आज के दौर में पैसा  इंसान की सबसे पहली जरुरत है. माना जाता है कि इसके बिना जीवन संभव ही नहीं! हम इसके भिन्न स्वरुपों को अपनी जेब में रखकर घूमते हैं. जैसे सिक्के और कागज वाली मुद्रा. ऐसे में यदा-कदा आपके जेहन में यह सवाल जरुर आता होगा कि यह रुपया बनाया किसने? इसकी जरुरत क्योंं पड़ी? अगर यह न हो तो?…आदि. तो आईये इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं:

पहला रूप…

वैसे तो माना जाता है कि पैसा भारत में मौर्य समाज से पहले ही आ गया था. पर उसका कोई स्थाई रूप देखने को नहीं मिला था. जैसे-जैसे शासक बदले वैसे-वैसे इसकी उपयोगिता और स्वरुप भी. हां, दस्तूर को जिस शासक ने बदला वह थे शेर शाह सूरी. हुमायूं को हराकार जब वह गद्दी पर बैठे तो एकाएक कई सारे बदलाव किए. इन बदलावों में उस समय की मुद्रा भी थी.

उस समय सोने के सिक्के चलन में हुआ करते थे. इन्हें ‘टनका’ कहा जाता था. चूंकि यह सिक्के मुगलों ने चालू किए थे और वह सूरी के दुश्मन थे. इसलिए इन सिक्कों को बंद कर दिया और इनकी जगह नए सिक्के बाजार में उतार दिए गए. यह अब चांदी के थे. जारी नये सिक्के का वजन 178 ग्रेन हुआ करता था. 1540 में जब यह सिक्के पूरी तरह से चलन में आए, तो दुनिया ने इन्हें ‘रुपिया’ के नाम से जाना.

यह नाम सूरी ने बहुत सोच समझ कर रखा था. उन्होंने इसका नाम संस्कृत के शब्द ‘रुप्यंक’ से लिया था. इसका अर्थ था चांदी का सिक्का. सूरी की इस मुद्रा में कई शासकों ने कोई बदलाव नहीं किया. सूरी का ‘रुपिया’ पूरे भारत में लोकप्रिय हो चुका था.

Sher Shah Suri Rupiya (Pic: wikipedia.org)

अंग्रेजों को रास नहीं आया ‘रुपिया’

1600 में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में प्रवेश किया तो वह अपने साथ अपनी मुद्राएं लेकर आए थे. उन्होंने कोशिश की कि वह रुपिया की जगह अपनी मुद्रा को बाजार में उतार दें. उन्होंने इसके लिए कोशिशें की, लेकिन लोगों ने इस मुद्रा को नकार दिया. अंत में जब अंग्रेजों को लगा कि रुपिया को हटाना आसान नहीं है तो उन्होंने इसको बंद न करते हुए अपनी मुद्रा भी बाजार में उतार दी.

यह तो अंग्रेजों की महज एक चाल भर थी. उन्होंने कुछ दिन इंतजार किया और सिक्के को गिराने के लिए एक चाल चली. उन्होंने सबसे पहले उस समय के मुग़ल शासक फार्रुख सियार को अपने झांसे में लिया. फिर उसके सहयोग से बम्बई में अपने सिक्कों को लागू करने में सफल रहे. उन्होंंने चार तरह के सिक्के बाजार में उतारे थे. कैरोलीना यानी सोने के सिक्के, एंजलीना यानी चांदी के सिक्के, कूप्रून यानी ताम्बे के सिक्के और टाइनी यानी टिन के सिक्के.

दिलचस्प बात तो यह थी कि उनकी यह चाल भी बेकार हुई. वह भारत में सूरी के रुपिया को गिराकर अपने सिक्कों की साख जमाना चाहते थे, लेकिन लोगों ने इसको नकार दिया. परिणाम यह रहा कि रुपिया की चमक बरकरार रही.

रुपिया का तेजी से बदलता स्वरुप

18वीं सदी के आते-आते अंग्रेज भारत के बड़े हिस्से में अपनी जड़े मजबूत कर चुके थे. पश्चिमी देशों का भारत में व्यापार बढ़ने लगा था. ब्रिटिशों ने भारत में बैंक खोल दिए थे. व्यापार को सरलता से करने के लिए इन बैंकों को बनवाया गया था. यही दौर था, जब सूरी का सिक्का बदलाव की चौखट पर खड़ा था. असल में सिक्कों की कीमत एक लिमिट तक ही थी. इसलिए ज्यादा सिक्के रखने में परेशानी होती थी.

अंग्रेजों ने इसका फायदा उठाया और इन्हें कागज़ के रूपए में बदल दिया. माना जाता है कि पहला कागज़ का रुपया 18वीं सदी में बैंक ऑफ हिन्दोस्तान, जनरल बैंक ऑफ बंगाल एंड बिहार और बंगाल बैंक के द्वारा निकाला गया था. कागज़ वाली यह मुद्रा अपने साथ एक बड़ा बदलाव लेकर आई. कागज के यह नए नोट हिंदी, बंगाली और उर्दू भाषा में मुद्रित किए गये थे. इस लिहाज से इनकी उपयोगिता अलग-अलग जगह थी. माना जाता है कि यह आम जनता के लिए नहीं थे.

नोट का चलन और आरबीआई का गठन

1857 में ब्रिटिश ने एक नया नोट निकाला. उस नोट में राजा जोर्ज VI के चेहरे को दर्शाया गया. नोट को निकालने के साथ-साथ ब्रिटिश ने रुपया को आधिकारिक तौर पर भारत की असल मुद्रा घोषित कर दिया. इसके बाद 1862 में रानी विक्टोरिया के लिए भी ख़ास नोट निकाले गए. इन नोट को ‘विक्टोरिया पोर्ट्रेट सीरीज़’ कहा गया था. नोट पर रानी विक्टोरिया का चित्र भी बनाया गया था. यह पहले नोट थे, जिन्हें 10, 20, 50, 100 और 1000 रुपिये के रूप में सबके सामने लाया गया.

काफी समय तक यह नोट वाले रुपया ऐसे ही चलते रहे. 1935 में फिर ‘रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया’ का गठन किया गया. अब नोट को किसे कितना देना है, यह सब इनके हाथ में ही था. आरबीआई ने एक बार 10,000 का नोट भी निकाला था. भारत की आजादी तक यह 10,000 का नोट लागू रहा. बाद में इसे बंद कर दिया गया. इसके बाद 1938 में पांच रुपया का एक नोट निकाला गया. पांच के इस नोट पर भी किंग जोर्ज का ही चित्र बना हुआ था.

Victoria Series Note (Pic: indianbanknote)

आजादी के बाद के बदलाव

अंग्रेजों के राज से आजाद होने के बाद थोड़े समय तक उनकी बनाई मुद्रा ही भारत में चलती रही. आजाद भारत ने सबसे पहले एक रूपए बनाकर अपनी शुरुआत की. इस नोट पर चार शेरों के एक स्तंभ को दर्शाया गया. धीरे-धीरे नोट बनाने में आरबीआई ने रफ़्तार पकड़ी. उन्होंने कई और नोट निकाले जिसमें उन्होंने अलग-अलग तरह की भारतीय इमारतों के चित्र को दर्शाया. आजादी के बाद भारत ने बड़ी रकम के नोट को बंद कर दिया था. पर 1954 में 1000, 5000 और 10,000 रूपए के नोट को फिर से लाया गया.

1970 में महात्मा गांधी के जन्म शताब्दी स्मारक के तौर पर एक ख़ास एक रूपए का नोट निकाला गया. थोड़े समय बाद 1996 में महात्मा गांधी के चित्र वाले नोटों की सीरीज निकाली गई. महात्मा गांधी को भारतीय रूपए का मेन फेस मान लिया गया. यही कारण है कि अभी भी नोट पर हमें गांधी जी का चित्र देखने को मिलता है.

इन सबके बीच रूपए को थोड़ा छोटा करने की भी कोशिश की गई. पर वह ज्यादा नहीं चली. जैसे आना और पैसे जैसे सिक्कों को लाना. आना और पैसे थोड़े समय तो प्रचलन में रहे पर बाद में इन्हें बंद कर दिया गया. साथ ही एक रूपए को सबसे छोटी रकम की मुद्रा मान लिया गया. 2011 में रूपए के पुराने निशान को नए निशान (₹) से बदल दिया गया. अभी हाल ही में रूपए में एक और नया बदलाव आया है. 500 और 1000 के पुराने नोटों को सरकार द्वारा बंद कर दिया गया और 500 का नया नोट आया. 1000 के नोट को बदल कर उसकी जगह 2000 रूपए का नोट लाया गया है, जो चलन में हैं. इस बड़े बदलाव को ‘नोटबंदी‘ के नाम से जाना गया.

2000 Rupees Note (Pic: architecturaldigest.in)

रूपए शायद दुनिया में इकलौती ऐसी मुद्रा होगी, जिसमें वक़्त के साथ इतना ज्यादा बदलाव आया है. यह जितना मूल्यवान है, इसका इतिहास उतना ही रोचक. समय दर समय यह रुपया बदलता रहा है. आगे देखना होगा कि इसमें समय के साथ-साथ कौन-कौन से बदलाव होंगे.

Web Title: History Of Indian Rupee, Hindi Article

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