आईफोन तेजी से बदलते डिजिटल वर्ल्ड का ऐसा गैजेट बन चुका है, जिसको पाने की चाह कईयों की होती है. आपके आसपास कई सारे ऐसे लोग होंगे, जिन्हें आईफोन के अलावा कोई दूसरा फोन समझ ही नहीं आता होगा. गजब तो तब लगता है कि यह लोग आईफोन के लेटेस्ट वर्जन के लिए अपनी जमा पूंजी तक लगाने में गुरेज नहीं करते. मैं भी एक ऐसे साथी को जानता हूं, जिसको सिर्फ-व-सिर्फ आईफोन का ही नशा है. हाल ही में एप्पल ने अपना आईफोन x लांच किया है, जिसे लेने की जुगत मेरा दोस्त लगाने लगा है. समझना मुश्किल है कि आखिर इसकी दीवानगी इस हद तक क्यों?

आईये उसी की जुबानी जानने की कोशिश करते हैं कि ऐसा क्या है आईफोन में, जो किसी और में नहीं…

2007 का वह पहला ‘आईफोन’

दिवाली का मौका था. विदेश से भाई साहब आये हुए थे. उनके हाथ में एक अलग किस्म का फोन था. खास बात तो यह थी कि वह नोकिया का नहीं था. हमारा ध्यान उससे नहीं हट रहा था. वह था ही एकदम अलग. हमने पूछ ही डाला भाई साहब यह कौन सा फोन है?

उन्होंने कहा इसे आईफोन कहते हैं. इसे अमेरिका की नामी कंपनी ऐप्पल ने बनाया है. यह उसका पहला हैंडसेट है, जिसे इसी साल यानी, 2007 में लांच किया गया है. इसने नोकिया और ब्लैकबेरी की बैंड बजा रखी है.

फिर भाई साहब रुके नहीं और बताते गए…

तुम्हें पता है इसमें 320 x 480 पिक्सल रेजोल्यूशन से लैश 3.5 इंच की टच स्क्रीन दी गई है. यह किसी भी स्मार्टफोन की बेस्ट डिस्प्ले स्क्रीन है (2007 में यह थी भी). भाई साहब के यह शब्द मुझे समझ तो नहीं आ रहे थे. मैं तो बस इस फोन के पीछे बने हुए कटे हुए सेब को देखे जा रहा था. मेरी आंखें इससे हटने का नाम नहीं ले रही थीं. दिवाली के बाद भाई साहब लौट गये, लेकिन आईफोन की वह तस्वीर यहीं छोड़ गये. मैं अपने आसपास इसको ढूंढने की कोशिश करता, लेकिन न जाने क्यों मुझे वह दिखाई नहीं देता था.

iphone launched in 2007 (Pic: qz.com)

2008 में नये वर्जन के साथ मुलाकात

लगभग साल भर बीत जाने के बाद भाई साहब का फोन आया, पता चला कि वह इस दिवाली को फिर से आ रहे हैं. सब उनसे मिलने की लिए उत्साहित थे, लेकिन मैं किसी और कारण से खुश था. असल में मैं इसलिए खुश था क्योंकि भाई साहब आयेंगे तो मुझे आईफोन देखने को मिलेगा. वह दिन जल्द ही आ गया. घर की घंटी बजी तो मैं दौड़ता हुआ दरवाजे तक पहुंचा. भईया, पहुंच चुके थे. सब उनकी आवभगत में लग गए. लेकिन मेरी नज़र उनकी जेब पर अटकी थीं.

मुझे इंतजार था कि वह जल्दी से फोन निकालें. इतने में उनका फोन बजा और उन्होंने अपनी जेब से निकालते हुए हेलो बोला. पीछे से फोन पर लगा कटा हुआ ऐप्पल तो दिख रहा था. किन्तु, फोन बदला-बदला लग रहा था. फोन जैसे ही कटा मैंने अपना सवाल दाग दिया.

भाई साहब नया फोन ले लिया क्या? भईया ने मुस्कुराते हुए कहा… हां! यह भी आईफोन ही है, यह उसका दूसरा मॉडल है. पिछला वाला 2जी था, यह 3G है. मैं नहीं समझा तो उन्होंने कहा, मतलब इसमें ज्यादा स्पीड से काम किया जा सकता था. इसी साल, 2008 में लांच हुआ है. इसमें कंपनी ने अपना नया ऐप स्टोर भी लॉन्च किया है, जो दूसरे फोनों में नहीं मिलता.

‘आईफोन’ के लिए पढ़ाई में डूब गया

भाई साहब के शब्द सुनकर मन ही मन तय कर लिया था कि जब भी फोन लूंगा तो आईफोन ही लूंगा. छुट्टियां खत्म हुई तो वह वापस लौट गये. मैं पढ़ाई में लग गया. मेरी दसवीं की परीक्षा पास थी. पापा अक्सर मुझसे कहते थे कि अगर तू अच्छे नंबर से पास होगा, तो तू जो कहेगा, मैं वह दिलाऊंगा. पापा के यह शब्द मेरे लिए संजीवनी जैसे होते थे. असल में मैने प्लानिंग कर ली थी कि खूब जमकर पढ़ाई करुंगा, ताकि अच्छे नम्बर ला सकूं और पापा से आईफोन मांग सकूं.

देखते ही देखते वक्त बीत गया. मैं अपनी योजना में सफल रहा. मैंने 80 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं की परीक्षा पास कर ली थी. अपने रिजल्ट के साथ पापा के पास पहुंचा तो उन्होंने गले से लगाते हुए कहा, बोल तुझे क्या चाहिए. मैं इसी मौके की तलाश में था. मैंने कहा, पापा मुझे आईफोन चाहिए. पापा मेरा जवाब सुनकर हैरान थे. उन्होंने कहा, नहीं कुछ और ले लो. इस उम्र के बच्चे फोन नहीं चलाते. फिर मैंने जिद की तो पापा मुझे लेकर आईफोन स्टोर पहुंच गये.

दाम सुनकर उड़ गये ‘होश’

हमको स्टोर में आते देख, सेल्समैन तेजी से हमारी तरफ लपके. जैसे वह हमारा ही इंतजार कर रहे थे. चारों तरफ से घेरकर उन्होंने हमें आईफोन के फीचर बताने शुरु कर दिए. बीच-बीच में पापा कहते यह तो नोकिया में भी है, इसमें नया क्या है. कुछ ऐसा बताओ जो किसी में न हो. सेल्समैन ने इस सवाल को गंभीरता से लेते हुए कहा, सर इसमें कंपनी ने 3.15 मेगापिक्सल कैमरा दिया है, जिसकी क्वालिटी किसी दूसरे फोन से कहीं ज्यादा है. यह लेटेस्ट 3जी एस फोन है. इसी साल 2009 में  मार्केट में आया है. इसमें वीडियो रिकॉर्डिग का स्पेशल फीचर है.

यहां तक तो ठीक था, लेकिन जैसे ही उसने इसका दाम बताया, हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. मैं, तो ठीक से सुन तक नहीं पाया था, लेकिन पापा यह कहते हुए तुरंत बाहर आ गये कि इतनी तो मेरे 6 महीने की तनख्वाह है. हम यह नहीं ले सकते.

कुछ दिन मैं नाराज भी रहा, लेकिन जब किसी ने रुचि नहीं दिखाई तो समझ गया कि नहीं मिलेगा आईफोन! एक दिन पापा शाम को आये और बोले तुम बारहवीं में इसी तरह अच्छे नंबर लाओंगे तो दिला दूंगा. अपनी ख्वाहिश दबाकर मैं आगे की पढ़ाई में लग गया.

आईफोन 4 के फीचर्स ने सोने नहीं दिया

इस बीच आईफोन से संबधित सभी खबरों को चाव से पढ़ता रहता था. देखते ही देखते आगे के सालों में आईफोन 4 व 4 एस मार्केट में आ चुके थे. एक दिन कक्षा में एक टीचर को किसी से फोन पर बताते हुए सुना था कि आईफोन 4 का डिजाइन बहुत अच्छा है. इसमें 5 मेगापिक्सल कैमरा भी है… जिसका कोई तोड़ नही है. सुनकर एक पल के लिए मैं ख्वाबों में खो गया था. तभी स्कूल की घंटी बजी और मैं घर वापस आ गया.

आईफोन के फीचर्स ने मुझे सोने नहीं दिया था. कई सारे सवाल थे, सोचा कल टीचर जी से पूछूंगा. हर रोज की तरह मैं, टाईम से स्कूल पहुंच गया. सामने से टीचर जी आ रहे थे. कुछ पूछता उससे पहले देखा कि उनके हाथ में गोल्डन कलर का नया फोन था. सब उन्हें बधाई दे रहे थे. उनका भौकाल बढ़ चुका था. स्कूल में उन्हीं के चर्चे थे.

साथ बैठने वाले दोस्त ने बताया कि सर ने आईफोन 4एस खरीदा है. यह आईफोन 4 का अपग्रेड वर्जन था. इसमें सिरी जैसे नए फीचर को जोड़ा गया है. तुम्हें पता है यह कितने का आता है. मैंने कहा, नहीं. उसने कहा, पूरे 44, 500 रुपये का. दाम सुनकर मैंने दांतों तले अगुंली दबा ली थी. अब समझ आ रहा था कि दसवीं में पापा ने मुझे आईफोन क्यों नहीं दिलाया था.

I phone 5 (Pic: lifewire)

फिर भी नहीं उतरा भूत, लेकिन…

बाद में मैंने दसवीं की तरह बारहवीं में भी अच्छे नंबर पाये. 82 प्रतिशत के नंबर के साथ पास हुआ था. किन्तु, इस बार मैंने पापा से आईफोन की जिद नहीं की थी. असल में मैं जान चुका था कि यह हमारे बजट के बाहर था. इसका मतलब यह नहीं था कि आईफोन को लेने की मेरी दीवानगी खत्म हो गई थी. बस मैंने तय कर लिया था कि इसे अब मैं अपनी बचत के पैसों से लूंगा… या फिर नौकरी के बाद.

आगे की पढ़ाई के लिए मैं दिल्ली आया, तो यहां मैंने ढेर सारे लोगों के पास आईफोन देखा. इनमें कई तो मेरे दोस्त थे. मैं उस समय नोकिया का एक बेसिक फोन यूज किया करता था. दोस्त कभी-कभी इसके लिए खिल्ली भी उड़ाते थे. मुझे बुरा लगता था, लेकिन मैं कहता था तुम चिंता न करों मैं जल्द ही आईफोन खरीदूंगा. मैंने इसके लिए अपनी पॉकेट मनी बचानी शुरु कर दी. कई बार तो दोपहर का खाना मिस कर देता था कि आईफोन ले सकूं. पूरे तीन साल लग गये पैसे इकट्ठे करने में.

5एस गोल्ड के साथ की शुरुआत!

बाजार में आईफोन 6 की सीरीज आने वाली थी. सोच रखा था कि इसका टॉप मॉडल 6प्लस ही खरीदूंगा. किन्तु, ऐन मौके पर मेरे बचत के पैसे कम पड़ गये. चूंकि, मैं तय कर चुका था कि आईफोन लेना ही है, इसलिए 5एस गोल्ड ही ले डाला.

5 एस के बारे में बता दूं कि यह अपनी फिंगर सेंसर और डिजाइन के लिए ऐप्पल का सबसे ज्यादा डिमाडिंग फोन था. इस फोन को खरीदने के बाद मैं खुद को स्पेशल समझने लगा था. कई लोग जो मुझसे बात नहीं करते थे, वह आईफोन लेने के बाद स्पेस देने लगे थे. इसके नाम पर पार्टी भी हुई.

मैं खुश था, लेकिन इसी के साथ एक नई दीवानगी ने जन्म ले लिया था. अब मुझे आईफोन का सबसे टॉप मॉडल खरीदने का फितूर सवार हो गया था. मैंने सोचा जब 5एस ने इतना स्टेटस बढ़ा दिया है, तो फिर आईफोन के टॉप मॉडल से मुझे कितनी तवज्जो मिलेगी. 6 महीने बाद ही नौकरी मिली, तो बचत के पैसों और पहली सैलरी के साथ पहुंच गया आईफोन स्टोर. इस बार तो फीचर्स तक नहीं पूछे बस कहा पैक कर दो एक 6 एस प्लस का ग्रे कलर.

बिलिंग करते-करते सेल्स मैन ने बताया सर यह फोन बहुत दमदार फोन हैं. इसकी स्क्रीन 5.5 इंच है, जो आईफोन की अभी तक की सबसे बड़ी स्क्रीन है. साथ ही इसमें थ्री-डी टच है. रही बात कैमरे की तो इसके सामने किसी और कंपनी का टॉप मॉडल भी नहीं टिकता.

…और बन गया सबसे बड़ी जरुरत

इसके बाद तो जैसे आईफोन अब मेरी सबसे बड़ी जरुरत बन गया है. पिछले साल ऐप्पल ने अपना लास्ट अपडेट आईफ़ोन 7 प्लस वेरिएंट लॉन्च किया, तो उसको भी ले आया. इसमें 12 मेगापिक्सल कैमरे के साथ 7 मेगापिक्सल का फ्रंट कैमरा मौजूद है. इसका साइज भी शानदार है. महज 8 महीने हुए मुझे इसे यूज करते हुए.

अब ऐप्पल ने आईफोन एक्स, आईफोन 8 और आईफोन 8 प्लस बाजार में उतार दिये. दो बार स्टोर हो आया हूं, लेकिन फोन नहीं मिल सका है. सेल्समैन बताते हैं कि इस बार के वर्जन में ऐपल ने आई सेंसर और डिसप्ले पर यूनिक काम किया. देखता हूं आईफोन्स को रखने की यह दीवानगी कब और कहां जाकर खत्म होगी?

iphone X (Pic: ios.gadgethacks)

कुछ लोग मेरी आईफोन की दीवानगी को पागलपन कहने लगे हैं, पर क्या करुं दोस्तों शौक बड़ी चीज होती है. वैसे भी सभी को कोई न कोई नशा होता है. किसी को किताबों का नशा होता है, किसी को शराब का, तो किसी को घूमने का. ऐसे में मुझे आईफोन्स का नशा है, तो इसमें गलत क्या है?

रही बात दीवानगी की तो, चिंता मत करिए मैं इसके लिए अपनी किडनी कभी नहीं बेचूंगा और किसी और को इस तरह का गलत कदम उठाने की सलाह भी नहीं दूंगा! दीवानगी अपनी जगह है और जिदंगी अपनी जगह भाई… पर हाँ, सही राह से अपने शौक पूरा करने में कुछ बुरा तो नहीं… आप क्या कहते हैं?

Web Title: Craze For iPhone, Hindi Article

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