देश की राजधानी दिल्ली में सुबह-सवेरे दफ़्तर जाने के लिए मेट्रो से सफ़र करने से बेहतर कोई दूसरा विकल्प किसी के पास नहीं है. पर मुश्किल यह है कि दिल्ली मेट्रो में भीड़ बढती ही जा रही है. अब आप कहेंगे, मेट्रो से ना जाएं तो किससे जाएं? दिल्ली की बसों का भी तो कमोबेश यही हाल है. ले देकर लोग सरकार को दोष देते हैं. समझ से परे है कि आखिर यह समस्या बढती ही क्यों जा रही है? कहने के लिए तो आपका सवाल आम है, लेकिन इसमें कई सारे ऐसे पहलू निहित हैं, जिन्हें समझा जाना आवश्यक है.

मेट्रो सफल या असफल?

आज जब दिल्ली मेट्रो की सफलता से प्रभावित होकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे देश के अन्य राज्य इसे अपने यहां चलाने की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं, तब दिल्ली मेट्रो में आए दिन बढ़ती भीड़ की खबरें विचलित करने वाली हैं. 2013 में आज तक की बेबसाइट पर छपी खबर की मानें तो मेट्रो में राइडरशिप 2021 के लिए जो संख्या आंकी गई थी, वह 2013 में ही पार कर चुकी है. आंकड़ों के हिसाब से एक दिन में सफ़र करने वालों की संख्या 23 लाख 62 हजार के पार पहुंच गयी है. मौजूदा समय में यह आकड़ा कहां होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.

हालांकि मेट्रो ने अपने कोचों को 6 से 8 करके समस्या का निदान करने की कोशिश ज़रुर की थी, पर इसके बावजूद भीड़ है कि बढ़ती ही जा रही है. जानकार तो इसे मेट्रो की लोकप्रियता और सफलता कहते हैं, जो एक तरीके से सही भी है. लेकिन इसके बावजूद बढ़ती हुई भीड़ मेट्रो की सफलता के रास्ते पर एक रोड़ा बनकर खड़ी हो गयी है. अब सवाल यह है कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं, जो मेट्रो की सफलता को असफल बनाने हेतु आमादा हैं.

शहरों में बढती अंधाधुंध भीड़

कारण कुछ भी हो, लेकिन हम इस बात को नहीं झुठला सकते कि पिछले कुछ समय में तेजी से शहरीकरण ने अपने पांव पसारे हैं. जिसका सबसे ज्यादा असर गांव व छोटे शहरों पर पड़ा है. आधुनिकता की दौड़ में तेजी से आगे निकलने की होड़ ने लोगों को पलायन पर मजबूर कर दिया है, जिसका खामियाजा दिल्ली जैसे बड़े शहरों को भुगतना पड़ता है. यहां के घनत्व का आलम अब यह हो चला है कि बसें तो बसें, दिल्ली की लाइफ लाइन मेट्रों तक की सांसे फूलने लगी हैं. इसे विडंबना ही कहेंगे कि पिछले दो दशकों में पंचवर्षीय योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्र के लिए राशि बढ़ने की खबरें तो आती रहती हैं, लेकिन

ग्रामीण इलाकों से शहरों-महानगरों की ओर लोगों का पलायन रुकने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है. परिणाम यह है दिल्ली में ट्रैफिक की समस्या अब भयावह रूप लेती जा रही है, जिसके कारण लोग मेट्रो पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं. इसके बावजूद इस संकट को सुलझाने की कोई कारगर योजना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है.

निजी वाहनों की अधिकता

सफ़र के दौरान मेट्रो में बढ़ती भीड़ के लिए सड़कों पर चलने वाले वाहन भी कम जिम्मेदार नहीं हैं, इनकी अधिकता के कारण आए दिन लगभग हर चौराहे से जाम की खबरें सामने आती हैं. कई बार तो जान माल की हानि तक हो जाती है. इसके बावजूद सड़कों पर निजी वाहन धड्डले से दौड़ते नज़र आते हैं. एक और बड़ी समस्या यह है कि जिन लोगों के पास कारें हैं, वे अपनी कारों से घर के दरवाज़े के सामने ही उतरना चाहते हैं. दुकानदार भी यह चाहते हैं कि कार से ही दुकान के सामने उतरें. उन्हें दो कदम भी पैदल न चलना पड़े. इस मानसिकता ने सड़क के किनारे वाली जगह को पार्किंग बना दिया है, जिसके कारण जाम की स्थिति बन जाती है. जिससे बचने के लिए लोग मेट्रो की ओर बढ़ जाते हैं. हालांकि मौजूदा केजरीवाल सरकार ने इस समस्या पर थोड़ी सी संजीदगी दिखाते हुए हुए ऑड-इवन का फॉर्मूला दिल्ली को देने की कोशिश की, लेकिन वो भी सिर्फ़ एक मौसमी बयार बनकर रह गया.

Travelling in Crowded Metro, Outside of Metro Station (Pic: Indianexpress.com)

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उन्नत विकास

मौजूदा दिल्ली सरकार कोई भी दावा करे, लेकिन सड़कों पर डीटीसी बसों में बढ़ोत्तरी को लेकर सभी की आंखों में ढ़ेरों सवाल हैं, जो सीधे तौर पर दिल्ली सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं. देखा जाए तो जिस हिसाब से डीटीसी बसों में सरकार की तरफ से बढ़ोत्तरी की जानी चाहिए थी, वह नहीं की गई है. जिस वजह से सड़क पर बस के लिए यात्रियों को घंटों खड़े रहकर इंतजार करना पड़ता है. ज्यादा दूर न जाते हुए कनाट प्लेस को ही ले लीजिए जहां बसें नहीं आ सकतीं, सिर्फ़ प्राइवेट गाड़ियां, कारें या टैक्सियां आ सकती हैं. बसें कनाट प्लेस से कुछ दूर आकर रुक जाती हैं. यानी बस में चलने वाले को कनाट प्लेस तक आने के लिए पैदल चलना पड़ता है. ऐसे में लोग मेट्रो की ओर रुख कर लेते हैं और भीड़ के रुप में हमें सफ़र के दौरान दिखाई देते हैं. इससे आगे बात करें तो प्राइवेट वाहनों में चलने वालों के लिए अगर उन्नत पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा दी जाए, जिसमें किराया बेशक ज्यादा हो, किन्तु सुरक्षा और सहूलियत भी उसी अनुरूप हो तो सड़कों पर बड़ी बड़ी कारों में एक-एक लोग चलने से शायद बाज आयें और तब ज्यादा नहीं तो कुछ राहत तो अवश्य ही मिलेगी.

बड़े शहरों का मनमाना मास्टर प्लान

राजधानी के मास्टर प्लान को देखें तो हम पाएंगें कि इसके साथ भी मनमाना रवैया अख्तियार किया गया है, जो जाम जैसी समस्या को विकराल बनाने के लिए जिम्मेदार है. जहां एक कोठी हुआ करती थी और 10-12 लोग रहा करते थे वहं अब ऊंची-ऊंची इमारतें बन गई हैं, जिनमें सैंकड़ों लोग रहते हैं. बड़े-बड़े शोपिग सेंटर, मॉल खुल गये हैं. शहर की व्यस्तम सड़कों पर हर 10 मिनट के बाद लगता जाम प्रत्येक आने जाने वाले के लिए परेशानी का कारण बनता है. जहां 40-50 किलोमीटर प्रति घंटा की चाल से 1 किलोमीटर का सफर तय करने मे मुश्किल से डेढ मिनट लगता था, उसे तय करने के लिए अब 10 मिनट तक का समय लग जाता है. ऐसे में लोग कहां जाएं? उनके पास मेट्रो से सफ़र करना ही एकमात्र विकल्प बचता है और वहां भीड़ बढती ही जा रही है.

यातायात के नियमों का पालन न करना

अक्सर जानबूझकर यातायात के नियमों को अनदेखा करने की तस्वीर हर रोज कहीं न कहीं से देखने को मिल जाती है. वैसे तो नियम तोड़ने वाले ज्यादातर लोगों को चालान जैसी कड़ी प्रकिया से होकर गुज़रना पड़ता है, खासकर दिल्ली में, लेकिन इसके बावजूद भी लोग नियम तोड़ने से बाज नहीं आते. जिसकी वजह से कई बार जाम जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है, जो लोगों की मुसीबत का सबब बनती है.

ये हैं उपाय:

  • केंद्र सरकार के सहयोग से राज्य सरकारों को अपने-अपने राज्यों में अच्छे रोजगार के साधन, उचित शिक्षा की व्यवस्था के साथ-साथ, रोजमर्रा की हर एक उस जरुरत का इंतेजाम अपने राज्य में ही करना होगा, जिसकी पूर्ति के लिए वहां के लोग पलायन के लिए मजबूर हैं. समय की मांग है कि दिल्ली जैसे कई और शहर बनाए जाएं, ताकि बड़े शहरों में बढ़ते घनत्व पर लगाम लगाई जा सके. हालांकि यह आसान काम नहीं है लेकिन इतना भी मुश्किल नहीं है कि किया न जा सके. बस एक दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रुरत है. केंद्र सरकार ने इस दिशा में ‘स्मार्ट सिटी’ जैसी कुछ पहलें की हैं, लेकिन मौजूदा हालात में सब ठन्डे बस्ते में पड़ी नज़र आती हैं.
  • दिल्ली की सड़कों पर निजी वाहनों की अधिकता पर अगर लगाम लगा लिया जाए, तो जाम जैसी समस्या से आसानी से निजात मिल सकती है. इससे लोग समय से अपने गंतव्य तक पहुंचेंगे. साथ ही मेट्रो पर बढ़ता वजन भी कुछ कम हो सकता है.
  • नगरीय और क्षेत्रीय केन्द्रों का योजनाबद्ध विकास और निवेश के कार्यक्रम की योजना को बनाकर उन्हें सार्थक स्वरुप प्रदान किया जाए तो लोगों को अपने गांव-क्षेत्र में रोजगार आदि के अवसर मिलेंगे. जो पलायन के विचार को रोक सकते हैं. इसी कड़ी में सरकार उद्योगों को पिछड़े क्षेत्रों में जाने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकती है.
  •  रोजगार के अवसरों के लिए राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के सहयोग से वित्त की उचित व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि रोजगार के लिए वहां के लोगों को दिल्ली जैसे शहरों में आने की आवश्यकता ही न पड़े.
  •  सरकारों को ऐसे में शहरी क्षेत्रों में आवासीय स्थलों की व्यवस्था और निर्माण भूमिहीन मजदूरी की सहायता की व्यवस्था और आवास निर्माण मे कम लागत वाली तकनीक का विकास और प्रयोग करना चाहिए, ताकि वो रोजगार के लिए दिल्ली जैसे बड़े शहरों की ओर अपना रुख़ न करें.
दिल्ली ही नहीं भारत के दूसरे महानगरों में भी बढ़ती भीड़ के कारण ट्रैफिक की समस्या दिनो-दिन बढ़ती जा रही है. इसमें कोई दो मत नहीं कि दिल्ली में आबादी का बोझ बढ़ा है, जिसके कारण यहां कि पारंपरिक यातायात व्यवस्था के साथ मेट्रो भी हांफने लगी है. जाहिर है अगर हम सच में आने वाले समय में बड़ी समस्याओं को टालना चाहते हैं तो हर हाल में ‘विकेंद्रीकरण’ पर जोर देना होगा. यही वह अवस्था होगी, जिससे हमारा गाँव और क़स्बा भी आगे बढेगा तो शहरों को भी कुछ राहत मिल सकेगी.

Travelling in Crowded Metro (Pic: massa.net)

Web Title: Travelling in Crowded Metro, Hindi article

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