सदियों से मोतियों ने हमारे जीवन में एक ख़ास जगह बनाई हुई है. मोती गहनों में लगने वाला एक दुर्लभ क्रिस्टल है. असल में बाकी चीज़ों की तरह मोतियों को फैक्ट्री में नहीं बनाया जा सकता है. मोती एक समुद्री जीव के अंदर पनपता है, इसलिए यह बहुत ही अनमोल माना जाता है. एक मोती का बनना सीपी की खासियत पर निर्भर होता है.

सीपी किसी और समुद्री जीव की तरह हरदम समुद्री जीवों को नहीं खाता है. अधिकतर समय वह खुद के शरीर से ही जरूरी तत्व लेता रहता है. सीपी के अंदर एक ख़ास प्रकार की मसल होती हैं, जो मोती बनाने में मददगार होती है. यह माना जाता है कि सबसे पहले मोती की खोज इंसानों ने अपना खाना ढूंढते समय की थी. ऐसे में जीव के अंदर मोती कैसे बनता है, यह जानना रोचक रहेगा.

कैसे बनता है प्राकृतिक मोती?

प्राकृतिक मोती अब पहले जैसे नहीं रहे हैं. अधिकतर मोतियों की अब खेती की जाती है. प्राकृतिक मोती अब बहुत ही रेयर पाये जाते हैं. इनके बनने में सालों का वक़्त लगता है. एक प्राकृतिक मोती का जन्म तब होता है, जब बाहरी उत्तेजक सीपी की मसल में स्वाभाविक रूप से फंस जाते हैं. ऐतिहासिक रूप में एक बहुत बड़ी मात्रा में प्राकृतिक मोती फ़ारस की खाड़ी में पाए जाते थे. यह प्राकृतिक मोती आमतौर पर विकृत आकर के होते हैं.

जैसा कि आपको पहले बता चुके हैं कि एक मोती सीपी के अंदर बाहरी उत्तेजकों के आने से बनता है. इनमें हड्डी के टुकड़े, ब्लेड व परजीवी शामिल होते हैं. यह जब सीपी में समा जाते हैं, तो मोती के रूप में सामने आते हैं. हालांकि, इन सबके होने के बावजूद भी एक ख़ास मसल की बदौलत ही यह मोती बना पाता है.

जब सारे तत्व सीपी में आ जाते हैं, तो मसल इनके इर्द-गिर्द एक नायलॉन की परत बना देता है. यह इनकी रक्षा करता है. यह परत हर रोज बढती जाती है. इसके कारण बाहरी चीजें इसके अंदर नहीं घुस पाती हैं. अंदर फंसे तत्वों को न्यूक्लियस कहा जाता है. कुछ सालों तक ऐसे ही परत बनने का काम चलता रहता है. एक मोती आखिर कितना अच्छा, कितना बड़ा होगा, यह न्यूक्लियस पर ही निर्भर करता है.

साल दर साल परतों की रक्षा में रहते हुए ही आखिर में एक सीपी से शानदार मोती बाहर आता है. सीपी में कई बार एक से ज्यादा भी मसल होती हैं, लेकिन इसके बाद भी यह सिर्फ एक ही मोती बना पाते हैं. कई बार तो एक भी मोती नहीं बन पाता. शायद इसलिए ही अब मोतियों की आर्टिफिशल खेती होने लगी है.

How To Make Pearls (Pic: rainbowminerals)

आसानी से नहीं बनता आर्टिफिशल मोती भी…

सालों से मोती के बनने की प्रक्रिया को देखने और समझने के बाद अब वैज्ञानिक आर्टिफिशल मोती बनाने लगे हैं. यह तरीका भी काफी समय लेने वाला व पेचीदा है. आर्टिफिशल होने के बाद भी इन मोतियों को बनाने में काफी सावधानी बरती जाती है. यही कारण है कि आर्टिफिशल मोती थोड़े से रूखे होते हैं. इन आर्टिफिशल मोतियों को बनाने के पीछे फायदा यह होता है कि यह हर तरह के आकर में ढ़ाले जा सकते हैं. खरीदार की पसंद के मुताबिक़ इन्हें बनाया जा सकता है.

यह मोती भले ही आर्टिफिशल कहलाए जाते हैं, पर इनको बनाने का तरीका ओरिजिनल होता है. इन्हें बनाने की प्रक्रिया में सीपी के अंदर ख़ास प्रकार के मसल डाले जाते हैं, जो मोती बनाने के लिए चाहिए होते हैं. इसके बाद इन्हें निर्धारित समय के लिए छोड़ दिया जाता है. माना जाता है कि इन्हें पूरी तरह तैयार होने के लिए कम से कम तीन साल का वक्त तो लग ही जाता है.

जैसे ही यह सीपी तीन साल बाद तैयार हो जाती है, तो इनके अंदर कुछ चीजें डाली जाती है. यह इनके न्यूक्लियस को बढ़ने में मदद करती हैं. सभी सीपियों को साथ में रखा जाता है. इन सबके बाद सीपी की मसल और न्यूक्लियस पर टीकाकरण किया जाता है. अगली कड़ी में इसकी मसल में एक और मसल डाली जाती है, जिससे मोती और भी जल्दी बनता है.

ठंडे पानी में की जाती है ड्रिलिंग

मोती न्यूक्लियस के रिसाव से अपना आकार लेता है. उत्तेजक के प्रभाव को दूर करने के लिए उन्हें थोड़े समय के लिए आराम दिया जाता है. इस दौरान कुछ सीपी बीमार पड़ सकते हैं, न्यूक्लियस को छोड़ सकते हैं और कई बार तो मर भी सकते हैं. इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद सीपियों को दो से तीन साल के लिए एक बिल्कुल ही अलग माहौल में रखा जाता है. इन्हें एक जाल जैसी वस्तु में रखा जाता है.

दो तीन साल बाद मोती सीपी के अंदर दिखाई देने लगता है. उसके बाद आखिर में सीपी को खोला जाता है और मोती को बाहर निकला जाता है. फिर मोतियों को ब्रशिंग के लिए भेजा जाता है, जहां पर इन्हें चिकना बनाने का काम होता है. मोती की ड्रिलिंग थमे हुए ठंडे पानी में की जाती है, क्योंकि माना जाता है कि यही मोती की चमक को निर्धारित करता है.

नेकलेस में प्रयोग होना ही मोती बनाने के पीछे की एक मात्र वजह होती है. मोती जिस परत के पास बनता है, उसे नेकलियास कहा जाता है. रसायनिक तौर पर यह सीपियों में पाया जाने वाला नेकलियास कार्बोनिक व अकार्बोनिक मिश्रित पदार्थ होता है. इसमें 95% भाग नाजुक कैल्शियम कार्बोनेट से बना होता है.

Pearl Farming (Pic: hotspringsfiji)

कई तरह के होते हैं मोती

प्राकृतिक और आर्टिफिशल दोनों ही तरीके के मोती बनाने के तरीके में एक चीज़ समान है. वह यह है कि इन दोनों को मीठे व खारे पानी में रखा जाता है. पानी का चुनाव सीपी में इस्तेमाल की जाने वाली मसल पर निर्धारित होता है.

अधिकतर मोती का व्यापार चीन और जापान ही करते हैं. यह दोनों देश मोती बनाने के लिय अकोया नाम के एक पारम्परिक तरीके का इस्तेमाल करते हैं. इनके बनाए मोती 2 मिलीमीटर से 10 मिलीमीटर तक होते हैं. इनका रंग अधिकतर समय सफ़ेद ही होता है.

दक्षिणी समंदर के मोती ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में पाए जाते हैं. यह मोती सबसे बड़े माने जाते हैं. इनका आकार 9 मिलीमीटर से 20 मिलीमीटर तक होता है. इनके रंग की बात की जाये तो ये सफ़ेद, क्रीम और सुनहरे रंग के होते हैं.

मोतियों का एक और रुप बहुत मशहूर है. इन्हें ताहिती मोती के नाम से जाना जाता है. यह सिर्फ फ़्रांस के एक द्वीप पर ही मिलते हैं. इनका आकार 8 मिलीमीटर से 16 मिलीमीटर तक होता है. इन मोतियों को काफी ख़ास माना जाता है, क्योंकि इसका रंग काला होता है. हालांकि, कई बार यह ग्रे, हरे और बैंगनी रंग के भी होते हैं.

How To Make Pearls (Pic: tahititimes)

एक बात तो साफ है. मोती चाहे प्राकृतिक हो या फिर आर्टिफिशल हो… मोती, मोती होता है. इसकी दीवानगी लोगों में यूं ही तो नहीं!

आप क्या कहते हैं, अपने विचार कमेन्ट सेक्शन में अवश्य बताएं.

Original Article Source / Writer: Roar Bangla / Swaraz Mollick

Translated by: Vimal Naugain

Web Title: How To Make Pearls, Hindi Article

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