बॉलीवुड के अब तक के इतिहास को अगर उठाकर देखा जाए तो राजेश खन्ना का नाम अलग से दिखाई पड़ता है. उन्होंने एक के बाद एक हिट फ़िल्में दीं और सुपरस्टार कहलाए. लोग उन्हें प्यार से काका कहते थे और एक समय तो पूरा देश उनका दीवाना था.

कहा जाता है कि लड़कियां उनके लिए पागल थीं. उनकी एक झलक पाने के लिए, वे घन्टों लाइन लगाती थीं और अगर उनकी झलक नहीं मिलती थी, तो वे राजेश की गाड़ी को ही चूम लिया करती थीं. वे राजेश को अपने खून से ख़त लिखती थीं और उनकी फोटो से शादी कर लेती थीं.लेकिन क्या आपको मालूम है कि इतना चाहे जाने के बाद भी राजेश खन्ना को कभी भी संतुष्टि नहीं मिली. अपने जीवन के दूसरे भाग में वे भीतर ही भीतर जलते रहे और अंत में अकेलेपन की मौत मर गए. आईए जानते हैं…

टैलेंट प्रतियोगिता जीतकर बॉलीवुड में आए

राजेश खन्ना का जन्म 1942 में अमृतसर में हुआ था. उनके बचपन का नाम जतिन खन्ना था. राजेश के मां-बाप ने उन्हें गोद लिया था. जल्द ही उनके मां-बाप मुंबई आ गए.यहाँ उन्होंने अपने दोस्त रवि कपूर के साथ कॉलेज जाना शुरू किया. यही रवि कपूर आगे अभिनेता जीतेन्द्र के नाम से मशहूर हुए. कॉलेज के दिनों में राजेश नाटकों में भाग लिया करते थे. उन्हें यहाँ पर अमजद खान का साथ मिला था. इस दौरान दोनों ने मिलकर बहुत सारे पुरस्कार अपने नाम किए.

यह वर्ष 1965 था, जब फिल्मफेयर की तरफ से आल इंडिया टैलेंट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. राजेश इस प्रतियोगिता के विजेता बनकर उभरे थे. यहीं से सिनेमा की दुनिया के दरवाजे उनके लिए खुल गए.अगले वर्ष उन्होंने चेतन आनंद की फिल्म ‘आखिरी खत’ में काम किया. इसके बाद उन्होंने ‘राज’ फिल्म में काम किया. लेकिन ये दोनों फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाईं. राजेश को सुपरस्टार का दर्जा हासिल करने के लिए अभी इन्तजार करना था.

1967 में फिल्म ‘बहारों के सपने’ रिलीज की गई. इस फिल्म के लिए राजेश को बहुत सराहा गया. इसके बाद राजेश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने एक के बाद एक हिट फ़िल्में दीं. इनमें ख़ामोशी, औरत और आराधना प्रमुख थीं. इन फिल्मों ने राजेश को रातों-रात स्टार बना दिया.इस दौरान राजेश ने शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, हेमा मालिनी और मुमताज जैसी हसीन और जहीन अभिनेत्रियों के साथ काम किया.

कहा जाता है कि राजेश खन्ना को सुपरस्टार बनाने में संवादों से अधिक संगीत और फिल्म की कहानी का योगदान था. अब अगर हम फिल्म आराधना की ही बात करें तो इसमें ऐसे कोई ख़ास संवाद नहीं हैं, जो लोगों की जुबान पर चढ़ गए हों. लेकिन इसका प्लाट और संगीत जबरदस्त है. इस फिल्म के गानों, ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’ और ‘रूप तेरा मस्ताना’ खासे लोकप्रिय हुए. आर. डी बर्मन और किशोर कुमार ने उनके लिए सबसे बेहतरीन संगीत को जन्म दिया.

A Feature Picture Of Rajesh Khanna (Pic: YuppFlix)

साठ के दशक में बने 'सुपरस्टार'

1969 से लेकर 1971 तक राजेश खन्ना ने लगातार पंद्रह हिट फ़िल्में दीं. यह एक ऐसा रिकॉर्ड है कि अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार भी इसे तोड़ नहीं पाए हैं. हम कह सकते हैं कि क्रिकेट में जैसे सचिन के रिकार्डों को तोड़ना असंभव नजर आता है, वैसे ही राजेश के इस रिकॉर्ड को तोड़ना आगे आने वाले किसी भी सुपरस्टार के लिए मुश्किल होने वाला है.साठ से सत्तर का दशक राजेश के लिए स्वर्णकाल रहा. इस दशक में उन्होंने खुद को रोमांस और ट्रेजेडी के बेताज बादशाह के रूप में स्थापित कर लिया.

इस दौरान उन्होंने ‘कटी पतंग’, ‘आन मिलो सजना’, ‘आनंद’, ‘मर्यादा’ और ‘नमक हराम’ जैसी ब्लॉकबस्टर फ़िल्में कीं.इसी दौरान उनकी व्यक्तिगत जिंदगी में भी बहुत कुछ घटा. उनकी व्यक्तिगत जिन्दगी भी किसी फिल्म की कहानी सरीखी ही रही. अपने करियर के शुरूआती दौर में वे अभिनेत्री अंजू महेन्द्रू के साथ लिव इन में रहे. 1973 में दोनों का साथ छूटा तो राजेश ने डिम्पल कपाड़िया से शादी कर ली. डिम्पल उस समय उनसे सोलह साल छोटी थीं.

वे डिम्पल के साथ अगले ग्यारह वर्षों तक रहे. 1984 में दोनों का साथ छूट गया. हालाँकि, दोनों ने कभी भी तलाक नहीं लिया. इस बीच मुमताज़ और टीना मुनीम के साथ उनके अफेयर की खबरें आती रहीं.

जब, फीकी पड़ने लगी चमक

जैसा कि प्रकृति का नियम है कि सूर्य अगर चढ़ता है, तो ढलता भी है. ठीक ऐसा राजेश के साथ भी हुआ. 1975 के बाद से उनकी चमक फीकी पड़ने लगी. इसको राजेश पचा नहीं पाए. असल में सत्तर के दशक में देश में आर्थिक संकट बहुत बढ़ गया था. इस समय आम लोगों में बहुत गुस्सा था. इस गुस्से को कला के माध्यम से पर्दे पर उतारने के लिए ‘एंग्री यंग मैन’ प्रारूप की फ़िल्में बनने लगीं थीं. जबकि राजेश की छवि एक रोमांटिक हीरो की थी, इसलिए वे इन फिल्मों में फिट नहीं बैठते थे.

इसी कारण उनका स्टारडम फीका पड़ने लगा था. इस समय जंजीर फिल्म आई थी. इस फिल्म के साथ बॉलीवुड को अमिताभ बच्चन के रूप में नया सुपरस्टार मिला था. इस प्रकार की फिल्मों में अमिताभ ‘वन मैन आर्मी’ के रूप में नजर आते थे. वे अपने चेहरे पर गुस्सा लपेटकर व्यवस्था से लड़ते रहते थे. गुस्से से भरे लोगों को उनका यह अवतार बहुत पसंद आता था.यहाँ से राजेश को समझ आने लगा था कि अब उनका समय समाप्त हो चुका है.

लेकिन अपने स्टारडम को यूँ ख़त्म होते देखना उनके लिए बिलकुल भी आसान नहीं था. लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. इस कारण वे अंदर ही अंदर घुटने लगे और नशे को अपना सहारा बना लिया. बाद में उन्होंने राजनीति में कदम रखा. वे कांग्रेस की तरफ से 1992 में नई दिल्ली लोकसभा से सांसद चुने गए. लेकिन यहाँ भी उनका मन नहीं लगा. उनके स्टारडम का हैंगोवर अभी भी उन्हें सता रहा था. वे बेचैन रहते थे. वे चाहते थे कि अपना खोया हुआ स्टारडम वापस से पा लें और एक सुपरस्टार के रूप में ही जीवन त्यागें.

लेकिन ऐसा हो न सका. उन्होंने पर्दे पर वापस आने के लिए बेइंतेहा प्रयास किए, लेकिन सब बेकार गए. उनके अंदर इतनी बेचैनी थी कि वे ‘बिग बॉस’ में भी जाने को तैयार हो गए थे, लेकिन अंतिम समय ने अक्षय कुमार ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया.

Rajesh Khanna With Akshay Kumar (Pic: Bollywood)

लोग आज भले कुछ भी कहें, लेकिन राजेश खन्ना ने भारतीय सिनेमा को जो दिया है, वह अमूल्य है. ऐसे अदाकार सदियों में बस एक या दो बार ही पैदा होते हैं. उनकी फिल्म आनंद में जब वे मर रहे होते हैं, तो अमिताभ बच्चन एक संवाद बोलते हैं, ‘ मौत एक कविता है, मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.’

इसी संवाद की तर्ज पर राजेश खन्ना ने 18 जुलाई 2013 के दिन हम सबको हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. मृत्यु के बाद उन्हें पद्मभूषण पुरस्कार से नवाजा गया. 

Web Title: Rajesh Khanna: The Superstar Who Could Not Make It Up With Stardom, Hindi Article

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