यूं तो उर्दू शायरी में मुनव्वर राना, जोश मलीहाबादी और राहत इंदौरी जैसे कई नाम हैं, लेकिन फ़िराक गोरखपुरी हर मायने में इन सबसे अलग थे. फ़िराक ने जब भी लिखा, जो कुछ भी लिखा गजब का लिखा. नहीं मानते तो पढ़िए उनका यह शेर
“तेरे आने की क्या उम्मीद… मगर कैसे कह दूं कि इंतिजार नहीं”,
यही कारण है कि रेख्ता जैसे मशहूर कार्यक्रमों में फिराक उतना ही सम्मान पाते हैं, जितना गालिब जैसे बड़े शायर. तो आइये अपनी उर्दू शायरी से सभी का दिल जीत लेने वाले फिराख गोरखपुरी और उनकी शायरी को याद करें:

“आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो, जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने ‘फ़िराक़’ को देखा है”

शायर बनने का सफ़र

बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने वाला कोई प्रोफसर जब शायरी करने लगे तो क्या लिखेगा? निश्चित रूप से वह फ़िराक की तरह ही कुछ ऐसा लिखना चाहेगा,
“कभी जब तेरी याद आ जाय है, दिलों पर घटा बन के छा जाय है,
शबे-यास में कौन छुप कर नदीम, मेरे हाल पर मुसकुरा जाय है”

शिक्षा की शुरुआत राम कृष्ण की कहानियों से करने वाले फ़िराक अरबी, फारसी और अंग्रेजी में पढ़ाई करते हुए आगे बढ़े.

बीए में तो उन्होंने स्टेट में चौथा नंबर पाकर पढ़ाकू लड़के की संज्ञा तक अपने नाम कर ली. वो इतने पढ़ाकू थे कि पीसीएस और आईसीएस तक क्वालीफाई कर डाला. पर व्यवहार से उनमुक्त फ़िराक ने जल्दी ही नौकरी को अलविदा कह दिया.

इसके बाद वो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में बतौर अंग्रेजी के प्रोफेसर नज़र आए. जहां से उन्होंने अपनी उर्दू शायरी का सफ़र भी शुरू किया. फिर उन्होंने पलटकर पीछे नहीं देखा. उन्होंने ढ़ेरों शायरी लिखीं. नमूना पेश है:

“इस दश्त को नगमों से गुलजार बना जाएं
जिस राह से हम गुजरें कुछ फूल खिला जाएं”

Famous Shayar Firaq Gorakhpuri (Pic: rekhta.org)

कल्पना में सौन्दर्य खिला रहा

‘मिल आओ फ़िराक से भी एक दिन, वह शख्स एक अजीब आदमी है’ फ़िराक गोरखपुरी ने जिस तरह से शायरी लिखीं. उससे प्रतीत होता है कि वह निजी जीवन में बहुत रोमांटिक रहे होंगे, लेकिन ऐसा कुछ खास नहीं था. कहते हैं कि उन्होंने निजी जिंदगी से न कुछ लिया न कुछ दिया. आप इसी से समझ सकते हैं कि जो पत्नी उन्हें मिली उसके लिए खुद फ़िराक के शब्दों में, “पाव भर सत्तू खाकर एक कोने में लिपटे रहना ही स्वर्ग था”. जीवन के दुर्लभ सौन्दर्य की न उसे अनुभूति थी न आवश्यकता! नारी की न जाने कैसी मूरत फ़िराक की निजी जिन्दगी में बनी हुई थी कि उम्र भर नारी ने फिर उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया. लेकिन नारी का सौंदर्य, कोमलता, मातृत्व और मधुर अनुभूतियों से महकता रूप उनकी कल्पना में हमेशा खिला रहा.

कलम से निकले प्रेरणादायक शेर

फिराक उर्दू के उन चंद शायरों में गिने जाते हैं, जिन्होंने सिर्फ़ हुस्न और इश्क पर ही नहीं, जिंदगी के बाकी पहलुओं पर भी लिखा है. जैसा कि फैज अहमद फैज ने भी कभी कहा था, “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा” फिराक ने जिंदगी की कीमत और, खुदा या धर्म के अलावा इंसानियत की कीमत बताते हुए लिखा “देवताओं का ख़ुदा से होगा काम आदमी को आदमी की दरकार है” इन शेर में शायर ने जिंदगी और दुनिया की गुत्थियों में उलझे इंसान के दिल का हाल सामने रखा है. निश्चित रूप से इस दुनिया में क्या होगा, क्या नहीं, उसे तय तो कहीं न कहीं इसान ही करता है. और इंसान में बुराइयां हैं, तो अच्छाइयां भी हैं.

“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की, बहुत होते हैं यारों चार दिन भी”

फ़िराक का यह शेर आमतौर पर आपको सुनने को मिल जाता होगा. जो इस बात को परिभाषित करता है कि हमें कभी भी निराश नहीं होना चाहिए. हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि किसी भी काम के लिए वक्त और उम्र कभी कम नहीं होती. बस हमारे अंदर सकारात्मक इच्छा शक्ति का होना अनिवार्य होता है.

Famous Shayar Firaq Gorakhpuri (Pic: rekhta.org)

जगजीत के लबों पर फ़िराक

जगजीत सिंह ने फ़िराक गोरखपुरी की कई ग़ज़लों को अपनी आवाज दी. अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, “यूंही कभो लप खोले हैं, पहले फ़िराक को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले हैं” जगजीत की ये ग़ज़ल तो आपने कई बार सुनी होगी, लेकिन आप शायद यह नहीं जानते होंगे कि जगजीत कभी इस ग़ज़ल को पूरा नहीं गा पाए. कारण था फ़िराक का लेखन, क्योंकि वह बहुत लम्बी ग़ज़लें लिखते थे, लेकिन इसके बावजूद भी उनकी ग़ज़लों में रोचकता कभी कम नहीं हुई. पेश हैं एक बानगी:

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जानो-ईमां है, निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं

तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में, हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं

ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता, उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का,  इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं

तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में, हम अपने सर तेरा ऐ दोस्त हर अहसान लेते हैं

“फ़िराक़” अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई ,क़ाफ़िर कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं

साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार का सम्मान

फ़िराक साहब ने जब “गुल-ए-नगमा” लिखा होगा, तो उन्हें भी पता रहा होगा वह इतना पंसद किया जाएगा कि साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा जायेगा. उन्हें सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड, पद्म भूषण पुरस्कार, गालिब अकादमी अवार्ड से भी नवाजा गया. उन्हें यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिशन में काम करने का मौका मिला, वो वहां बतौर रिसर्च प्रोफेसर नियुक्त किए गए थे. इसके अलावा उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया था. अपने काम के दौरान शायद वह अपने साथियों से कुछ यूं कहते होंगे कि

“इस दश्त को नगमों से गुलजार बना जाएं, जिस राह से हम गुजरें कुछ फूल खिला जाएं”

कुछ और भी है…

फिराक अपने साहित्यिक जीवन के शुरुआत में ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक बंदी भी बनाए गए. उर्दू के अलावा उन्होंने हिंदी और अंग्रेजी में भी अपनी कला को संजोया है. 86 साल की उम्र में 1982 को फिराक ने इस शेर के साथ “तुझसे रूखसत होता हूं, आओ संभालो साजे गजल, नये तराने छेड़ो, मेरे नगमों की नींद आती है… आखिरी सांसे लीं. आज वो नहीं हैं, लेकिन उनका लिखा सब कुछ एकदम जीवांत है. उनमें से ही कुछ आपके लिए:

  • तेरे आने की क्या उम्मीद मगर कैसे कह दूं कि इंतजार नहीं
  • तुम मुख़ातिब भी हो करीब भी हो, तुम को देंखें कि तुमसे बात करें
  • जब्त कीजे तो दिल है अंगारा, और अगर रोइए तो पानी है
  • आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में ‘फ़िराक़’ जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
  • कह दिया तू ने जो मासूम तो हम हैं मासूम, कह दिया तू ने गुनहगार हैं हम
  • कोई आया न आएगा लेकिन, क्या करें गर न इंतिज़ार करें
  • कोई समझे तो एक बात कहूँ, इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
  • कौन ये ले रहा है अंगड़ाई, आसमानों को नींद आती है
  • मैं हूँ दिल है तन्हाई है, तुम भी होते अच्छा होता
  • मौत का भी इलाज हो शायद, ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
फ़िराक साहब ने लिखा था “किसको याद रखता है उम्र भर कोई आदमी जल्द भूल जाता है” लेकिन ऐसा नहीं है उनकी हर ग़ज़ल, उनकी हर एक शायरी में वो आज भी जिंदा है. सुंदरता को लेकर पूजा, शायरी में मौजूद दर्द, आदि हर बार उनकी ग़ज़लों में रह रह कर उभरता है. जोकि इस बात को प्रमाणित करता है कि वह एक सच्चे इंसान थे. चलते- चलते उनका लिखा एक और शेर पढ़ते चलिए:

“ये तो नहीं कि गम नहीं, हां मेरी आंख नम नहीं, तुम भी तो तुम नही, हम भी तो आज हम नही”

Famous Shayar Firaq Gorakhpuri (Pic: thelallantop.com)

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