जब कभी हमारी नज़र किसी ऐसे व्यक्ति पर पड़ती है, जिसके तन पर कुछ नहीं बस हड्डियों की छाया हो और उसने अपने कंधों पर ईट-गारा आदि का भारी-भरकम बोझ उठा रखा हो, तो हमारी संवेदनाओं का हिचकोले मारना स्वभाविक हो जाता है. ऐसे में हमारे जेहन में ढ़ेर सारे सवालों का कौतूहल भी जन्म ले लेता है, जो एकाएक पूछता है, कौन है ये लोग? कहां से आते हैं? कोई इनके बारे में क्यों नहीं सोचता? आदि.. आदि… आदि… तो जवाब मिलता है यह मजदूर हैं. तो आज बात करते हैं इनसे जुड़े आंदोलन के बारे में:

बहुत दयनीय थी मजदूरों की हालत

अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस या मई दिवस से पहले मजदूर की कामकाजी हालत बेहद गंभीर थी और असुरक्षित परिस्थितियों में भी दिन में 10 से 16 घंटे काम किया जाता था. दूसरी तरफ कई कार्यरत उद्योगों में श्रमिक वर्ग के लोगों की बढ़ती मौत के कारण लोगों में गुस्सा पनपने लगा था. और यही कारण था मजदूर आन्दोलन की शुरुआत होने का…

Interesting facts on Labour Movement (Pic: ipleaders.in)

हेमेर्केट नरसंहार से फूटी चिंगारी

तारीख 4 मई, साल 1886, जगह शिकागो का हेमेर्कट, जहां श्रमिक आठ घंटे की कार्यदिवस के लिए आम हड़ताल पर थे. पुलिस आम जनता को हड़ताल करने वालों से दूर करने में जुटी थी. अचानक, एक अज्ञात व्यक्ति ने भीड़ पर एक बम फेंक दिया और फिर पुलिस ने मजदूरों पर गोलीबारी शुरू कर दी. गोलियों की तड़तड़ाट से वहां मौजूद लोगों में भगदड़ मच गई. आखिरकार इस गोलीबाजी में कई मजदूरों की मौत हो गई और 100 से ज्‍यादा लोग घायल हो गए. देखते ही देखते इस नरंसहार के कारण प्रशासन के खिलाफ विद्रोह तेज होता गया और मौजूदा सरकार को हरकत में आना पड़ा.

रेमंड लैविने के प्रस्ताव ने डाली नींव

मजदूरों के एक लम्बे संघर्ष के बाद रेमंड 1889 में लैविने ने एक प्रस्ताव जारी किया. इस प्रस्ताव का परिणाम यह हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में ऐलान किया गया कि हेमार्केट नरसंहार में मारे गये निर्दोष लोगों की याद में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन सभी कामगारों और श्रमिकों का अवकाश रहेगा. 1891 में इस प्रस्ताव पर आधिकारिक तौर से मुहर लगा दी गई और 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस को आधिकारिक रूप से मान्यता दे दी गई.

भारत में कुछ ऐसा है यह दिवस

भारत में एक मई का दिवस सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाना शुरू किया गया था. उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था. इस की शुरूआत भारती मज़दूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी. भारत में मद्रास के हाईकोर्ट सामने एक बड़ा प्रदर्शन किया और एक संकल्प के पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये.

इस तरह पकड़ी आन्दोलन ने तेज़ी

1928 ई. में बम्बई कपड़ा मिल मज़दूरों ने सबसे बड़ी हड़ताल की. यह 6 माह तक चली तथा इसमें डेढ़ लाख लोगों ने भाग लिया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद श्रमिक आंदोलन में काफ़ी तेज़ी आई, क्योंकि रूस के विजयी होने के बाद साम्यवादियों का प्रभुत्व बढ़ा, जिसका प्रभाव भारतीय श्रमिक आन्दोलन पर पड़ा. 1940 ई. में साम्यवादी नेता एम.एन.राय ने अपने को अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस से अलग कर ‘इण्डियन फ़ेडरेशन ऑफ़ लेबर’ की स्थापना की. इस दल को सरकार का समर्थक दल माना जाता था.

राष्ट्रवादी नेता वल्लभभाई पटेल ने मई, 1947 ई. में ‘भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ की स्थापना की. सरदार वल्लभभाई पटेल इसके प्रथम अध्यक्ष थे. समाजवादियों के प्रयास से 1948 ई. में ‘हिन्द मज़दूर सभा’ की स्थापना हुई.

इस संघ की स्थापना का उद्देश्य था, भारत में लोकतांत्रिक समाजवादी समाज को स्थापित करना, मज़दूरों के हित, अधिकार एवं सुविधा की लड़ाई लड़ना, शैक्षिक स्तर को सुधारने के लिए संस्थायें गठित करना आदि.

उद्योगपतियों से गांधी जी की अपील

महात्मा गांधी ने मजदूरों के लिए उद्योगपतियों से अपील करते हुए कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है. इसलिए मजदूरों के हितों का ख्याल रखना जरुरी है. उन्होंने यह भी कहा था कि उद्योगपतियों को मज़दूरों और कामगारों की बेहतरी, भलाई और विकास के लिए वचनबद्ध होना चाहिए. तभी जाकर उनका भी विकास संभव है.

गुरु नानक देव जी का महत्वपूर्ण योगदान

गुरु नानक जी ने मजदूरों के हितों की लड़ाई में कैटलिस्ट का काम किया. गुरू नानक देव जी ने ‘काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालने’ का संदेश दिया. गरीब मज़दूर और कामगार का विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया. 1 मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय में मनाया जाता है.

Child Labour (Pic: ibtimes.co.uk)

इसके बावजूद वैश्वीकरण और मुनाफे की अंधी दौड़ में मजदूरों का शोषण आज भी जारी है. प्रतिदिन आठ घंटे और सप्ताह में 40 घंटे कामकाज, उचित पारिश्रमिक और बेहतर माहौल जैसी मांगों को लेकर शुरू हुआ मजूदरों का संघर्ष आज भी जारी है.

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