अटका कहां स्वराज, बोल दिल्ली तू क्या कहती है?

तू रानी बन गई, वेदना जनता क्यों सहती है.

प्रस्तुत पंक्तियाँ भारत के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की हैं. ये पंक्तियाँ उन्होंने आजादी मिलने के सात वर्षों के बाद लिखी थीं. इनका आशय यह था कि देश ने गोरों से तो आजादी पा ली है, लेकिन इससे आम जनता की हालत नहीं बदली है. इन पंक्तियों से साफ पता चलता है कि इनको रचने वाले कवि के ह्रदय में आम जनता के लिए अगाध प्रेम भरा हुआ था. इस हिसाब से दिनकर एक जनकवि थे.

दिनकर अपनी कविताओं में वीर और श्रृंगार दोनों प्रकार के रसों का प्रयोग के लिए जाने जाते हैं. उनकी कविताओं में एक वैचारिक गहरापन है. उनकी कवितायेँ आदर्शवादी और सत्य के लिए पक्षपाती रही हैं.

आज जब देश की जनता मंहगाई, बेरोजगारी और साम्प्रदायिक उन्माद के फंदों में फंसी हुई है, ऐसे में दिनकर और उनकी कविताओं के बारे में जानना प्रासंगिक होगा.  

पंद्रह किलोमीटर पैदल जाते थे पढ़ने

कवि और क्रांतिकारी अलग तरह के लोग होते हैं. वे समाज की खोई हुई लय को खोज लेते हैं और उसे पुनर्स्थापित करने के लिए अपना सर्वस्व तक न्योछावर कर देते हैं. इसके बदले में जनसामान्य उन्हें अपने ह्रदय में स्थान देता है.बिहार की धरती से निकलकर सम्पूर्ण हिन्दुस्तान के आकाश में छा जाने वाले दिनकर एक ऐसे ही कवि थे.

उनका जन्म 23 सितंबर 1908 के दिन बिहार के सिमरिया में हुआ था. उनके पिता एक साधारण किसान और मां गृहणी थीं. दिनकर जब मात्र 2 वर्ष के थे, तब उनके पिता का देहावसान हो गया. परिवार पर तो जैसे मुसीबतों का आसमान टूट पड़ा. घर की आर्थिक हालत माली थी.

ऐसे में खेती से दिनकर के दो भाई और मां जैसे-तैसे अपना पेट भरते थे. दिनकर का मन पढ़ाई में लगता था, सो दोनों भाइयों ने खुद पढ़ना कबूल न करके दिनकर को पढ़ाई करने भेजा.

सिमरिया से चार किलोमीटर दूर स्थित एक राष्ट्रीय विद्यालय से दिनकर ने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की और हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए घर से पंद्रह किलोमीटर दूर मोकामाघाट हाईस्कूल में दाखिला ले लिया.

इस पंद्रह किलोमीटर की यात्रा में रोज उन्हें गंगा को पार करना पड़ता था. कहा जाता है कि गंगा की वेगवान लहरों ने ही उनके भीतर के कवि को जन्म दिया. हाईस्कूल की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई के लिए पटना कॉलेज में दाखिला लिया. यहाँ से उन्होंने चार सालों में बी.ए की परीक्षा पास की.

इस समय तक देश में स्वतंत्रता आन्दोलन तेज़ हो गया था. गांधी जी के आह्वाहन पर सम्पूर्ण देश की जनता आजादी की मांग कर रही थी. दिनकर भी आजादी के इस महासंग्राम में शामिल होना चाहते थे. लेकिन घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी और उनकी मां चाहती थीं कि दिनकर सरकारी नौकरी कर लें. युवा दिनकर के लिए यह घोर द्वन्द का समय था.

अंत में उन्होंने नौकरी करने का फैसला लिया और बरबीघा के एक स्कूल में हेडमास्टर के तौर पर पढ़ाने लगे. जल्द ही उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और 1934 में बिहार सरकार के अंतर्गत सब रजिस्ट्रार के तौर पर काम करने लगे.

A Feature Image Of Dinkar (Pic: News18)

चार साल में हुए बाईस तबादले

इस बीच के पूरे समय में दिनकर के भीतर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आग धधकती रही और उन्होंने अनेक कवितायें रचीं. इनमें ‘विजय गीत’ नाम के शीर्षक से छपे दस गीत और ‘हिमालय’ कविता ने उन्हें प्रसिद्धि दिला दी.

खैर, कहानी आगे बढ़ी तो दिनकर ने सरकारी नौकरी पर रहते हुए क्रांतिकारी कवितायें रचना जारी रखा. 1935 में उनका पहला कविता संग्रह ‘रेणुका’ प्रकाशित हुआ. इस संग्रह ने देश में क्रांति की ज्वाला भड़का दी और अंग्रेजी हुकूमत के कान खड़े कर दिए.

परिणामस्वरूप हुकूमत ने उन्हें चेतावनी देनी शुरू कर दीं. लेकिन इसके बाद भी दिनकर विद्रोही कवितायें लिखते रहे. उधर दूसरी तरफ उनके कंधो के ऊपर परिवार चलाने का दायित्व भी बढ़ता जा रहा था. अब दिनकर खुद से ही लड़ रहे थे. इसलिए उन्होंने सरकारी प्रताड़ना सहते हुए कवितायें रचना चालू रखा. परिणाम यह हुआ कि चार साल के भीतर उनके 22 तबादले हुए.

दूसरे विश्वयुद्ध के आते-आते दिनकर के कई कविता संग्रह आ गए थे. इनमें ‘हुंकार’, ‘रसवंती’ और ‘कलिंग-विजय’ प्रमुख थे. इन सबमें अंग्रेजी सरकार के खिलाफ कूट-कूटकर विद्रोह भरा था. अंग्रेजी सरकार को यह फूटी आँखों न सुहाया और अंत में दिनकर ने सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया. तब तक द्वितीय विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया था.

सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद दिनकर बतौर पत्रकार ‘योगी’ पत्रिका से जुड़ गए. इस समय तक आजादी का उगता हुआ सूर्य धुंधले आकाश पर दिखने लगा था. 1947 में देश को आजादी मिली और आजादी के साथ आई बंटवारे की त्रासदी. इसे देखकर दिनकर टूट गए और उन्होंने लिखा-

‘नारी-नर जलते साथ-साथ/ जलते हैं मांस-रूधिर अपने/ जलती है वर्षों की उमंग/ जलते हैं सदियों के सपने’

इसी समय उन्होंने आजादी का जश्न भी मनाया. उन्होंने ‘जनतंत्र’ नाम की कविता रची. यह कुछ इस प्रकार है.

‘सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी/ मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है/फावड़े और हल राजदंड बनने को हैं/ धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है/ दो-राह, समय का घर्घर नाद सुनो/ सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’

Dinkar During A Meeting (Pic: Antiserious)

आजादी के बाद सामाजिक सरोकार की कविताएं रचीं

आजादी के बाद देश के सामने भुखमरी, बेरोजगारी और साम्प्रदायिक उन्माद की समस्याएं मुंह बाए खड़ी थीं. ऐसे में दिनकर ने इस दृश्य को देखकर ‘समर शेष है’ नाम की कविता लिखी. इस कविता ने सत्ताधारियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर आजादी के बाद भी देश को इन समस्यायों से छुटकारा नहीं मिल पाया है, तो आजादी का क्या फायदा.

दिनकर को यह भलीभांति पता था कि भारतीय समाज में दलितों को सदियों तक दबाया गया है. वे उनकी व्यथा समझते थे. इसी व्यथा को उन्होंने अपने काव्य संग्रह ‘रश्मिरथी’ के माध्यम से व्यक्त किया.

1952 में वे कोंग्रेस के टिकट पर राज्यसभा में पहुंचे. वे राजनीति में तो आ गए, लेकिन उनका मन यहाँ कभी लगा नहीं. लुटियंस दिल्ली की रेशमी चमक-धमक उन्हें हमेशा काटती रही. और उन्होंने कविता लिखी-

‘भारत धुल से भरा, आंसुओं से गीला/ भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में/दिल्ली में है खूब रोशनी की चहल-पहल/ लेकिन भटक रहा है सारा देश अँधेरे में’

समय आगे बढ़ा तो चीन के साथ भारत का युद्ध छिड गया. इस युद्ध में भारत को पराजय झेलनी पड़ी. दिनकर ने इसके लिए पूरी तरह से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु को जिम्मेदार ठहराया.

इस समय तक आते-आते दिनकर का मन राजनीति से भर गया और उन्होंने राज्यसभा से स्तीफा दे दिया. इस्तीफ़ा देने के बाद वे घर लौट आए और भागलपुर विश्वविद्यालय में कुलपति बना दी गए. अब दिनकर बहुत अकेले हो गए थे और उनका लिखना बंद हो गया. ऊपर से भागलपुर विश्वविद्यालय में हो रही राजनीति भी उन्हें रास नहीं आ रही थी.

उन्होंने नौकरी छोड़ दी. इधर उनके बड़े बेटे का भी लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. घर की आर्थिक हालत खराब हो थी और दिनकर के कंधों पर पूरे परिवार का बोझ आ गया था. दिनकर अकेले पड़ गए थे और धीरे-धीरे अवसाद में जाने लगे थे. 

Dinkar In Delhi (Pic: AAJ TAK)

सन 1971 में दिनकर को लकवे का झटका आया. लंबे इलाज के बाद वे ठीक हुए. लेकिन अब उनका मन पूरी तरह से भर चुका था. उन्हें अब यह देश रहने लायक नहीं लग रहा था. इसलिए वे मृत्यु मांगने तिरुपति चले गए. तिरुपति में उन्होंने 'रश्मिरथी' का पाठ किया. पाठ करने के दौरान उनकी आँखों से लगातार आंसू बहते रहे. उसी रात को उनके सीने में दर्द हुआ और दिनकर हमेशा-हमेशा के लिए चले गए. 

Web Title: Ramdhari Singh Dinkar, The Poet Of Common People, Hindi Article

Feature Image Credit:  Hindi