing is right. On the right side, nothing is left).

ये भारत के दिग्गज नेता और सांसद शशि थरूर का एक ट्वीट है, जो भारत के दूसरे सबसे बड़े बैंक पीएनबी की वित्तीय स्थिति को बताने के लिए काफी है.

ऐसे में असली गड़बड़ी बैंकों की बैलेंस शीट में ही नज़र आती है!

अब बात है कि संपत्ति वाले हिस्से में बढ़ने वाली संख्या का कोई भी उपयोग नहीं हो पा रहा है. इन्हें ही आम भाषा में गैर निष्पादित परिसंपत्तियां या नॉन परफोर्मिंग एसेट्स (एनपीए) कहा जाता है.

आरबीआई की दिसंबर 2017 को आई एक रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर 2017 तक भारत के पब्लिक सैक्टर बैंकों का डूबता ऋण 7.34 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है जो इनकी कुल संपत्ति का 87 प्रतिशत तक है. इसी क्रम में निजी बैंकों का एनपीए 1.03 लाख करोड़ रुपए है जो सरकारी बैंकों से लगभग 6 लाख करोड़ रुपए कम है.

जाहिर तौर पर सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट लापरवाही की कहानी कह रही है.

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार भारतीय बैंकों का एनपीए बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो चुका है. आंकड़ों के अनुसार आईडीबीआई और इंडियन ओवरसीज बैंक की सबसे ज्यादा गैर निष्पादित परिसंपत्तियां हैं.

आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सकल गैर निष्‍पादित परिसंपत्तियां (जीएनपीए) भारत की कुल जीडीपी का लगभग 5 प्रतिशत तक हैं.

इससे पहले बैंकों की बैलेंस शीट सुधार के मामले में भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि बैंकों के विलय को ज्यादा महत्व न देते हुए उनके एनपीए या उनके दायित्वों को खत्म करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए.

Raghuram Rajan. (Pic: newindianexpress)

छोटों से लूट और बड़ों को छूट… ?

आम लोगों से सेवा शुल्क, लेट शुल्क और मिनिमम बैलेंस के नाम पर सरकारी बैंक लूट कर अपने एनपीए के घाटे को भरने में लगे हुए हैं. यह एक आम धारणा सी बन गयी है!

इसका ताजा उदाहरण है भारतीय स्टेट बैंक द्वारा मिनिमम बैलेंस के नाम पर वूसली गई राशि.  एसबीआई ने पिछले साल अपने लाभ से भी ज्यादा रकम मिनिमम बैलेंस के नाम पर अपने ग्राहकों से वसूल की.

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय स्टेट बैंक ने अप्रैल से नवंबर 2017 तक मिनिमम बैलेंस के नाम पर भारत के आम खाताधारकों से 1771 करोड़ रुपए वसूल किए जो जुलाई-सितंबर की तिमाही के लिए भारतीय स्टेट बैंक के शुद्ध लाभ से भी ज्यादा है.

एसबीआई में 42 करोड़ बचत खाते हैं. हालांकि जनधन खातों से ऐसा कोई भी चार्ज वसूल नहीं किया गया.

वहीं भारत के आम नागरिक पर वित्तीय निगरानी रखने के लिए सरकार ने तमाम प्रावधान किये हैं, जैसे कि बैंकों का आधार से लिंक करवाना, ऋण उगाही की व्यवस्था… पर क्या ये व्यवस्था सरकार ने बड़ी लूट (Loot) करने वालों के लिए भी की है?

विचारणीय प्रश्न है!

छोटे व्यापारियों के लिए सरकारी बैंकों से ऋण लेना आज भी एक चुनौती भरा काम है, पर नीरव मोदी या माल्या जैसों को इतनी आसानी से लोन पर लोन किस प्रकार मिल जाता है, बिना किसी ठोस गारंटी के?

Finance Minister Arun Jaitley. (Pic: forbesindia)

सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण से हल होगी समस्या?

भारत के सरकारी बैंकों की खस्ताहालत को देखते हुए एक बार फिर से इनके निजीकरण की मांग उठने लगी है!

एक्सिस बैंक के पूर्व अध्यक्ष पी जे नायक की अध्यक्षता में सन 2014 में बनी एक समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम करने और सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण का सुझाव दिया था.

असल में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चयन में परोक्ष रूप से सरकार का हस्तक्षेप होता है, इसलिए ऐसे बैंकों के उच्च अधिकारी सरकार को खुश रखने के लिए अपने ट्रैक रिकॉर्ड को अच्छा दिखाने की कोशिश करते हैं जिस कारण ये बैंकों के काम पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते.

नतीजतन एनपीए और डूबता ऋण बढ़ता चला जाता है, जो सरकारी बैंकों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगा रहा है.

हालात ये हैं कि सरकारी बैंक सरकार पर बोझ बनते जा रहे हैं!

एक रिपोर्ट की मानें तो पिछले 11 सालों में केंद्र सरकार सार्वजनिक बैंकों को एनपीए से हुए घाटे को भरने के लिए 2.6 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है. ये राशि लगभग श्रीलंका, फिनलेंड और न्यूजीलेंड जैसे देशों की अपनी अलग-अलग जीडीपी के बराबर है!

इससे पहले भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन ने इन बैंकों के अधिकारियों को अनुशासन सिखाने के लिए निजी बैंक अधिकारियों को लाने का एक सुझाव सरकार को दिया था.

PNB Bank Logo. (Pic: qz)

अपना पैसा वापस लेने में ‘सुस्त हैं सरकारी बैंक’

जितनी फुर्ती सरकारी बैंक बड़े खिलाडियों को ऋण बांटने में दिखाते हैं, इसी ऋण को वापस लेने में ये बैंक उससे भी कहीं ज्यादा सुस्ती दिखाते हैं. इसका एक कारण सरकारी बैंकिंग सिस्टम में बेहतर जबावदेही की कमी होना भी है.

सकल एनपीए की रिकवरी या वसूली में सरकारी बैंकों की सुस्ती का अंदाजा दिसंबर 2017 को आई एक आरबीआई की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे ऋण की वसूली में पिछले 12 सालों में लगातार गिरावट हुई है… वहीं मार्च 2017 में तो ये वसूली घटकर अपने निम्नतम स्तर 20.80 प्रतिशत पर पहुंच गई जो सन 2009 में 61.8 प्रतिशत थी.

बैंकों में जान फूंकने की ‘असफल कोशिश’

बैंकों के बढ़ते एनपीए और धोखाधड़ी के कारण सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है, जिस कारण सरकार बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए मजबूर है.

पहले नोटबंदी, फिर बैंकों का विलय और फिर दिवालियापन कानून बना कर, फिर बैंकों को वित्तीय सहायता देकर और अब सरकार बेल इन (Bail-in) पैकेज के द्वारा इन ढीठ बैंकों में जान फूंकने की कोशिश कर रही है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा पिछले साल अगस्त में फाइनेंशियल रिजॉल्यूशन एंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल, 2017 (एफआरडीआई) पेश किया गया था, जिसमें ‘बेल-इन‘ का प्रस्ताव किया गया है.

इसके अनुसार सार्वजनिक बैंकों के पतन या दीवालिया होने की स्थिति में बैंक में जमा आम लोगों के रुपयों से इनकी मदद की जाएगी.

क्यों भाई?

ये क्यों नहीं कहा जाता या फिर ऐसी नीति क्यों नहीं बनायी जाती कि सरकारी बैंक ऐसी स्थितियों से बचे रहें!

वहीं अब तक सरकार सीधे तौर पर बैंक बांड खरीदकर ‘बेल आउट’ द्वारा बैंकों की मदद करती थी.

इसके बाबजूद भी बैंक हैं कि अपनी तरफ से ऐसे ऋण देने में कोई कोताही नहीं बरत रहे…  लिहाजा बैंकों की तनावग्रस्त संपत्तियां बढ़ती जा रही हैं, साथ ही बैंकों का लाभ भी घट रहा है. एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के सबसे बड़े बैंक एसबीआई का शुद्ध लाभ वित्त वर्ष 2017-18 की दूसरी तिमाही के दौरान 38 प्रतिशत घटा था, वहीं बैंक ऑफ बड़ोदा के शुद्ध लाभ में 36 प्रतिशत की कमी आई.

Indian Currency Rs. Two Thousand Note. (Pic: huffingtonpost)

एक अन्य रिपोर्ट की मानें तो बैंकों की बढ़ती पूंजी आवश्यकता को पूरा करने के लिए पूरे बैंकिंग सिस्टम को अगले छह महीने में 2 लाख करोड़ अतिरिक्त पूंजी की जरूरत होगी और कुल मिलाकर इन सभी मांगों का असर सरकार की विभिन्न योजनाओं पर पड़ेगा ही, जिससे विकास के प्रभावित होने की बहुत हद तक संभावना है.

अगले भाग में तकनीकी खामियों और ‘भ्रष्टाचार’ पर नज़र. क्रमशः…

Web Title: India’s Huge Bank Fraud, Everything to Know About Bank Financial Crisis, Hindi Article

Featured Image Credit: dnaindia