‘कभी-कभी दशकों तक कुछ नहीं हो पाता और कभी-कभी हफ़्तों में दशकों का काम हो जाता है’. ये हम नहीं कह रहे, ये कहना है रूसी क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले साम्यवादी सोच के पुरोधा व्लादिमीर लेनिन का.

लेनिन ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके विचारों का प्रभाव इतनी दूर तक और इतने सालों बाद भी बना रहेगा.

बात इसी महीने की 6 तारीख की है, जब ऐसा ही कुछ मंजर देखने को मिला. जग जाहिर है कि किस तरह त्रिपुरा के बेलोनिया शहर के कॉलेज स्क्वायर पर लगी व्लादिमीर लेनिन की एक 5 फीट ऊंची प्रतिमा को गिरा दिया गया.

ऐसे में बहुत से लोगों में यह जानने की उत्सुकता अवश्य होगी कि आखिर ये कौन शख्स है, जिसको लेकर तमाम तरह का राजनीतिक द्वंद्व भारत में पिछले कुछ दिनों से हो रहा है.

तो आईए व्लादिमीर लेनिन के बारे में वह सब जाने की कोशिश करते हैं, जिनकी तस्वीरें धुंधली-धुंधली सी हैं–

जार शासन का अंत और…

वो व्लादिमीर लेनिन ही था, जिसने रूस में जार निकोलस द्वितीय की एकमेव तानाशाही को खत्म किया और 15 देशों को एकजुट कर सोवियत संघ की स्थापना की. सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ (यूएसएसआर) के बनने की शुरूआत 1917 में बोल्शेविक क्रांति से हुई और इसे सन 1922 में लेनिन ने अपना एकछत्र राज कायम कर पूरा किया.

22 अप्रैल 1870 को जन्मे व्लादिमीर लेनिन रूसी साम्यवादी पार्टी का संस्थापक, बोल्शेविक क्रांति का प्रमुख नेता, सोवियत संघ का पहला प्रमुख रहा. लेनिन का शुरूआती नाम व्लादिमीर इलिच उल्यानोवा था, लेकिन सन 1901 में साइबेरिया में अपने तीन साल के प्रवास के दौरान वहां की लेना नदी के नाम पर उसने अपना उपनाम बदलकर लेनिन कर लिया.

Zar Nicolás II. (Pic: ihmc)

मार्क्स के विचारों ने बदला

एक पढ़े-लिखे परिवार में पैदा हुए लेनिन भी उत्कृष्ट किस्म के छात्र थे, लिहाजा इन्होंने आगे काजान विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की. हालांकि, कुछ ही समय बाद ये अपने उग्र राजनीतिक विचारों के कारण विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिए गए.

सन 1887 से 1888 के दौरान विवि से इस निष्कासन के दौरान ही ये कार्ल मार्क्स की विचारधारा से प्रभावित हुए और खुद को मार्क्सवादी मानने लगे. कहते हैं जब लेनिन अपनी उम्र के 17वें पड़ाव पर पहुंचे, तब ज़ार अलेक्जेंडर तृतीय की हत्या करने की साजिश रचने के आरोप में इनके बड़े भाई को फांसी पर लटका दिया गया.

जाहिर तौर पर इस घटना से आहत और दुखी लेनिन के ऊपर इसका प्रभाव पड़ना ही था. लिहाजा इनके अंदर जार सरकार के खिलाफ विचार उमड़ने लगे और लेनिन ने अपने विरोध के स्वर में क्रांति का आगाज करना शुरू कर दिया.

Marxism–Leninism. (Pic: wikipedia)

रूस से किया गया निष्कासित

लेनिन ने 1891 में अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की और वापस सेंट पिटर्सबर्ग आकर ये पूरी तरह से एक क्रांतिकारी बन गए. यहां लेनिन मार्क्सवादी सोच के संघ में शामिल हो गए और 1895 में मजदूर वर्ग की मुक्ति के लिए संघर्ष संघ बनाने में अपनी मदद दी, लेकिन कुछ समय बाद इन्हें गिरफ्तार कर 3 साल के लिए निष्कासित कर साइबेरिया भेज दिया गया. वहां इन्होंने नादेजदा नामक महिला से शादी कर ली.

इसके कुछ समय बाद तक ये अपने क्रांतिकारी विचारों की पोटली लेकर साइबेरिया और पश्चिमी यूरोप में भटकते रहे. इसी प्रवास के दौरान इन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रांति आंदोलन में भाग लिया और रूसी सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर पार्टी के बोल्शेविक गुट के नेता बन गए.

अपने यूरोप प्रवास के दौरान म्यूनिख में लेनिन ने रूसी क्रांति में मार्क्सवादी विचारधारा की अलख जगाने के लिए कुछ और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर इस्करा अखबार की शुरूआत की. वहीं सन 1903 में रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी की दूसरी कांग्रेस के दौरान पहली बार लेनिन ने अपने क्रांतिकारी विचारों को जगजाहिर किया.

साथ ही कहा, “हमें क्रांतिकारियों का एक संगठन दीजिए, हम इससे रूस की सरकार को उखाड़ फैंकेंगे!”

रूसी क्रांति का नया नायक

लेबर पार्टी दूसरी कांग्रेस के बाद से ही विचारों में मतभेद होने के कारण दो गुट में बंट गई. एक गुट लेनिन के समर्थन में था, जिसे बोल्शेविक कहा गया. इसके समर्थन में थोड़े ही लोग थे, लेकिन विचार मजबूत थे इसलिए 1912 की पराग्वे पार्टी कांफ्रेंस के दौरान लेनिन ने अपनी अलग इकाई बनाने की घोषणा कर दी.

इसके बाद इन्हें फिर से निष्कासित कर दिया गया और इस बार इन्होंने अपना ठिकाना स्विट्जरलेंड को बनाया. यहां लेनिन ने पूंजीवाद के ऊपर अपनी महत्वपूर्ण रचना लिखी, जिसमें इन्होंने युद्ध को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद का प्राकृतिक प्रतिफल बताया.

सन 1917 में रूसी क्रांति के दौरान लेनिन रूस लौट आए और उन्होंने सैनिकों, किसानों और श्रमिकों के द्वारा नियंत्रित सरकार बनाने का आह्वान किया. अभी रूस पहले विश्व युद्ध के नुक्सान से उबरा भी नहीं था कि वहां फिर से एक और युद्ध शुरू हो गया.

3 साल तक रूस गृह युद्ध की आग में जलता रहा और आखिरकार वो समय आ गया, जिसका लेनिन सालों से इंतजार कर रहे थे. रूस की राजनीतिक गद्दी को हासिल करने के लिए पूरी ताकत और सभी प्रकार के हथकंडे अपनाने के बाद विपक्ष को उखाड़ फैंक बोल्शेविक गुट रूस को जीत चुका था.

Vladimir Ilyich Ulyanov addresses soldiers in Red Square. (Pic: irishtimes)

बोल्शेविक क्रांति का लाल आतंक

लेनिन अपने विरोधियों को किसी भी कीमत पर कुचल देना चाहता था. इसका एक नमूना वह बोल्शेविक क्रांति के दौरान पेश कर चुके थे और सत्ता हथियाने के बाद भी वह ऐसा करने से चूकने वाले नहीं थे.

15 अन्य देशों को मिलाकर यूएसएसआर का निर्माण और वहां विरोधियों की लाशों के ढेर पर विश्व की पहली साम्यवादी सरकार का निर्माण करके लेनिन अपने इरादे जता चुके थे.

लेनिन की ओर से रूस की सुरक्षा एजेंसियों ने उनके विरोधी हजारों लोगों को मौत के घाट उतारा.

साम्यवाद, किसान, मजदूर का नारा और पूंजीवाद की धुर विरोधी सोच वाली बोल्शेविकों की सरकार बनते ही रूस में खूनी खेल शुरू हो गया. अब तक लेनिन एक क्रूर और निर्दयी नेता बन चुका था, जो कोई उसकी सरकार के खिलाफ बोलता उसकी हत्या कर दी जाती.

कहते हैं कि उसने जर्मनी के तानाशाह हिटलर की तरह से अपनी सेना को मजबूत करने का काम किया, जिसमें नौजवानों और कृषकों को जबरन भर्ती किया गया. किसानों से उनकी फसलों और अनाजों को देश के नाम पर सेना का पेट भरने के लिए छीन लिया गया.

इससे एक बड़ी तादाद में रूसी लोग भूख के मारे मरने लगे और रूस की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई.

लाल आतंक की शुरूआत रूसी क्रांति के साथ ही सन 1917 से हुई और ये तब तक चला जब तक कि बोल्शेविकों के विरोध में उठने वाली हर एक आवाज को दबा नहीं दिया गया.

लाल सेना के साथ ही लेनिन की सरकार से समर्थन प्राप्त बोल्शेविकों की एक गुप्त पुलिस ‘चेका‘ द्वारा इस कार्य को अंजाम दिया गया. लेनिन ने 9 अगस्त 1918 को सार्वजनिक रूप से 100 विरोधियों को फांसी देने का हक्म दे दिया.

इसके कुछ महीनों बाद चेका पुलिस ने सोशल रिवॉल्यूशनरी पार्टी के 800 सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया और हजारों को मजदूरी केंपों में भेज दिया गया.

सन 1920 तक लाल आतंक का एक और भयावह रूप देखने को मिला, चेका में लगभग 2 लाख बोल्शेविक भर्ती हो गए, जिन्होंने विरोधियों का सामूहिक नरसंहार किया. उन्हें प्रताड़ित किया गया और खुलेआम फांसी पर लटकाया गया.

असल में चेका को खुली छुट दी गई थी. ऐसा लगता था जैसे रूस में जगली शासन है और लाल आतंक भूखे भेड़ियों की तरह से वहां के लोगों को खा रहा था.

Russian Revolution. (Pic: wellesley)

आधुनिक काल की पहली ममी

सन 1918 में लेनिन को मारने की एक असफल कोशिश की गई. उसको गोली मारी गई, लेकिन वह बच निकला. हालांकि, अब पहले कमजोर जरूर हो गया था. सन 1922 के बाद इसकी हालत मरने जैसी हो चुकी थी. आधा शरीर लकवाग्रस्त हो चुका था, लेकिन सांसे जारी थीं.

आखिरकार 21 जनवरी 1924 को इसकी सांसों ने इसके शरीर का साथ छोड़ दिया.

व्लादिमीर लेनिन शायद आधुनिक दुनिया की पहली ऐसी शख्सियत है, जिसको मरने के बाद भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया. लेनिन की मौत से पहले ही सन 1923 में उनके शव को संरक्षित करने के लिए बैठक हो चुकी थी. इसमें जोसेफ स्टालिन ने प्रस्ताव दिया कि उनका शव आने वाली पीढ़ी के दर्शन के लिए जीवंत रखा जाए.

इसके लिए प्रयास शुरू किए गए. हजारों साल पहले मिस्र में ममी को संरक्षित करने के बारे में लोगों को जानकारी थी, लेकिन आज के समय में ये एक चुनौती भरा काम था.

हालांकि, इनके शरीर को ममी बना दिया गया. साथ ही इसके पूरे तरीके को राज ही रखा गया है, फिर भी कुछ वैज्ञानिकों का दावा है कि इनके शरीर को अंदर से खोखला कर नसों से सारा खून निकालकर उसमें कुछ विशेष प्रकार का तरल पदार्थ भरा गया है, ताकि शरीर देखने में बिल्कुल जीवंत लगे.

आज मॉस्को इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों द्वारा लेनिन की ममी की देखभाल की जाती है. वहीं लेनिन का ममी बन चुका शरीर मॉस्को के लाल चौक पर बने मकबरे में देखा जा सकता है.

Mummified body of Vladimir Lenin in the mausoleum in Moscow. (Pic: cont)

मूर्ति तोड़ने का सिलसिला

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि कभी यूएसएसआर का हिस्सा रहे यूक्रेन में अगस्त 2017 तक लेनिन की लगभग 500 मूर्तियों को तोड़ दिया गया, वहीं जर्मनी ने भी लेनिन को एक तानाशाह करार देते हुए उसकी मूर्ति को गिरा दिया.

इसके अलावा रोमानिया, हंगरी, लातविया, पोलैंड, इथियोपिया और खुद रूस में लगी लेनिन की कई मूर्तियों को गिरा दिया गया है. इस बात में कोई शक नहीं कि व्लादिमीर लेनिन ने बोल्शेविक क्रांति के दम पर किसानों, कृषकों, मजदूरों और गरीबों की लाशों के ढेर के ऊपर अपनी साम्यवादी सरकार बनाई थी, उसके हाथ मासूम लोगों के खून से रंगे हुए थे.

उसका मुख्य मकसद राजनीतिक द्वंद्व में सबसे ऊपर वाले स्थान पर अपने आपको प्रतिष्ठित करना था. चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े और उसने ऐसा किया भी.

Demolition of statue of Vladimir Lenin in Ethiopia. (Pic: ibtimes)

सत्ता की भूख में लेनिन एक ऐसा नेता बनकर उभरा, जिसने रूस की एक तानाशाही को खत्म करने के लिए खुद को एक क्रूर तानाशाह बना लिया. बावजूद इसके उसको लेकर लोगों में जो दीवानगी देखने को मिलती है, वह देखने लायक है.

Web Title: Vladimir Lenin: A Russian dictator with blood on his hands, Hindi Article

Featured Image Credit: The Charnel-House