कर्नाटक विधानसभा चुनाव से महज कुछ महीने पहले सिद्धारमैया सरकार द्वारा लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने का फैसला सुर्खियों में है.

कर्नाटक सरकार जहां इस फैसले को लेकर अपनी पीठ ठोंक रही है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा और अन्य हिंदू संगठनों इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं.

उनका आरोप है कि विधानसभा चुनाव से पहले सिद्दरमैया सरकार पर राजनीतिक लाभ लेने के लिए समाज को बांटने रही है.

ऐसे में यह जानना समायिक रहेगा कि आखिर लिंगायत हैं कौन और उन पर इतना हंगामा क्यों है बरपा-

कौन हैं लिंगायत?

मूर्ति-पूजा की खिलाफत, मृत्यु के बाद शव को जलाने नहीं, दफनाने की परंपरा और कर्म के आधार पर वर्गीकरण, ये लिंगायतों की पहचान है.

12वीं सदी में बासवन्ना ने इस समुदाय की स्थापना की थी. वही बासवन्ना, जिन्हें एक समाज सुधारक के रूप में जाना जाता है. उन्हें भगवान बासवेश्वरा भी कहा जाता है. वह शुरू से ही हिंदुओं में जाति व्यवस्था के खिलाफ थे. उनके हिसाब से इसमें कई कुरीतिया थी, जिस कारण वह हिन्दू धर्म से अलग अपनी एक नई पहचान चाहते थे.

इसके लिए बासवन्ना ने आंदोलन छेड़ा तो उनकी विचारधारा से प्रेरित लोग उनके साथ हो लिए. धीरे-धीरे कारवां बड़ा तो एक अच्छी संख्या में लोग बासवन्ना के साथ हो लिए. इसी क्रम में, जिन लोगों ने बासवन्ना का अनुयायी बनने के लिए अपने धर्म परिवर्तन कर लिया, वह लिंगायत कहे गए. बासवन्ना ऐसा करने वाले सबसे पहले व्यक्ति थे, मतलब सबसे पहले लिंगायत थे.

Lingayat seer Maate Mahadevi (Pic: indiatoday.in)

वीरशैव से कैसे अलग!

लिंगायत को भारतवर्ष के प्राचीनतम धर्म का एक हिस्सा माना जाता है. जोकि, मुख्यत: भगवान शिव की आराधना पर आधारित है. अब चूंकि ‘वीरशैव’ का शाब्दिक मतलब होता है, शिव का परम भक्त. इस लिहाज से आम मान्यता यही है कि लिंगायत और वीरशैव एक ही लोग होते हैं.

जबकि, इस मान्यता से लिंगायत लोग इत्तेफाक नहीं रखते. उनके अनुसार वीरशैव लोगों का वजूद उनके अनुयायी बासवन्ना के उदय से भी पहले से था, ऐसे में वह दोनों एक नहीं हो सकते.

वहीं एक तर्क यह भी दिया जाता है कि लिंगायत हिंदुओं के भगवान शिव की पूजा नहीं करते, वह तो सिर्फ अपने शरीर पर इष्टलिंग धारण करते हैं, जोकि अंडाकार आकृति के होते हैं. वह उन्हें धागे की मदद से धारण करते हैं.

जबकि, ‘वीरशैव’ भगवान शिव की अराधना करते हैं.

Separate Religion tag for Lingayats (Pic: Scroll.in)

राजनीति में सक्रियता

राजनीति में लिंगायत की सक्रियता बेहद ही दिलचस्प रही. गजब की बात तो यह है कि लिंगायत समुदाय के लोग समय-समय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के साथ खड़े नज़र आए.

उन्हें जिस भी दल से अपनी बेहतरी की आस मालूम पड़ती है, वह उसकी तरफ हो जाते हैं. सबसे पहले उन्होंने रामकृष्ण हेगड़े को अपना समर्थन दिया था. हेगड़े उन दिनों कर्नाटक में जनता दल की अगुवाई कर रहे थे.

लिंगायत हेगड़े से खासे प्रभावित थे, किन्तु वह राज्य में स्थाई सरकार देने में विफल हुए, इसलिए 1989 में उनका जनता दल से मोह भंग हो गया और वह  कांग्रेस के खेमे में चले गए. इसका फायदा कांग्रेस को मिला और वह उनके समर्थन से सरकार बनाने में कामयाब रही.

कांग्रेस की तरफ से बतौर मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल ने शपथ ली. सबकुछ ठीक चल रहा था, तभी वक्त ने एक बार फिर से करवट ली और कुछ कारणों से पाटिल को उनके पद से हटा दिया गया. इससे नाराज होकर लिंगायत एक बार फिर से हेगड़े के साथ हो लिए.

यहां तक कि हेगड़े ने जनता दल से अलग होकर जनता दल यूनाइटेड का दामन थामा, तब भी लिंगायत उनके साथ ही खड़े रहे. कहा तो यहां तक जाता है कि हेगड़े के प्रभाव की वजह से ही लोकसभा चुनावों में लिंगायतों के वोट भारतीय जनता पार्टी को मिले थे. इस लिहाज से केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनाने में भी लिंगायतों की भूमिका रही.

बाद में हेगड़े का निधन हुआ तो लगा कि लिंगायत कांग्रेस के पाले में जा सकते हैं, किन्तु बीजेपी ने येदियुरप्पा को कर्नाटक की कमान दे दी. 2008 में वे राज्य के मुख्यमंत्री बने. इसका उसे फायदा मिला और वह लिंगायतों को अपने पास रखने में कामयाब रहे.

बाद में येदियुरप्पा मुख्यंत्री पद से हटाए गए तो लिंगायत भाजपा से खासे नाराज हो गए. साथ ही उन्होंने 2013 के आम चुनावो में उससे किनारा कर लिया.

नतीजा यह रहा कि भाजपा को हार का सामना देख पड़ा था.

Ramakrishna Hegde During a Speech (Pic: BBC)

…इसलिए हैं महत्वपूर्ण

अब चूंकि एक बार फिर से चुनाव अपनी दहलीज पर है, इसलिए भाजपा ने येद्दुरप्पा को एक बार फिर से अपना नेता चुना.

अब चूंकि, येद्दुरप्पा लिंगायतों की पंसद रहे है, ऐसे में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर सिद्दरमैया ने अपना मास्टर स्ट्रोक चल दिया है.

बताते चलें कि वर्तमान में लिंगायत को कर्नाटक की अगड़ी जातियों में गिना जाता है. वहां के करीब 18 फीसदी लोग लिंगायत समाज से आते हैं. महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की संख्या अच्छी ख़ासी है.

ऐसे में यह किसी भी दल को सत्ता तक पहुंचाने का दम रखते है.

BS Yeddyurappa and Siddaramiah (Pic: India Today)

बहरहाल, वह किसकी तरफ खडे़ नज़र आते हैं कुछ भी नहीं कहा जा सकता.

हां एक बात तो तय है कि वह जिसकी ओर खडे़ हो जाएंगे, वह मजबूत स्थिति में जरूर रहेगा! शायद यही कारण है कि उनको अपने खेमे में करने की कवायद जारी है और मौजूदा प्रकरण इसी क्रम में कांग्रेस की एक कोशिश!

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Web Title: Lingayat Community and His Importance, Hindi Article

Feature Image Credit: Prajavani