होली क्या रंग है? नहीं, होली क्या गुलाल है? नहीं, होली क्या भांग है? नहीं, होली क्या कीर्तन है? नहीं, बल्कि होली तो एक त्यौहार है. अपने परिजनों, संगी-साथियों के संग, रंगों के साथ, पकवानों के साथ मनाया जाने वाला आत्मीय पर्व है होली! अब अगर आपसे पूछें कि हम होली क्यों मनाते हैं? तो आपका जवाब होगा, हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के जल जाने के कारण, लेकिन

आपको जानकर हैरानी होगी कि सिर्फ़ यही एक कथा नहीं है जिसके कारण होली मनाई जाती है. इतिहास के पन्नों में ऐसी कई और कथाएं हैं, जिन्हें होली से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए हम लेकर आए आपके लिए होली से जुड़ी 5 पौराणिक कथाओं का एक संकलन. साथ ही इससे जुड़े कई और रोचक तथ्य:

प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की प्रचलित कथा

अपनी दादी, नानी से आपने होली के संबंध में प्रहलाद से जुड़े कई क़िस्से सुने होंगे. इसके अनुसार, बहुत समय पहले, हिरण्यकश्यप नामक एक राक्षस राजा था. जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे कई वर्षों के लम्बे तप के फलस्वरूप भगवान ब्रह्मा द्वारा पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली होने का वरदान प्राप्त हुआ था. इस वरदान ने उसे अंहकारी बना दिया था. हिरण्यकश्यप को लगने लगा कि उसे कोई खत्म नहीं कर सकता. कुछ वक्त बाद तो उसने खुद को भगवान ही घोषित कर दिया और खुद की पूजा करने की मांग शुरु कर दी.

आज के समय की तरह उस समय में भी कमजोर लोग हुआ करते थे, जिन्होंने डर के कारण हिरण्यकशिपु को पूजना शुरु कर दिया. लेकिन कहते है ना जहां सौ गीदड़ होते हैं, वहां एक शेर भी होता है. उस जमाने भी एक बहादुर था और उसकी बहादुरी का श्रोत सच्ची ‘ईश्वर भक्ति’ थी. नाम था भक्त प्रह्लाद. ग़जब की बात तो यह कि प्रह्लाद खुद हिरण्यकश्यप का ही बेटा था. धार्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण अपने पिता को उसने ईश्वर मानने से इंकार कर दिया.

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प्रहलाद का यह व्यवहार उसके पिता को बिल्कुल पसंद नहीं था. इस कारण हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कभी अपना पुत्र नही माना और उसे क्रूरता से दंड देना शुरु कर दिया. हालांकि, प्रहलाद हर बार आश्चर्यजनक रुप से बचता रहा. अंत में जब, वह अपने बेटे से तंग आ गया, तो मदद के लिए अपनी बहन होलिका को बुलाया. चूंकि होलिका को आग से कोई नुकसान न होने का वरदान था, इसलिए उसने अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में रख कर आग में बैठने की एक योजना बनाई. होलिका ने आग से रक्षा करने के लिए एक विशेष शाल में खुद को लपेटा और प्रहलाद के साथ विशाल आग में बैठ गयी. कुछ समय के बाद जब आग बड़ी और भयानक हुई तो होलिका की शाल दूर उड़ गई.

शाल के दूर जाते ही आग की लपटों ने होलिका को अपने आगोश में लेकर उसे राख बना दिया. रही बात प्रह्लाद की तो उन पर भगवान विष्णु की कृपा थी, इसलिए वह बच गए. इसके बाद से ही होलिका दहन और होली मनाया जाने लगा, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है.

राधा-कृष्ण की प्रेम कथा

आज भी जब होली को सेलीब्रेट करने का ख्याल आता है, तो ज़ेहन में ब्रज का नाम अवश्य आता है. बड़ों के मुंह से आपने सुना भी होगा कि होली का आनंद लेना है तो ब्रज जाना चाहिए. इसके पीछे सिर्फ़ एक कारण है राधा और कृष्ण का दिव्य प्रेम. बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना श्रीकृष्ण लीला का ही अंग माना गया है. माना जाता है कि कृष्ण जब छोटे थे तब उनको खत्म करने के इरादे से विष से भरी राक्षसी पूतना ने अपना दूध पिला दिया था. जिसके कारण भगवान श्री-कृष्ण का रंग गहरा नीला हो गया था.

अपने रंग से खुद को अलग महसूस करने पर श्री-कृष्ण को लगने लगा कि उनके इस रंग की वजह से न तो राधा और न ही गोपियां उन्हें पसंद करेंगी. उनकी परेशानी देखकर माता यशोदा ने उन्हें कहा कि वह जाकर राधा को अपनी पसंद के रंग से रंग दें और भगवान कृष्ण ने माता की यह सलाह मानकर राधा पर रंग डाल दिया.

श्री-कृष्ण और राधा न केवल अलौकिक प्रेम में डूब गए बल्कि रंग के त्यौहार होली को भी उत्सव के रुप में मनाया जाने लगा. जिसके बाद से ब्रज में लोग होली दिव्य प्रेम के उपलक्ष्य में मनाते हैं. इस दिन, लोग कृष्ण, राधा व गोपियों सहित पात्रों को सजाते है और उल्लास के साथ होली का पर्व मनाते हैं.

त्रेता युग में विष्णुजी की धूलि वंदन कथा

त्रेतायुग दूसरा युग था जिसमें अधर्म का नाश करने के लिए भगवान विष्णु ने तीन अवतार लिए थे, जो क्रमशः वामन अवतार, परशुराम अवतार और श्रीराम अवतार के नाम से हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित हैं. जानकारी की मानें तो इस युग के प्रारंभ में विष्णु भगवना ने धूलि वंदन किया था, जिसका अर्थ यह है कि ‘उस युग में विष्णु जी ने अलग-अलग तेजोमय रंगों से अवतार कार्य का आरंभ किया. चूंकि होली भी रंगों का त्यौहार है, इसलिए इस कथा से जोड़कर होली को एक तेजोत्सव के रूप में भी देखा जाता है.

Interesting stories about Holi, Great Indian Festival (Pic: nydailynews.com)

भगवान शिव और कामदेव की कथा

वैसे तो भगवान शिव और कामदेव की कथा भी बहु प्रचलित है, लेकिन इस कथा का कनेक्शन होली से भी है. आपको बताते चलें कि दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में लोग होली का त्यौहार पूरी दुनिया को बचाने के लिये भगवान शिव के ध्यान भंग करने के भगवान कामदेव के बलिदान के उपलक्ष्य में मनाते हैं. कहते हैं कि किसी राक्षस के वध के लिए शिव-पुत्र की आवश्यकता थी, किन्तु महादेव गहरी समाधी में लीन थे, इसलिए उन्हें जगाने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर कामदेव ने अपना पुष्प बाण भगवान शिव पर चला दिया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गयी. अपनी तपस्या भंग होने के कारण शिवजी के क्रोध का कहर कामदेव पर बरपा, उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी. जिसने अपनी ज्वाला से कामदेव को राख कर दिया.

इसके बाद जब कामदेव की पत्नी रति को अपने पति के बारे में पता चला तो वह भगवान शिव के पास कामदेव को जीवित करने के लिए विलाप करने पहुंची. इस पर भगवान शिव ने कामदेव को जीवित कर दिया. चूंकि यह दिन होली का था इसलिए लोग इस कथा को होली से जोड़कर देखते है.

राजा पृथु व राक्षसी ढुंढी की कथा

राक्षसी ढ़ुंढी के बारे में शायद आपने सुना हो. नहीं भी सुना हो तो कोई बात नहीं अब सुन लीजिए. हजारों सालों पहले एक राजा हुआ करते थे पृथु, जिनके राज्य की जनता बहुत परेशान थी. जनता अपने राजा के कारण परेशान नहीं थी. उनकी परेशानी की असल वज़ह थी उस समय की राक्षसी ढुंढी, जो नवजात शिशुओं को खा जाती थी. कहते हैं कि

राक्षसी को वरदान था कि कि उसे कोई भी देवता, मानव, अस्त्र या शस्त्र नहीं मार सकेगा. न ही उस पर किसी भी मौसम का कोई असर होगा. लेकिन इसके साथ ही उसे भगवान शिव का एक श्राप भी मिला था, जिसके तहत वह बच्चों की शरारतों से मुक्त नहीं थी.

अपनी प्रजा के दुख को दूर करने के लिए राजा पृथु ने राजपुरोहितों की एक बैठक बुलाई. जिसमें उपाय निकाला गया कि यदि फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन जब न अधिक सर्दी होगी और गर्मी, क्षेत्र के सभी बच्चे एक-एक लकड़ी एक जगह पर रखें और जलाए, मंत्र पढ़ें और अग्रि की परिक्रमा करें तो राक्षसी मर जाएगी. हुआ भी ऐसा ही इतने बच्चे एक साथ देखकर राक्षसी ढुंढी अग्रि के नजदीक आई तो उसका मंत्रों के प्रभाव से वहीं विनाश हो गया. तब से इसी तरह मौज-मस्ती के साथ होली मनाई जाने लगी.

इन तथ्यों को भी पढ़ते जाइये

  • परंपरागत रूप से, यह बुराई पर अच्छाई की सफलता के रुप में मनाया जाता है. यह “फगवाह” के रूप में नामित किया गया है, क्योंकि यह अवसर हिन्दी महीने, फाल्गुन में आता है.
  • होली के त्यौहार पर होलिका दहन इंगित करता है कि, जो भगवान के प्रिय लोग हैं उन्हे पौराणिक चरित्र प्रहलाद की तरह बचा लिया जाएगा, जबकि जो राक्षसी चरित्र हैं, उन्हें होलिका की तरह दंडित किया जाएगा.
  • प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न अवशेष पाये गये हैं. अहमदनगर चित्रों और मेवाड़ चित्रों में 16 वीं सदी के मध्यकालीन चित्रों की मौजूदा किस्में हैं जो प्राचीन समय के दौरान होली समारोह का प्रतिनिधित्व करती है.
  • रीति रिवाज़ों और परंपराओं के अनुसार होली उत्तर प्रदेश में ‘लठमार होली’ के रूप में, असम में ‘फगवाह’ या ‘देओल’, बंगाल में ‘ढोल पूर्णिमा’, पश्चिम बंगाल में ‘ढोल यात्रा’, और नेपाल आदि में ‘फागू’ नामों से लोकप्रिय है.
  • होली पूरे भारत में हिंदुओं के लिए एक बहुत बड़ा त्यौहार है, जो ईसा मसीह से भी पहले कई सदियों से मौजूद है. इससे पहले होली का त्यौहार विवाहित महिलाओं द्वारा पूर्णिमा की पूजा द्वारा उनके परिवार के अच्छे के लिये मनाया जाता था.
कुल मिलाकर होली से जुड़ी किसी भी कथा को ले लीजिए. एक ही संदेश निकलकर सामने आता है, जो कहता है कि यदि हम अपने भीतर स्थित होलिका के रूप में विद्यमान काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ की भावनाओं पर नियंत्रण कर ले, तो ईश्वर की अनुकंपा हम पर रह सकती है. हर रूप में बुराई का त्याग और अच्छाई की जीत का सन्देश ही होली का सन्देश है. इससे बढ़कर जात-पात, ऊंच नीच, भेद भाव त्यागकर हर कोई होली मनाता है, तो सामजिक समरसता का इससे बढ़कर कोई दूसरा प्रेरक अवसर नहीं.

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