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इस ‘ब्लू ह्वेळ’ को हमने ही पैदा किया है

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घर में एक बुजुर्ग बाबा थे, जिनकी उम्र उस बूढ़े बरगद के बराबर हो चली थी. वह बरगद जो गाँव के पश्चिम अभी भी खड़ा था.

दुआर पर एक गइया थी, जो अलार्म की तरह एक निश्चित समय पर बोलती थी और जब बोलती थी, तब पश्चिम से लेकर पूरब टोले को ये एहसास हो जाता था कि अब सुबह हो गयी है जाग जाना चाहिए.

माटी का एक घर था, जिसमें न TMT सरिया लगा था, न ही वाल पुट्ठी और नेरोलेक पेंट… वो घर इत्मीनान से पियरी माटी से लीपा गया था. घर के आगे तुलसी का चौरा और चौरे में लगा सिंदूर, जिसको मां रोज लीपकर सात बार प्रणाम करती थी.

एक माटी का दालान था, जिसमें बाबा आदम के जमाने के पाए लगे थे. दरवाजे देखकर एहसास होता था कि बस बुलंद दरवाजा कहीं और नहीं यहीं है, यहीं है…

उस दालान में एक आजी थीं, जो सुबह-सुबह तुलसी जी के चौरा पर जल चढ़ाकर मट्ठा महनें बैठ जातीं थीं… और घण्टों मट्ठा महतीं थीं. तब तक, जब तक कि दही से मक्खन निकलकर हाथ जोड़कर खुद न कह दे… “रहे द हो आजी… जान लेबू का हमार”?

और उसी आंगन में एक मां भी थी, जो पता न क्यों दिन भर में तेरह बार घूंघट ओढ़ लेती थी, जिसकी गोद से छिटककर पांच साल का मुन्नू ऐसे भगता था, जैसे उसके पैरों में उसैन बोल्ट की आत्मा घुस गई हो!

और बेचारी मां डण्डा लेकर दौड़ाते हुए उस दरवाजे पर ठिठक जाती, जो दरवाजा सिर्फ मां के लिए दरवाजा नहीं था, वो नईहर-ससुराल की उबड़-खाबड़ सड़क पर एक मील का पत्थर था… जिसे माँ कहीं दूर जाते समय प्रणाम किया करती थी.

इधर मां के घूंघट और साड़ी सम्भालते ही मुन्नू वहाँ पहुंच चुका होता जहां की दुनिया कबड्डी चिक्का से लेकर ओल्हा-पाती, कंचा, लट्टू तक ही सीमित थी. उसमें न आज की फिक्र थी न कल की चिंता…

जहाँ किसी सोनूआ को टायर नचाते समय ये एहसास हो जाता था कि इसी टायर से एक दिन समूची दुनिया नाप देगा… जहाँ परमात्मा पांड़े के प्रिंसवा को विश्वास था कि एक दिन इसी पतंग से आसमान की दूरी तय कर लेगा.

इधर सुनें हैं कि सार्थक के पापा सीए हैं… और ममी एमबीए!

दोनों की कमाई इतनी है जितनी कि पांच साल में मुन्नू का खानदान मिलकर नहीं कमा सकता. लेकिन सार्थक के पापा को गाँव गये अठारह साल हो गए और ममी को बीस साल…

ममी मिसेज ब्यूटी के न जाने कितने कम्पटीशन जीत चूकी हैं. उनके फिगर की चर्चा सोसायटी से लेकर सोशल मीडिया तक फैली है…

सार्थक के पापा के क्लाइंट न्यूयार्क से लेकर नॉर्वे तक फैले हैं… सार्थक के पापा एक क्लीक पर उनसे रोज बतियाते हैं और टेक्स बचाने के न जाने कितने उपाय बतातें हैं.

लेकिन सार्थक के पापा को फुर्सत नहीं मिलती कि
अपने दिल में उन बुजुर्गों की चौखट को बचा सकें… जिनके कारण आज उनका अस्तित्व है.

क्योंकि सार्थक के 3BHK फ्लैट की कीमत आज करोड़ों में है. पापा के पास लग्जरी गाड़ी है.. आईफोन का अपडेटेड वर्जन सबसे पहले सार्थक के घर आता है… तो गांव को कौन पूछेगा?

हां सार्थक स्कूल से आने के बाद मुन्नू की तरह मैदान में नहीं जाता. वो सबसे बड़ी स्क्रीन वाली टीवी पर WWF देखता है.

उसे भले अपने परबाबा का नाम याद नहीं हो लेकिन दुनिया के सारे रेसलरों के नाम एक चुटकी में याद हैं.. उसने हॉलीवुड की सारी हॉरर फिल्में अभी देख लीं हैं. शायद ही कोई वीडियो गेम हो जिसे सार्थक ने छोड़ा हो!

United Family vs Nuclear Family Concept (Pic: scroll)

एक दिन तो सार्थक की ममी ने ये दिव्य जानकारी पड़ोस वाली अग्रवाल आँटी को देते हुए बहुत गर्व महसूस किया और बड़े शान से बताया कि…

“कोई भी बड़े टास्क वाला वीडियो गेम क्यो न हो… सार्थक चुटकी बजा के उसे कम्पलीट कर जाता है और सार्थक को गूगल से थोड़ा ज्यादा और किसी इनसाइक्लोपीडिया से बहुत ज्यादा इंटरनेट, वीडियो गेम की जानकारी है. हॉलीवुड की मूवीज का तो वो सबसे बड़ा क्रिटिक है.

लेकिन इसी बीच कल एक हृदय विदारक घटना हुई… कल सार्थक की ममी को तब बड़ा झटका लगा जब उन्होंने जीम से आकर देखा कि सार्थक ने ब्लू ह्वेळ गेम खेलने के चक्कर में हाथ की नस काट लिया है.

सार्थक की ममी को काटो तो खून नहीं… सारा फिगर बनाने का नशा दो मिनट में चटक गया… उसके पापा के सारे क्लाइंट दो मिनट में भूल गए.. सोसाइटी में हुआ हल्ला, शर्मा जी आए और वर्मा जी.. केड़िया और जालान जी दौड़े… अग्रवाल और सिसौदिया जी भी… सबने सार्थक की इस नादानी पर खूब डाँट पिलाई और फेसबुक अपडेट किया कि जमाना बिगड़ गया है…

देखिये न बच्चे अब कैसे-कैसे खेल खेलने लगे हैं.. ?

इधर आज अखबार देख रहा.. तो ऐसे ही न जानें कितने सार्थकों ने एक निरर्थक से खेल के चक्कर में अपनी जान गंवा दी है.. किसी ने हाथ काटा है तो कोई छत से कूद गया है.. किसी ने पैर तोड़ लिया है तो किसी ने सर फोड़ लिया है..

… और लोग इधर हैं कि उलझे हैं.

सार्थक के पापा को कुछ समझ में नहीं आ रहा.. न ही अग्रवाल जी को..

आज टेक्स बचाने से ज्यादा चिंता इस बात की है कि सार्थक को ब्लू ह्वेळ  से कैसे बचाया जाए.. आगे ब्लू फिल्म से…

सार्थक की ममी का तो खून ही सूख गया है… लेकिन उनको अभी भी समझ में नही आ रहा कि जीम करने से ज्यादा उन्होंने मुन्नू के साथ सुबह-शाम दौड़ लगाना और कुछ खेलना चुना होता तो आज उनका फिगर भी बन जाता और सार्थक का बचपन भी..

सार्थक के पापा ने ये टेक्स बचाने से पहले अगर एक घण्टा भी सार्थक को दो-चार कहानियां सुनाई होतीं, कुछ गीत गुनगुनाया होता, कभी साथ में डांस किया होता, कोई कविता सुनाई होती या कोई पेटिंग बनाई होती तो आज ये नौबत नहीं आती.

दरअसल देश के लाखों-करोड़ों सार्थक जैसे बच्चों के पिताओं को समझना होगा कि आधुनिकता, भौतिकता और संचय करने की अति लालसा हमें ऐसे ही ब्लू ह्वेळ के समंदर में एक दिन दफना देगी…! ये ब्लू ह्वेळ किसी डेवलपर ने नहीं, ये हमने पैदा किया है.. ये एकाकी हो रहे जीवन की नाजायज पैदावार है…

आज बचपन,जवानी और जीवन को बचाना है.. तो 3BHK के फ्लैट और आजी के दालान में एक संतुलन बनाना होगा, मेंटेन करके रखना होगा अपनी जमीन से जुड़ी यादों और शहरों की बुलंदियों को..

तभी कुछ होगा. वरना इंतजार कीजिये अभी इस विकराल ब्लू ह्वेल के अपडेटेड वर्जन तैयार हो रहें हैं.

Childhood Games at Village (Pic: some…)

Web Title: Blue Whale Game Challenge, Reality of Society, Hindi Article

Keywords: Society, Village, Town, City, People, Samaj, Social Issues, Blue Whale Game Reality Check, Author Atul Kumar Rai, Atul Kumar Rai, Social Responsibility, Irresponsibility, Suicide, Society Behavior, Learning, Education System, Social Structure in India, Family, Relations, Children Education

Featured image credit / Facebook open graph: cgtn / mid-day

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