‘पिछली रात मैंने एक सपना देखा कि दुनिया के सारे लोग
एक बस में बैठे हैं और हिंदी बोल रहे हैं

फिर वह पीली-सी बस हवा में गायब हो गई
और मेरे पास बच गई, सिर्फ मेरी हिंदी
जो अंतिम सिक्के की तरह हमेशा बच जाती है मेरे पास, हर मुश्किल में’

कुछ ऐसा लिखने वाले केदारनाथ सिंह महज कोई कवि नहीं थे. उन्होंने अपनी कविता के जरिए हर बार समाज की असलियत को बताना चाहा. यूँ तो वह शहर में काफी वक़्त तक रहे, मगर कभी भी उन्होंने अपने गाँव और हिंदी का दामन नहीं छोड़ा.

यूँ तो हिंदी के और भी बहुत से कवि थे, मगर केदारनाथ हिंदी को पढ़ते थे, लिखते थे, उसे जीते थे. शायद यही कारण है कि उनकी कविताओं को पूरी दुनिया में पढ़ा जाता है.

उनकी कविताओं को यूँ पूरी दुनिया जानती है, मगर उनकी अपनी शख्सियत से हर कोई रूबरू नहीं है. अब जब वह हमारे बीच नहीं रहे, ऐसे में उनको नजदीक से जानना सामयिक रहेगा-

गाँव से शुरू हुआ हिंदी प्रेम

वह समय था 7 जुलाई 1934 का, जब उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से गाँव चकिया में केदारनाथ सिंह का जन्म हुआ. वह बहुत ही आम परिवार से ताल्लुक रखते थे. शहर की तेज रफ़्तार जिंदगी से दूर उनके गाँव में जीवन बहुत ही सरल और सीधा था.

गाँव में सभी जमीन से जुड़े थे और हर किसी की ज़बान पर हिंदी होती थी. अपनी जन्म-भूमि से ही उन्होंने अपना हिंदी का सफ़र शुरू किया. बचपन के समय में कभी खेलने में, तो कभी पिता के साथ खेतों में वह अपना समय बिताते थे.

हालांकि, इसके बावजूद भी वह हिंदी पढ़ने और लिखने पर ध्यान जरूर देते थे.

गुज़रते वक़्त के साथ केदारनाथ सिंह का हिंदी की ओर रुझान बढ़ता गया. वह चाहते थे कि वह इसकी गहराइयों तक जा पांए, इसलिए वह अपने गाँव से निकले और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी में एमए करने निकल पड़े.

एमए करने के बाद भी उनके अंदर हिंदी के प्रति लगाव बना रहा, इसलिए उन्होंने पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा और हिंदी में ही पीएचडी भी की. पीएचडी होते ही उन्होंने हिंदी पढ़ने का कारवां ख़त्म किया और फिर शुरू किया हिंदी पढ़ाने का अपना सफर.

केदारनाथ सिंह चाहते थे कि हिंदी भाषा जन जन तक पहुंच पाए. गाँव से निकल कर वह शहर की दौड़ती भागती जिंदगी का एहसास भी लेने आए. हालांकि, यह शहर कभी भी उन्हें गाँव जैसी शांति नहीं दे पाया.

कहीं न कहीं उनकी लिखी बातों में यह जाहिर होता ही रहा है कि कैसे शहर बहुत तेजी से चलता है और गाँव बहुत धीमे. इसकी झलक उनकी कविता ‘बनारस‘ की यह पंक्तियाँ देती हैं:

‘इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है…’

Kedarnath Singh Started His Journey From His Village (Pic: shabdankan)

दिल्ली में रहे मगर बलिया को नहीं भूले

उत्तर प्रदेश के कई कॉलेज में केदारनाथ हिंदी पढ़ाया करते थे. हर कोई उनके इंतज़ार में बैठा रहता था. इसी बीच उन्हें दिल्ली की जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी से हिंदी विभाग में काम करने के मौका मिला.

जीवन में हर चीज का अनुभव लेने के शौक़ीन केदारनाथ इसके बाद तुरंत ही दिल्ली की ओर चल पड़े. दिल्ली उत्तर प्रदेश से बहुत दूर तो नहीं थी, मगर यहाँ कदम रखते ही केदारनाथ ने देखा कि यह तो बिलकुल ही अलग शहर है.

यहाँ लोग अलग हैं, जिंदगी अलग है, जिंदगी जीने का तरीका अलग है.

यहाँ आने के बाद उनके पास महज हिंदी का ही साथ था. इस अकेलेपन ने उन्हें लिखने पर मजबूर कर दिया. वह शब्दों से बयान करना चाहते थे कि आखिर कैसे शहर के शोर में भी उन्हें अपने बलिया की याद आती है.

शायद उन दिनों ही उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘नदी‘ लिखी होगी.

उस कविता में उन्होंने नदी का ज़िक्र तो किया है, मगर कहीं ने कहीं उसमें शहर में रहते हुए गाँव की याद की भी बात है. उनका यह भाव इस कविता की यह चंद पंक्तियाँ जाहिर करती है:

‘कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे-धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!’

यह कहा जा सकता है कि केदारनाथ शहर में रहे तो सही, मगर शहर के हुए नहीं. जीवनयापन के लिए उन्हें अपनी जन्म भूमि छोड़ कर शहर आना पड़ा, मगर दिल्ली को वह कभी भी अपना दिल नहीं दे पाए.

इसमें उनकी भी कोई गलती नहीं थी. बलिया और उनके गाँव का एहसास उनके अंदर इतनी गहराई तक था कि वह चाहकर भी उससे दूर नहीं जा सकते थे. हालांकि, इसके बाद भी उन्होंने दिल्ली नहीं छोड़ा. बल्कि वह तो यहाँ पर हिंदी को और भी ऊँचाईयों पर लेजा रहे थे.

He Was A Poet For Rural Area & People (Pic: duniyaindino)

कई सम्मानों से नवाजे गए

केदारनाथ ने हिंदी में अपनी राचानाएं प्रकाशित करने के सिलसिला 1960 में ही शुरू कर दिया था. उनकी रचनाएं इतनी अद्भुत और खास थीं कि उन्हें सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ने अपनी प्रसिद्ध ‘तीसरा सप्तक’ में प्रकाशित किया था.

माना जाता है कि उस समय अगर तीसरा सप्तक में किसी कवि का नाम आ जाता था तो वह रातों-रात प्रसिद्ध हो जाता था. केदारनाथ के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ. हालांकि, खुद केदारनाथ की रचनाओं में भी इतना दम था कि लोग उन्हें पढ़ने के बाद कभी भूलते नहीं थे.

दिल्ली में आने के बाद तो वह पहले से भी ज्यादा प्रसिद्ध हो गए थे. उन्होंने यहाँ पर अपनी कई बड़ी-बड़ी कविताएँ लिखी. अपनी किताबों का प्रकाशन भी उन्होंने दिल्ली से ही किया.

एक बार जैसे ही लोगों के सामने उनकी लिखी कविताएँ आई तो हर कोई उनका दीवाना हो गया. उनकी सादगी सब के मन को भा गई. इतना ही नहीं उनकी लिखी कई बातों को तो हिंदी के अलावा कई और भाषाओं में भी प्रकाशित किया गया.

देखते ही देखते पूरी दुनिया उनकी लिखीं बातों को पढ़ने में दिलचस्पी दिखाने लगी. हिंदी कविताओं के महारथियों में केदारनाथ सिंह का नाम भी शामिल हो गया.

वक़्त के साथ केदारनाथ बहुत बड़े व्यक्ति बन गए थे. हर कोई उनके नाम के तारीफों के पुल बांधता नहीं थकता था. हालांकि, वहीं दूसरी ओर कहते हैं कि अपने गाँव में वह हमेशा किसी आम व्यक्ति की तरह ही रहे. वहां के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि वह कितने बड़े आदमी बन गए. वह सभी तो उन्हें अपने जैसा ही मानते थे.

गाँव की यही सादगी थी, जिसने केदारनाथ को शहर जाकर भी खोने नहीं दिया. हिंदी के विषय में किए गए कामों के लिए केदारनाथ को कई पुरस्कार भी मिले हैं.

अपने लिखन के लिए उन्हें हिंदी साहित्य का सबसे बाद सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ भी मिल चुका है. यह पुरस्कार पाने वाले वह चुनिंदा हिंदी लेखकों में से एक हैं.

हालांकि, उनका लेखन इतना अच्छा था कि किसी पुरस्कार से उसे नहीं मापा जा सकता.

Kedarnath Has Published Many Hindi Books (Pic: jnanpith)

19 मार्च, 2018 की तारीख हर उस व्यक्ति को ताउम्र याद रहेगी, जिसने हिंदी साहित्य को पढ़ा हो या जो केदारनाथ से अंजान नहीं हो.

आज ही के दिन केदारनाथ सिंह इस दुनिया को अलविदा कह गए.

उनका शरीर तो नष्ट हो गया, मगर उनकी आत्मा आज भी उनकी लिखी कविताओं में जिंदा है, और आगे भी वह ऐसे ही जिंदा रहेगी. उनकी रचनाएं, जब भी कोई पढ़ेगा तो वह जानेगा कि कैसे उन्होंने जीवन को समझा.

कैसे उन्होंने शहर और गाँव में अपनी जिंदगी गुजारी और कैसे वह इतने महान बने.

तो आइए इस लेख का अंत भी उनकी लिखी एक कविता से ही करते हैं, जिसमें उन्होंने ‘अंत’ का ज़िक्र अपने शब्दों में किया है…

‘अंत में मित्रों,
इतना ही कहूंगा
कि अंत महज एक मुहावरा है
जिसे शब्द हमेशा
अपने विस्फोट से उड़ा देते हैं
और बचा रहता है हर बार
वही एक कच्चा-सा
आदिम मिट्टी जैसा ताजा आरंभ
जहां से हर चीज
फिर से शुरू हो सकती है’

Web Title: Kedarnath Singh Great Hindi Poet, Hindi Article

Featured Image Credit: bhadasonline/umeshkschauhan/shabdankan