भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास उठाकर देखें तो पूरा इतिहास संघर्षों से भरा पड़ा है. 13 अप्रैल 1919 का दिन शायद ही कभी भुला जा सकता है. उस दिन रॉलेट एक्ट का विरोध कर रहे सैकड़ों निर्दोष लोगों को ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपनी क्रूरता और बर्बरता का शिकार बना, मौत के घाट उतार दिया था. जिसे सुनकर आज भी लोगों की रूह कांप जाती है. आइये आपको बताते हैं जालियाँवाला बाग के खूनी इतिहास का सच…

क्या था रौलट एक्ट

रॉलेट एक्ट एक ऐसी धारा थी, जिसमें विशेष अदालतों का गठन किया गया था. इसमें सुनाये गए फैसलों के खिलाफ कोई अपील नहीं हो सकती थी. इस धारा में मुकदमे की सुनवाई एक बंद कमरे में की जाती थी, जहां पर गवाह को भी जाने की इजाजत नहीं थी. इसके अलावा राज्य सरकारों को ढेर सारे अधिकार दे दिए गए थे, जिसमें किसी भी व्यक्ति की तलाशी लेना, गिरफ्तार करना और उसकी जमानत की मांग करना आदि शामिल था. यह जनविरोधी एक्ट जनता के भारी विरोध करने के बाद भी पारित कर दिया गया था. इस बिल का उद्देश्य भारत की आजादी की गतिविधियों को रोकना था. इस बिल के पास होने के बाद पूरे देश में जोरदार विरोध होने लगा. 6 अप्रैल 1919 को इसके विरोध में काला दिवस मनाने का फैसला लिया गया, जिसके तहत पूरे देश भर में हड़ताल करना और जगह जगह सार्वजनिक स्थानों पर सभा करना शामिल था. इस क्रम में 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग में सभा बुलाई गई थी और उस सभा में पंजाब के प्रमुख कोंग्रेसी नेता सैफुद्दीन किचुल और सत्यपाल भी शामिल होने वाले थे, लेकिन उन्हें पहले ही अरेस्ट कर लिया गया था.

जब जनरल डायर ने दिया गोली चलाने का आदेश

जनरल डायर इस आयोजन के बिलकुल विरोध में था. उसे यह आयोजन पसंद नहीं था. वह चाहता था कि यह आम सभा पूरी तरह से असफल हो. उसने अमृतसर के स्थानीय प्रशासन को इसके लिए पहले ही सतर्क कर दिया था. सभा में होने वाली सभी गतिविधियों को सफल न होने दिया जाए और वह खुद वहाँ गोरखा सैनिकों को लेकर आ धमका. आते ही उसने सैनिकों को आदेश दिया कि सभी लोगों को घेर लिया जाए. सभा में आये लोग यह समझ नहीं पाए कि यहाँ अंग्रेज सिपाही क्यों आये हैं? लोग कुछ समझ पाते, इसके पहले ही जनरल डायर ने सिपाहियों को गोली चलाने का आदेश दे दिया. जनरल डायर का आदेश मिलते ही सिपाहियों ने गोलियां चलानी शुरु कर दी, जिससे चारों तरफ चीख पुकार के साथ भगदड़ मच गई. लोग अपनी जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे. चूंकि, जलियाँवाला बाग चारों तरफ मकानों से घिरा हुआ था और  लोगों को वहाँ से भागने का एक ही रास्ता था, जिसे सिपाहियों ने पहले से रोक रखा था. इस कारण से लोग अपने को बचाने में असमर्थ हो गए थे…

Story of Jallianwala Bagh, Reginald Edward Harry Dyer ( Pic: sabrangindia )

जान बचाने के लिए कुंए में कूदे पड़े लोग

चारों तरफ अफरा तफरी का माहौल मचा हुआ था. उधर अंग्रेज सिपाही लगातार गोलियां चला रहे थे. 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गयीं. लोगों के पास बचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वहीं बाग के बीच में एक कुआँ भी था, जिसमें अपनी जान बचाने के लिए लोग कुएं में कूद पड़े.और देखते ही देखते कुआं लाशों से पट गया. सरकारी अनुमान के अनुसार इस घटना में 484 लोग मारे गये थे और हजारों की संख्या में लोग ज़ख़्मी हुए थे. जबकि, अनाधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 1000 से ज्यादा लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए.

अमृतसर में लगाया गया था मार्शल लॉ

इस घटना के बाद पूरे पंजाब में मार्शल लॉ लगा दिया गया था. देश के बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके उन्हें जेल भेज दिया गया था. महात्मा गाँधी इस हमले की जानकारी लेने के लिए अमृतसर जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें भी वहाँ नहीं जाने दिया गया. इतनी बड़ी घटना हो जाने के बाद पूरे देश सहित इंग्लैंड में भी इसकी घोर निंदा होने लगी थी, लेकिन ब्रिटिश हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में इस घटना के लिए जनरल डायर को शाबाशी दी गई. घटना के बाद देश में डायर के खिलाफ विद्रोह भड़क उठा. अंत में अंग्रेज सरकार को इस घटना की जाँच के लिए मजबूर होना पड़ा.

देश में भड़क उठी ‘आजादी की ज्वाला’

इस घटना से रविंद्र नाथ टैगोर को बड़ा दुःख पंहुचा और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया. साथ ही अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि भी उन्होंने अंग्रेजों को वापस लौटा दी. इतनी भयानक घटना हो जाने के बाद भी देश के क्रांतिकारियों के इरादे टूटे नहीं, बल्कि आजादी को हासिल करने के लिए देश में लोगों के बीच क्रांति की ज्वाला भड़क उठी. यह घटना पूरे देश में आग की तरह फ़ैल गई. लोगों ने देश को आजाद कराने का संकल्प ले लिया. इस घटना ने गाँधी जी को भी झकझोर दिया था. इसकी प्रतिक्रिया के परिणाम को देखते हुए गाँधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन भी प्रांरभ किया था.

इस घटना ने बनाया उधमसिंह को क्रांतिकारी

जलियांवाला बाग की इस घटना को उधम सिंह ने अपनी आँखों के सामने होते देखा था. चूंकि, उस समय वह वहीं मौजूद थे और लोगों को पानी पिला रहे थे. इस घटना का उधम सिंह पर इतना गहरा असर पड़ा कि उन्होंने उसी समय यह ठान लिया कि वे खून का बदला खून से ही लेंगे. 26 दिसम्बर 1899 को जन्मे उधम सिंह की मुलाकात अमृतसर के एक  लकड़ी  के कारोबारी से हुई जो उन्हें अफ्रीका ले गया. अफ्रीका से उधम सिंह कुछ दिनों के बाद अमेरिका चले गये. वहाँ से उधम सिंह भगत सिंह के संपर्क में आये और उनके साथ भगत सिंह का पत्र व्यवहार होने लगा. भगत सिंह से प्रेरित होकर वे भारत वापस आ गए और अपने साथ कुछ हथियार भी ले आये. भारत आने के बाद उन्होंने अपना नाम उधम सिंह से बदलकर राम मुहम्मद आजाद रख लिया. वे हथियार सहित किसी तरह लाहौर पहुंच गए, लेकिन तलाशी के दौरान उन्हें पकड़ लिया गया और उन पर मुक़दमा चला. तब उन्हें चार साल की सजा हुई थी.

Story of Jallianwala Bagh, Sahid Udham singh (Pic: Amar Audio/youtube)

जलियांवाला बाग के हत्यारे को मौत के घाट उतारा

उधम सिंह के जेल से छूटने के बाद उनके मन मस्तिष्क में जलियाँवाला बाग की घटना बराबर जल रही थी. किसी तरह वह अपना पासपोर्ट बनवाकर इंग्लैंड चले गए. और जनरल डायर को मारने का मौका तलाशने लगे. आखिर वह मौका उन्हें मिल ही गया. 13 मार्च 1940 को डायर लंदन के एक सभा में शामिल होने आया था. जैसे ही वह कुछ बोल पाता उधम सिंह ने उसे गोलियों से भून डाला और वह मारा गया. उन्होंने मौत का बदला ले लिया और उनका संकल्प पूरा हो गया. इस हत्या के लिए उन पर लन्दन में मुकदमा चला और उन्होंने इस हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. अदालत ने उन्हे फाँसी की सजा सुनाई, जिसे वे हँसते-हँसते स्वीकार कर लिए. 12 जून 1940 को भारत के इस वीर सपूत को फाँसी दे दी गई.

आजादी के बाद बना स्मारक

आजादी के बाद इस घटना को स्मारक बनाने के लिए आम जनता से चंदा लिया गया. जलियाँवाला बाग का डिज़ाइन अमेरिका के डिज़ाइनर बेंजामिन पोक से तैयार करवाया गया. इस स्मारक का उद्घाटन 13 अप्रैल 1961 को किया गया. भारत की आजादी में बलिदान की अमरगाथा जलियाँवाला बाग और शहीद उधम सिंह के योगदान को भुलाया नही जा सकता. उधमसिंह और जलियाँवाला बाग में शहीद हुए सैकड़ों लोग आज भी अमर हैं. इन वीरों को 13 अप्रैल के दिन याद करके इन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं.

Story of Jallianwala Bagh, Jallianwala Bagh Memorial ( Pic: blogspot )

देश के इतिहास में यह घटना सबसे क्रूरतम घटनाओं में से एक थी. इस घटना ने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में सबसे ज्यादा प्रभाव डाला, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दी. देश के लिए सैकड़ो निर्दोष लोगों ने अपनी जान गँवा दी. इनके इस बलिदान को देश आज भी नहीं भूला. भारत माता के वीर सपूतों को शत शत नमन.

Web Title: Story of Jallianwala Bagh, Hindi Article

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