वर्तमान में भारतीय मीडिया का स्वरूप चाहे जो हो, किंतु देश के लोकतंत्र में चौथे स्तंभ के रूप में इसने खुद को स्थापित किया है. निश्चित रूप से इसके लिए अनगिनत लोगों ने अपना योगदान दिया है. आज जब देश के कोने-कोने से लड़के-लड़कियां पत्रकार बनने के लिए मीडिया के क्षेत्र की ओर रूख करते हैं, तो यही क्षेत्र उन्हें सही मार्गदर्शन दिखलाता है. ऐसे में मीडिया में सक्रिय कुछ प्रतिष्ठित नाम हैं, जो नए लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा का कार्य करते हैं. आखिर मीडिया के ये ‘चंद’ दिग्गज ही तो हैं, जिसके कारण लोकतंत्र की मर्यादा बची हुई है, अन्यथा तमाम लोगों ने पत्रकारिता को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. काश कि मीडिया के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले यह समझ पाते कि उनकी किसी भी प्रकार की त्रुटि समूची मीडिया पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देती है और लोगों के अविश्वास का कारण भी बनती है. यूं तो मीडिया के गलियारों से त्रुटियों की खबरें आती ही रहती हैं, किन्तु भूल-सुधार देकर उऩसे पल्ला झाड़ लिया जाता है. लेकिन कई बार जब त्रुटियों का प्रारूप बड़ा हो जाता है, तो त्रुटिकर्ताओं को जेल भी जाना पड़ता है. आइये चर्चा करते हैं ऐसे ही कुछ चेहरों के बारे में जो कुछ त्रुटियों के कारण पत्रकारिता करते-करते जेल की हवा खा चुके हैं.

जागरण.कॉम के संपादक को हुई है जेल

शेखर त्रिपाठी डिजिटल वर्ल्ड के एक बड़े नाम हैं. जागरण.काम में वह लम्बे समय से बतौर संपादक अपनी सेवाएं दे रहे हैं. बेहद चर्चित मामले में उन्हें चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया, जिसका एकबारगी तो कई लोगों को यकीन ही नहीं हुआ. सिर्फ़ यही नहीं दैनिक जागरण अखबार के मैनेजिंग एडिटर और आरडीआई नाम की संस्था के खिलाफ भी आचार संहिता के उल्लंघन का केस दर्ज किया गया. गौरतलब है कि यूपी में 11 फरवरी को पहले चरण के चुनाव हुए थे. इनमें पश्चिमी यूपी की 73 सीटों पर वोट डाले गए थे.  इन्हीं सीटों के एग्जिट पोल जागरण ने अपनी वेबसाइट पर डाले थे, जिसके चलते यह गिरफ्तारी की गई. आज के समय में कई न्यूज पोर्टल, ब्लॉग धड़ल्ले से चल रहे हैं और युवा से लेकर प्रौढ़ तक उसे देख भी रहे हैं, उन सभी ऑनलाइन माध्यमों को देखने वाले संचालकों को जागरण.कॉम के संपादक की गिरफ्तारी का वाकया लम्बे समय तक ध्यान रखना चाहिए. भारतीय कानूनों के साथ तमाम संवैधानिक संस्थाओं के नियमों का पालन हर हाल में किया जाना चाहिए और अगर उनका उल्लंघन होता है तो हर एक को समझ लेना चाहिए कि वह ‘जेल’ भी जा सकता है.

तिहाड़ जेल गए थे ‘जी न्यूज’ के संपादक

जी न्यूज के मशहूर पत्रकार सुधीर चौधरी को भला कौन नहीं जानता! उनके डीएनए प्रोग्राम के चर्चे सभी की जुबां पर मिल जाएंगें. भले ही सुधीर चौधरी आज प्रसिद्धि के चरम पर हों, लेकिन उऩके दामन पर एक ऐसा दाग भी है, जिसका ज़िक्र वह शायद नहीं करें. 27 नवंबर 2012 का वो दिन जब अपने साथी समीर अहलूवालिया के साथ सुधीर चौधरी को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल जाना पड़ा था. उन पर कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कंपनी से कथित तौर पर कोयला घोटाले में शामिल होने की खबर प्रसारित नहीं करने के बदले में 100 करोड़ रुपये मांगने का आरोप था. यही नहीं रसूखदार कहे जाने वाले ज़ी न्यूज के चेयरमैन सुभाष चंद्रा को अपके भाई जवाहर गोयल, लीगल हेड ए. मोहन औऱ सेल्स हेड अमित त्रिपाठी के साथ पूछताछ का सामना करना पड़ा था.

तहलका.काम के सैमुअल भेजे गए थे जेल

यूं तो तहलका डॉट काम को सभी उसकी धमाकेदार खबरों के लिए जानते थे. लेकिन जब इसके वरिष्ठ पत्रकार मैथ्यू पर सरकारी गोपनीयता कानून के उल्लंघन का मामला दर्ज हुआ, तो यह बेबसाइट चर्चा का विषय बन गई. उन पर आरोप था कि उन्होंने न सिर्फ कानून का उल्लंघन कर दस्तावेज जुटाए बल्कि उन्हें अपने पोर्टल पर जारी भी किया. इसी के चलते उन्हें जेल का रास्ता देखना पड़ा. इस मामले में सीबीआई ने मैथ्यू, तहलका के संपादक अनिरुद्घ बहल, गृहमंत्रालय के तत्कालीन अधिकारी तथा पोर्टल मालिक के खिलाफ भी विभागीय गोपनीयता कानून के उल्लंघन के आरोप में आरोप-पत्र दायर किए थे.

Journalist arrested in India, Media and Social Media (Pic: shareyouressays.com)

‘तहलका’ के संस्थापक की हुई थी सलाखों से मुलाकात

अपनी तेजतर्रार पत्रकारिता के लिए जाने जाने वाले तहलका मैगजीन के संस्थापक और संपादक तरुण तेजपाल ने इस तेजी के साथ तरक्की की, कि वह युवाओं के लिए रोल मॉडल बन गए. एक ज़माना था जब सभी उनकी तरह रिपोर्टिग करना चाहते थे. तब उनकी रिपोर्ट प्राथमिकता से पढ़ी जाने लगी थी, लेकिन एक ‘स्कैंडल’ ने तेजपाल को तुरंत अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया. उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने सहकर्मी से यौन उत्पीड़न किया. जिसके चलते नवंबर, 2013 में गोवा से उन्हें गिरफ्तार किया गया था. हालांकि सु्प्रीम कोर्ट ने कठोर शर्तों के साथ तेजपाल को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया, लेकिन आज तक वह खुद को ‘आदर्श’ मानने वालों को जमानत नहीं दे सके, उनका विश्वास वापस नहीं कर सके. जाहिर है, चरित्र से बढ़कर कुछ और नहीं और खासकर पत्रकारिता को इस मामले में विशेष सावधान रहना चाहिए.

छत्तीसगढ़ में सिलसिलेवार गिरफ्तारियां

पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ से अलग-अलग कारणों की वजह से कई पत्रकारों की गिरफ्तारी की खबरें सुर्खियों में रहीं. दंतेवाड़ा से गिरफ्तार किए गए दीपक जायसवाल पर एक परीक्षा केंद्र में जा कर परीक्षार्थियों की तस्वीरें खींचने और परीक्षा केंद्र में घुसकर मौजूद प्राचार्य और शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगा था. तकरीबन उसी समय व्हाट्सऐप पर कथित रुप से अश्लील टिप्पणी करने के आरोप में पत्रकार प्रभात सिंह एवं संतोष यादव को माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

योग टीचर नहीं बनाने सम्बंधित ‘गलत खबर’ छापने पर हुई जेल

पिछले दिनों ‘द मिली गैजेट’ में  मुसलमानों को सरकार द्वारा योग टीचर नहीं बनाने की गलत खबर छापने के कारण पत्रकार पुष्प  शर्मा के खिलाफ एफआर्इआर दर्ज करते हुए गिरफ्तार किया गया था. उन्हें धारा 153-A (समुदायों में घृणा फैलाना) और 468(धोखाधड़ी के लिए जालसाजी करना) के तहत मामला दर्ज किया गया था. साल 2009 में पुष्प  शर्मा को फिरौती के आरोप में भी वसंत विहार पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसके जवाब में शर्मा ने कहा कि वह स्टिंग ऑपरेशन करने के लिए गए थे. उन पर फर्जी तरीके से उन पर मामला दर्ज किया गया.

मौजूदा तस्वीरें इस तरफ इशारा करती हैं कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ हो ही जाता है. हालाँकि, बहुत कुछ सकारात्मक भी है, पर बेहद दुखद है कि हमें समय-समय पर हमें पत्रकारों की गिरफ्तारी देखनी पड़ती है. इसके पीछे आर्थिक व्यवस्था का असंतुलन, पत्रकारों में असंतोष, पूंजीवादी प्रतिस्पर्धा जैसे कई कारण हो सकते हैं, किन्तु मूल रूप से जिम्मेदारी ‘पत्रकार बिरादरी’ को लेनी ही चाहिए और आने वाले दिनों में बेहतरीन मानदंड स्थापित करने चाहिए, जिस पर लोगबाग गर्व कर सकें, तो लोकतंत्र की जड़ें और मजबूत हो सकें.

Web Title: Journalist arrested in India

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